Thursday, August 18, 2022

भारत-माता का संदर्भ और नागरिक, देश तथा समाज का प्रसंग

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‘भारत माता की जय’ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान सबसे अधिक लगाया जाने वाला नारा था। भारत माता का उल्लेख सबसे पहले किरण चन्द्र बंदोपाध्याय के नाटक ‘भारत माता’ में आया था जो सन 1873 में खेला गया था। भारत भूमि को जीवन का पालन करने वाली माता के रूप में रूपायित कर उसकी मुक्ति के लिए उसकी विजय का उद्घोष करने वाला यह नारा राष्ट्रीय आंदोलन के कार्यकर्ताओं में नए उत्साह का संचार करता था।

कुछ वर्ष पहले घूमने के लिए महाराष्ट्र में दौलताबाद का किला देखने के लिए जाना हुआ। उस विशाल किले के मुख्य द्वार पर किले के अंदर दर्शनीय स्थानों की सूची में भारत माता का मंदिर भी अंकित था। उत्सुकतावश जब उस स्थान पर गए तो मंदिर के नाम पर एक बरामदे में नारंगी रंग की साड़ी पहने हाथ में तिरंगा लिए गुस्से में गुर्राते हुए शेर पर बैठी एक महिला का चित्र बनाया हुआ मिला। पुजारी भी था, चढ़ावा भी चढ़ाया जा रहा था और मंत्रोच्चारण भी हो रहा था। 

एक ऐतिहासिक इमारत में उस इमारत के इतिहास से किसी प्रकार का वास्ता न रखने वाले मंदिर का विचार काफी अटपटा सा लगा। देवी देवताओं की मान्यता तो धार्मिक आस्थाओं और ग्रंथों से चलती आ रही है लेकिन उसी परिपाटी पर भारत माता को धार्मिक देवी की तरह मंदिर में स्थापित करके पुरातन परंपरा में पुजारी, आरती, पूजा, चढ़ावा, दक्षिणा आदि का यह विचार किसी भी प्रकार से गले नहीं उतरा। बाद में ऐसा ही मंदिर माउंट आबू की झील के किनारे देखने को मिला तो सहज ही मन में सवाल उठा क्या भारत माता प्रत्येक भारतीय की माता नहीं हैं। भारतीय समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा मंदिर, पूजा-पाठ आदि आदि  का हिस्सा नहीं है तो मंदिर वाली भारत माता से उसका क्या वास्ता? भारत माता के मंदिर उज्जैन, हरिद्वार, ऋषिकेश आदि स्थानों पर बनाए गए हैं और जल्द ही कुरुक्षेत्र में पांच एकड़  जमीन पर ऐसा एक मंदिर बनने जा रहा है। 

इसी संदर्भ में सन 1936 में काशी में भी भारत माता का एक मंदिर शिव प्रसाद गुप्त ने बनवाया था जिसका उद्घाटन गाँधी जी के हाथों हुआ था। लेकिन, यह मंदिर पूजा-पाठ, चढ़ावे, मन्नत वाला नहीं है। इसमें संगमरमर से उकेरा गया अविभाजित भारत का त्रियामी भौगोलिक मानचित्र है। 

इसी प्रकार, जब अवनीन्द्रनाथ ठाकुर ने सन 1905 में पहली बार भारतमाता का चित्र उकेरा तो उसे ज्ञान, वैभव, अध्यात्मिकता, शान्ति के प्रतीक के रूप में बनाया गया था। इस चित्र में भारतमाता केसरिया वस्त्रों में चार भुजाओं में क्रमशः पुस्तक, माला, श्वेतवस्त्र, और धान की बाली धारण किए हुए है। 

एक लंबे अरसे से एक नारा हवा में रहा है- दूध मांगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे। गला फाड़कर पूरी ताकत से यह नारा लगाने वाले से आप कश्मीर की बजाए कश्मीरियों का जिक्र कर बैठोगे तो यूं लगेगा जैसे उनके जले पर नमक छिड़क दिया हो। ऐसा ही विरोधाभास हमें उनके भारत माता को देवी का रूप देकर पूजा-पाठ मंदिर पुजारी तक सीमित करने और भारत माता की विस्तृत व्याख्या के रूप में दिखाई देगा।

तो आइये, भारत माता की अवधारणा के विमर्श को आगे बढ़ाएं। बात 1920 के दशक की है जब जवाहर लाल नेहरू संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश) के किसानों के नेता बन चुके थे। इसी सिलसिले में एक गांव में किसानों ने उनका स्वागत भारत माता की जय के नारों के साथ किया। उन्होंने ग्रामीणों से संवाद शुरू किया। उनका सवाल था कि आप जिसका जयकारा लगा रहे हैं वह भारत माता कौन है? जवाब कुछ यूं थे:

–  यह धरती ही हमारी माता है।

– ये नदी, पहाड़, खेत-खलिहान यही सब मिलकर भारत माता बनती है। इन्हें अंग्रेजों के जुल्म से आजाद कराना है।

तब नेहरू जी ने कुछ बातें रखीं:

-यह सब बातें जो आपने भारत माता के बारे में बताई हैं तो सही लेकिन यह तो हमेशा से हैं। 

-आखिर धरती को या नदी, पहाड़ों को तो आजादी नहीं चाहिए। -अंग्रेजी राज में जुल्म, गरीबी और भुखमरी का सामना तो आखिरकार हम भारत के लोग ही कर रहे हैं। अगर हम ना हों तो इस धरती को भारत माता कौन कहेगा? 

– तो जब हम भारत माता की जय बोलते हैं तो हम भारत के 30 करोड़ लोगों की जय बोलते हैं। 

– इसलिए हम सब भारत माता का एक-एक टुकड़ा हैं और हम सबसे मिलकर ही भारत माता बनती है।

–  तो जब भी हम भारत माता की जय बोलते हैं तो अपनी ही जय बोल रहे हैं। और, जिस दिन हमारी गरीबी दूर हो जाएगी, हमारे तन पर कपड़ा होगा, हमारे बच्चों को अच्छी से अच्छी तालीम मिलेगी, हम सब कुशल होंगे, उस दिन भारत माता की सच्ची जय होगी। उपरोक्त संवाद और भारत माता की देवी की तरह मंदिर में पूजा-पाठ के मद्देनजर दो विरोधी दृष्टिकोण हमारे समक्ष हैं। भारत माता को धार्मिक रूप देकर उसे संकीर्ण दायरे में समेटते हुए, पुजारी- पुरोहित की रोजी-रोटी का माध्यम बनाते हुए एक बनावटी आस्था का तंत्र खड़ा कर देना या इसके विपरीत प्रत्येक भारतवासी का बेहतर समाज की रचना करने के सपनों के साथ भारत माता का तादात्म्य पैदा करना। पाठक दोनों पक्षों की आलोचनात्मक तुलना कर सकते हैं।

यहां वरिष्ठ लेखक पुरुषोत्तम अग्रवाल द्वारा हाल ही में सम्पादित पुस्तक ‘हू इज़ भारत माता’ का ज़िक्र करना प्रासंगिक होगा, जिसमें राष्ट्र और राष्ट्रवाद के सवाल पर जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गांधी, भगतसिंह, सरदार पटेल आदि के लेखों का संकलन है। यह पुस्तक अनेक भाषाओं में अनुदित हो चुकी है। भारत माता की अवधारणा पर नेहरू जी और अन्य राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं की व्याख्या का ज़िक्र इस पुस्तक में विस्तार से है। 

भारत माता का विमर्श अधूरा रह जाएगा यदि इस प्रसंग में ‘जय हिंद’, राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत पर चर्चा न हो। 

भारत माता की जय का उद्घोष पूरे राष्ट्रीय आंदोलन में लोकप्रिय और खून में नया जोश भर देने वाला था जिसकी तरंग आज भी जिंदा है। लेकिन, कुछ गीत और कुछ और नारे भी थे जिन्होंने भारत माता के रूपांतर का काम किया। 

जयहिंद: भारत की छवि को एक माता के रूप में न देखते हुए पूरे हिंदुस्तान को एक गौरवपूर्ण सम्मान देने की सदिच्छा का नतीजा था जयहिंद का नारा। जर्मनी में पढ़ते हुए दक्षिण भारत के एक स्कॉलर चेम्बकरणम पिल्लई ने आस्ट्रिया की राजधानी वियना में सन 1933 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस का अभिवादन जयहिंद पुकार कर किया था। बाद में जब 2 नवम्बर 1941 को जर्मनी में आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना हुई तो फ़ौज के युद्धघोष के रूप में  नेताजी के सचिव आबिद हुसैन सफ़रानी के सुझाव पर जयहिंद के नारे को स्वीकार कर लिया गया था। यह उद्घोष भी जनमानस की जुबान पर छाया रहा और आज भी पुलिस, फ़ौज, अर्धसैनिक बलों में जयहिंद का अभिवादन आम है। आज़ाद भारत की पहली डाक टिकट पर जयहिंद छापा गया था। 

वंदेमातरम: ब्रिटिशकाल में ‘गॉड सेव द क्वीन’ की प्रार्थना की अनिवार्यता की प्रतिक्रिया में बंगाल में एक डिप्टी कलेक्टर बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने भावुक होकर संस्कृत में दो पदों का एक गीत वंदेमातरम शीर्षक से लिखा था जिसका अर्थ है ‘माँ की वंदना करता हूँ।’ बाद में सन 1888 में बंकिमचंद्र ने ‘आनंदमठ’ उपन्यास लिखा जिसका एक क़िरदार संन्यासी भवानन्द वंदेमातरम गाता है लेकिन इसमें बंगला भाषा के कुछ और पद जोड़ दिए गए हैं जिनके अनुसार मातृभूमि को देवी दुर्गा के रूप में दर्शाया गया है। सन 1896 में काँग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने वंदेमातरम का गायन किया। इसी प्रकार सन 1905 में बनारस अधिवेशन में सरलादेवी चौधरानी ने भी इसको गाया था। लाला लाजपत राय ने लाहौर से निकाले जा रहे अपने जर्नल का नाम भी ‘वंदेमातरम’ रखा था। काकोरी काण्ड के शहीद रामप्रसाद बिस्मिल ने अपनी पुस्तक ‘क्रांति गीतांजलि’ में पहला गीत ‘मातृवन्दना’ में वंदेमातरम के भाव वाला गीत लिखने के बाद अपनी स्वरचित उर्दू रचनाएं लिखी हैं। 

वंदेमातरम के सम्बंध में राष्ट्रीय आंदोलन के नेतृत्व के सामने कुछ दुविधाएं भी आ खड़ी हुईं जब ये सवाल आए कि मातृभूमि की एक धार्मिक देवी के रूप में वंदना, आनंद मठ उपन्यास का सुर मुस्लिम विरोधी होना और किसी व्यक्ति या वस्तु की पूजा समावेशी प्रभाव नहीं छोड़ती है। इस प्रकरण में सन 1937 में काँग्रेस नेतृत्व ने फैसला लिया कि वंदेमातरम के पहले दो पदों को ही राष्ट्रगीत के रूप में माना जाएगा। अतः 14 जनवरी सन 1950 में प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा रखे गए प्रस्ताव के अनुसार वन्देमातरम के राष्ट्रगीत को संवैधानिक रुतबा मिल गया था।

राष्ट्रगान: गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर द्वारा रचित जन-गण-मन को भारतीय संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया था। इसे सबसे पहले सन 1911 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में ठेठ बांग्ला में गाया गया था। चूंकि सन 1911 में ही बंगाल विभाजन को ख़त्म किया गया था और किंग जॉर्ज पंचम का भारत में दौरा भी था तो रामभुज चौधरी द्वारा रचित एक हिंदी गीत जॉर्ज पंचम की स्तुति में भी गाया गया था जिससे इस प्रचार को हवा मिली कि जन-गण-मन तो जॉर्ज पंचम के लिए लिखा गया था। इस प्रचार का जवाब सन 1912 में टैगोर द्वारा दिया गया कि भारत भाग्य विधाता तो भारत का जन मन गण ही है। 

इस प्रकार से जब भारत माता का ज़िक्र किया जाता है तो राष्ट्र और राष्ट्रवाद के अन्य महत्वपूर्ण प्रतीकों के रूप में जयहिंद, वंदेमातरम और जन-गण-मन की चर्चा स्वाभाविक रूप से सामने आएगी। ये तमाम प्रतीक आज़ादी के आंदोलन में उभरे और आज भी राष्ट्रीयता की भावना को संजोये हुए हैं।

विमर्श को समेटते हुए इतना स्पष्ट है कि विषय अत्यंत सरल है। समस्या केवल मात्र इतनी है कि भारत माता की अवधारणा को क्या रूप दिया जाए। भारत देश का प्रत्येक बाशिंदा अपने आप को देश का अटूट हिस्सा मानते हुए जनमानस की समग्रता को भारत माता और भारत भाग्य विधाता माने या इसकी व्याख्या को कूपमंडूक तरीके से धार्मिक आवरण देते हुए पंडों-पुजारियों के हवाले कर दिया जाए।

(सुरिंदर पाल सिंह लेखक हैं और पंचकूला में रहते हैं।)

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