Monday, August 15, 2022

यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा की नैया डगमगाई

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विधानसभा के वर्तमान चुनावी दौर में जिस तरह उत्तर प्रदेश में जनता द्वारा जगह-जगह भाजपा प्रत्याशियों को खदेड़ा जा रहा है और अखिलेश यादव तथा जयंत चौधरी गठबंधन के अलावा प्रियंका गांधी व राहुल गांधी को सुनने लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है तो दूसरी तरफ किसान नेताओं ने भाजपा के विरुद्ध तीखे सवालों की बौछार शुरू कर दी है। इसके अलावा हाल ही में प्रदेश में छात्रों और बेरोजगारों पर की गई पुलिसिया कार्रवाई ने युवाओं में भाजपा के खिलाफ माहौल बना दिया है; इस सबसे उत्तर प्रदेश में भाजपा को उसकी उम्मीद के अनुरूप जनसमर्थन मिलने की आशा नहीं है।

प्रदेश विधानसभा चुनाव में कुल 403 सीटों में से पश्चिमी उप्र की 142 सीटों पर सपा-आरएलडी गठबंधन से भाजपा उम्मीदवारों को कड़ी टक्कर मिलने की संभावना है। जबकि भाजपा अब भी अपने सदाबहार हिंदू-मुस्लिम कार्ड के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश में है लेकिन किसान आंदोलन और पूर्वांचल में छात्र आंदोलन ने उसके प्रयासों को पलीता लगा दिया है। ऊपर से बेरोजगारी और महंगाई से लोग अलग त्रस्त हैं।

जातीय समीकरण साधने में भाजपा पिछड़ी

बिहार की जातीय राजनीति से प्रभावित पूर्वांचल की 124 सीटों पर भी भाजपा की नैया डांवाडोल है। उसने 2017 में सुहेलदेव के नेतृत्व वाली भासपा के ओमप्रकाश राजभर से समझौता करके जातीय समीकरण अपने पक्ष में कर लिये थे लेकिन इस बार सुभासपा ने समाजवादी पार्टी से गठबंधन कर लिया है। साथ ही योगी मंत्रिमंडल से स्वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह चौहान ने चुनाव से पहले ही इस्तीफा देकर भाजपा को बड़ा झटका दिया है। जिसकी भरपाई कर पाना भाजपा के लिए आसान नहीं है।

हालांकि भाजपा ने भी निषाद पार्टी और अपना दल से समझौता करके कुछ हद तक स्थिति को संभालने की कोशिश जरूर की है। हालांकि अपना दल भाजपा के साथ पहले से ही है लेकिन पूर्वांचल की राजनीति में उसकी स्थिति पहले जैसी नहीं रही क्योंकि वह दो भागों में विभाजित हो गया है और उसका एक गुट सपा गठबंधन के साथ है।

यूपी के चुनावी दंगल में फिलहाल जातीय अस्मिता का रुझान बढ़ा है। यहां साम्प्रदायिक व जातीय समीकरण एक धरातली सच्चाई है, जिससे इंकार नहीं किया जा सकता है। इसलिए यूपी में चुनाव के मंडल बनाम कमंडल होने की भरपूर आशंका है। जिसमें भाजपा मजबूत स्थिति में दिखाई नहीं देती।

छात्रों व बेरोजगारों पर हुई पुलिसिया कार्रवाई का असर

उधर हाल ही में प्रयागराज में लॉज में घुसकर पुलिस ने छात्रों की जिस तरह पिटाई की है, उसका असर भी चुनाव परिणाम पर पड़ने की संभावना है। उधर जनवरी 2018 में 68500 और दिसम्बर 2018 में 69000 सहायक शिक्षकों की भर्ती शुरू हुई थी। इसमें 6000 आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों की नियुक्ति होनी थी लेकिन व्यापक स्तर पर हुई धांधली से मामला खटाई में पड़ गया था। जिसके विरुद्ध आंदोलनरत युवाओं पर पुलिस द्वारा जबरदस्त लाठी-डंडे बरसाये गये थे।

इसके अलावा रेलवे की आरआरबी-एनटीपीसी परीक्षा के घोषित परिणामों में हुई धांधली के कारण बिहार और उत्तर प्रदेश के छात्र आंदोलनरत हैं। छात्रों ने ‘बिहार बंद’ का आह्वान किया था, जिसका असर पटना समेत विभिन्न स्थानों पर देखने को मिला था। अतः किसान आंदोलन की तरह छात्र आंदोलन का भी असर उत्तर प्रदेश के चुनाव पर पड़े बिना नहीं रहेगा।

कांग्रेस की प्रियंका व राहुल गांधी की यूपी की राजनीति में बढ़ती सक्रियता का असर भी दिख रहा है। कांग्रेस अपने खोये हुए जनाधार को फिर से समेटने में लगी है। उनके नाम पर इकट्ठा होने वाली, खास तौर पर महिलाओं और युवाओं की, भारी भीड़ से इंदिरा गांधी का जमाना सामने आ जाता है।

उधर, चंद्रशेखर रावण बिलंब होने के बावजूद भी कुछ छोटे दलों के जातीय क्षत्रपों को बटोरकर एक मोर्चा बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। वे मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के खिलाफ गोरखपुर से चुनाव लड़ने का ऐलान भी कर चुके हैं।

आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल भी इस चुनावी समरांगण में एकला चलो की तर्ज़ पर उतरे हैं। उन्होंने अयोध्या की परिक्रमा, सरयू में स्नान और दर्शन-पूजन करके खुद को रामभक्त साबित करने की औपचारिकता पूरी कर ली है।

उधर, बसपा सुप्रीमो मायावती अपनी पिछली शैली से हटकर ब्राह्मण सम्मेलनों द्वारा प्रदेश के ब्राह्मणों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर एक अलग भूमिका अदा कर चुकी हैं।

यूपी का चुनावी दंगल और ओवैसी की एआईएमआईएम

कांग्रेस और अन्य पार्टियों द्वारा हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) को भाजपा की ‘बी टीम’ कहा जाता है और वे भाजपा विरोधी पार्टियों का वोट बांटने के लिए ओवैसी की आलोचना करती रही हैं।

उत्तर प्रदेश के ताजा विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम द्वारा जारी सात सूचियों में 50 उम्मीदवारों की घोषणा की गई है। जबकि इससे पहले ओवैसी प्रदेश की सौ विधानसभा क्षेत्रों में अपने प्रत्याशी खड़े करने की घोषणा कर चुके थे।

बिहार में ओवैसी की पार्टी नवंबर 2020 में हुए विधानसभा चुनाव में 20 सीटों पर चुनाव लड़ी थी जिनमें से पांच सीटों पर उसे सफलता प्राप्त हुई थी। जबकि मुस्लिम विधायकों की कुल संख्या घटकर 2010 के बराबर पहुंच गई। साल 2020 के चुनाव में यहां कुल 19 मुस्लिम विधायक जीते, जिनमें आरजेडी के टिकट पर सबसे ज्यादा मुस्लिम विधायक जीतकर आये जबकि जेडीयू से एक भी मुस्लिम नहीं जीत सका।

बिहार की सफलता से उत्साहित होकर असदुद्दीन ओवैसी ने पिछले साल अप्रैल-मई में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कुल मिलाकर इन 7 मुस्लिम-बहुल सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे जिनमें से कोई भी जीत दर्ज नहीं कर पाया था। जबकि वहां के इन विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या का प्रतिशत इस तरह है—जालंगी—73, सागरदिघी—65, भरतपुर—58, इतहार—52, रतुआ—41, मालतीपुर—37 और आसनसोल उत्तर—20।

इन क्षेत्रों में मुसलमानों की भारी तादाद होते हुए भी उक्त चुनाव में ओवैसी की पार्टी का ऐसा बुरा हाल हुआ कि मई में आये नतीजों के अनुसार उसे एक प्रतिशत वोट भी नहीं मिले।

अब पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम ने अपना ध्यान सिर्फ उत्तर प्रदेश पर ही केंद्रित किया है, जहां अन्य राज्यों की अपेक्षा मुसलमानों की संख्या अधिक है। इससे भी कांग्रेस व अन्य दलों द्वारा ओवैसी पर भाजपा का एजेंट होने का आरोप सही मालूम होता है। हालांकि उनकी पार्टी ने इस बार उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कुछ हिंदू उम्मीदवारों को भी टिकट दिया है। फिर भी एआईएमआईएम को कोई खास तवज्जो मिलने वाली नहीं है। जबकि रामजन्म भूमि आंदोलन के बाद देश, खास तौर पर हिंदीभाषी राज्यों, की चुनावी राजनीति के बारे में कहा जाता है कि मुस्लिम मतदाता अपने क्षेत्र से ऐसे प्रत्याशी को वोट देना पसंद करते हैं जो भाजपा को हरा सके।

कुल मिलाकर फिलहाल स्थिति यह है कि जिस सूबे के बारे में कहा जाता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है, वहां इस बार भाजपा और उसकी ‘बी टीम’ बताई जा रही असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली एआईएमआईएम का सूपड़ा साफ हो जाये तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यह दशा 2024 में केंद्रीय सत्ता पर पुनर्वापसी की उम्मीद लगाये संघ-भाजपा नेताओं के लिए ख़तरे की घंटी है।

 (श्याम सिंह रावत वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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