Monday, August 15, 2022

पश्चिमी यूपी में बिखर गया है बीजेपी का सिराजा

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प्रदेश में आचार संहिता लागू होने और बढ़ते ओमिक्रोन मामलों का मतलब है कि अब पार्टियों को चुनाव प्रचार के लिए बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया और डिजिटल रैलियों पर निर्भर रहना होगा। यूं तो कहने को चुनाव पूरे यूपी का है लेकिन क्या है खास इस बार जो पश्चिम यूपी में देखने को मिलेगा? भाजपा की उम्मीदें कसौटियों पर खरी उतरती हैं या नहीं, यह भी देखने लायक होगा। पश्चिमी यूपी में ब्रज के क्षेत्र के साथ-साथ, रूहेलखंड का क्षेत्र भी शामिल है। पश्चिमी यूपी के 20 जिलों में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले और दूसरे चरण में 10 और 14 फरवरी को मतदान होने वाला है।

पश्चिम यूपी में मेरठ, बुलंदशहर, गौतम बुद्ध नगर, गाजियाबाद, हापुड़, बागपत, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली, मुरादाबाद, बिजनौर, रामपुर, अमरोहा, संभल, बरेली, बदायूं, पीलीभीत, शाहजहांपुर, आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, मथुरा, अलीगढ़, एटा, हाथरस, कासगंज, इटावा, औरैया और फर्रुखाबाद आदि जिले आते हैं। इस क्षेत्र का सबसे बड़ा शहर गाजियाबाद है, जबकि दूसरा सबसे बड़ा शहर, आगरा है।

विगत विधानसभा चुनाव 2017 में मुजफ्फरनगर, हापुड़, शामली, आगरा, गाजियाबाद, अलीगढ़, मेरठ बड़े जिलों में बीजेपी ने विजय हासिल की थी। इस क्षेत्र में मुरादाबाद, सहारनपुर, बिजनौर, अमरोहा जैसे पश्चिमी यूपी के जिले और मध्य यूपी की ओर वाले जिले जैसे बदायूं और शाहजहांपुर हैं, में भाजपा को 55 में से 38 सीटें मिलीं थीं, क्योंकि पार्टी ने मोदी के कन्धे पर बंदूक रखकर चलायी थी। 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद यूपी में भी मोदी का हिन्दुत्व फैक्टर कारगर रहा था। वहीं भाजपा 2017 के विधानसभा चुनाव में 40 प्रतिशत वोट शेयर के साथ, 312 सीट पर विजय पताका फहराकर सत्ता में आई थी।

2019 के लोकसभा चुनावों में, सपा-बसपा गठबंधन के बावजूद भाजपा का वोट-शेयर 40 से बढ़कर 50 प्रतिशत हो गया था। 2019 के लोकसभा चुनावों में, जब सपा, बसपा और रालोद ने महागठबंधन से चुनाव लड़ा, तो वहीं बसपा ने 11 में से चार सीटों – अमरोहा, बिजनौर, नगीना और सहारनपुर पर जीत हासिल की थी। 2017 में, सपा के आजम खान ने 2019 में रामपुर से लोकसभा के लिए चुने जाने से पहले, अपने आठवें कार्यकाल के लिए यहां से जीत हासिल की थी।

बात यदि अमरोहा जिले की करें तो यहां पर समाजवादी पार्टी के पूर्व शिक्षा मंत्री महबूब अली और पूर्व पंचायती राज मंत्री कमाल अख्तर बड़े चेहरे हैं। चंद्रपाल सिंह अमरोहा में समाजवादी पार्टी के अच्छे नेता माने जाते थे, उनके निधन के बाद महबूब अली और कमाल अख्तर पर जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ चुका है। पूर्व कैबिनेट मंत्री महबूब अली अमरोहा विधानसभा सीट से लगातार पांचवीं बार विधायक हैं अमरोहा सीट पर बीजेपी, बसपा किसी को सफलता नहीं मिली है और इस बार भी महबूब अली अपने गढ़ अमरोहा विधानसभा क्षेत्र से ही मैदान में उतारे गए हैं।

अमरोहा विधानसभा में लगभग 70% मुस्लिम समुदाय के लोग निवास करते हैं और सीट मुस्लिम बाहुल्य मानी जाती है इस सीट पर परिसीमन के बाद जब से यह अमरोहा विधानसभा सीट अस्तित्व में आई है तब से समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता महबूब अली का ही इस सीट पर कब्जा रहा। महबूब ने अपने प्रतिद्वंदी बसपा उम्मीदवार नौशाद अली इंजीनियर को 15042 वोट से पराजित किया था। यहां बीजेपी तीसरे स्थान पर रही है और रालोद चौथे नंबर पर रही थी।

वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के पूर्व पंचायती राज मंत्री कमाल अख्तर की बात करें तो हसनपुर विधानसभा से सन् 2017 में अख्तर को मैदान में उतारा था, लेकिन बीजेपी प्रत्याशी महेंद्र सिंह खड़गवशी ने अख्तर को 27 हजार वोटों के बड़े अंतर से हराया था। वहीं क़माल अख्तर 2014 के लोकसभा चुनावों में भी हसनपुर सीट से अपनी पत्नी को लोकसभा चुनाव में भी नहीं जिता पाए थे लेकिन इस बार पिछले विधानसभा चुनाव 2017 में नौगावां सादात से बीजेपी प्रत्याशी और पूर्व क्रिकेटर चेतन चौहान के सामने सपा प्रत्याशी जावेद आब्दी की हार होने के बाद क़माल अख्तर को नौगावां से प्रत्याशी के तौर पर उतारा गया है, तो वहीं चेतन चौहान के निधन हो जाने के बाद संगीता चौहान का टिकट काटकर पूर्व सांसद देवेंद्र नागपाल को बीजेपी प्रत्याशी ने अपने उम्मीदवार के रूप में यहां से उतारा है। देवेंद्र नागपाल का अमरोहा में अच्छा-खासा जनाधार है इसलिए बीजेपी ने नागपाल पर भरोसा जताया है।

2017 के चुनाव में यहां की पांच में से चार सीटें भाजपा के पास थीं जबकि एक मात्र अमरोहा सदर सीट सपा के कब्जे में थी। इसके बावजूद 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में यहां भाजपा पराजित हुई और यहां बसपा के कुंवर दानिश अली चुनाव जीते। इसके पीछे सपा-बसपा गठबंधन बड़ी वजह था। भाजपा के लिए अब स्थिति उतनी अनुकूल नहीं है, जितनी 2017 के चुनावों में थी, जब पार्टी ने इस क्षेत्र मेरठ, सहारनपुर और मुरादाबाद मंडल की 70 विधानसभा सीटों में से 51 पर जीत हासिल की थी। यहां सपा ने 2017 में 15 सीटें जीती थीं, सपा के सहयोगी के रूप में कांग्रेस ने 2 सीटें जीती थीं, जबकि बसपा ने एक । इस क्षेत्र से कुल 11 मुस्लिम उम्मीदवार जीते थे जो सभी सपा से थे। अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा 27 सीटों पर, भाजपा 13 पर और बसपा 11 सीटों पर उपविजेता रही। 2012 में, जब सपा ने राज्य में बहुमत हासिल किया, तो उसने इस क्षेत्र में 27 और भाजपा ने 8 सीटें जीती थी ।

मुजफ्फरनगर दंगे पश्चिमी यूपी की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ थे और भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनावों में इस क्षेत्र की सभी 14 सीटों पर जीत हासिल की थी। पार्टी 2017 के चुनावों में भी इस क्षेत्र की 70 सीटों में से 51 सीटें जीतकर सत्ता में आई थी। 2012 के विधानसभा चुनावों में, भाजपा ने इस क्षेत्र की 70 में से केवल 11 सीटों पर जीत हासिल की थी। उस साल समाजवादी पार्टी को 25, बहुजन समाज पार्टी को 23, कांग्रेस, रालोद को तीन और अन्य को एक सीट मिली थी। 2017 में, भाजपा ने क्षेत्र की 70 विधानसभा सीटों में से 51 पर जीत हासिल की। सपा ने 15, कांग्रेस ने 2, बसपा और रालोद ने 1-1 सीट हासिल की थी।

बीजेपी ने 2014 (लोकसभा), 2017 (विधानसभा) और 2019 (लोकसभा) के चुनावों में अपना हिंदुत्व कार्ड अच्छा खेला। उसने 2012 के चुनावों की तुलना में 2017 में 40 विधानसभा सीटों का लाभ उठाया। बसपा को 22 और सपा को 10 सीटों का नुकसान हुआ। लेकिन इस बार व्यापक किसान आंदोलन और असंतुष्ट विकास के कारण बीजेपी को पश्चिमी यूपी में लोहे के चने चबाने पड़ सकते हैं। 2014 और 2017 की तर्ज पर हिंदू कार्ड का जादू शायद इस बार देखने को ना मिले। याद हो कि मुजफ्फरनगर में महापंचायत में बीकेयू प्रवक्ता राकेश टिकैत मंच से हर हर महादेव और अल्लाह हू अकबर के नारे लगाते हुए बीजेपी के हिंदुत्व कार्ड पर हमला किया था। अनुमान है पश्चिमी यूपी में जाट और मुसलमान 25 से 30 से अधिक सीटों पर परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।

(अमरोहा से स्वतंत्र पत्रकार प्रत्यक्ष मिश्रा की रिपोर्ट।)

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