Saturday, October 1, 2022

माले विधायक ने विधानसभा में की रूपेश कुमार सिंह की रिहाई की मांग

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भाकपा माले के बगोदर विधायक विनोद कुमार सिंह ने आज 3 अगस्त 2022 को सदन में शून्यकाल के दौरान पत्रकार रूपेश कुमार सिंह की फ़र्जी गिरफ्तारी को लेकर अपनी बात रखते हुए सरकार से मामले को लेकर उच्च स्तरीय जांच व उनकी रिहाई की मांग करते हुए कहा कि “गत 17 जुलाई 2022 को रामगढ़ से स्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार सिंह को खरसावां पुलिस ने गिरफ्तार किया है। कांड्रा थाना में FIR 67/21 दर्ज है। जिसकी इन्हें पहले कोई सूचना नहीं दी गयी। मैं उच्च स्तरीय जांच व रिहाई की मांग करता हूं।”

वहीं झारखंड जन संघर्ष मोर्चा ने एक प्रेस बयान जारी कर कहा है कि विगत 01.08.2022 सोमवार को झारखंड जन संघर्ष मोर्चा के फेसबुक पेज पर एक लाइव सेशन आयोजित किया गया। वक्ता के रूप में असिस्टेंट प्रोफेसर रजनी मुर्मू जो कि झारखंड जन संघर्ष मोर्चा की संयोजक भी हैं, को आमन्त्रित किया गया। मॉडरेटर विक्रम जो की स्वतंत्र पत्रकार हैं, उन्होंने सेशन शुरू करते हुए बताया कि यह लाइव एक श्रृंखला का पात्र है, जिसमें झारखंड सरकार और पुलिस के द्वारा किए जा रहे दमन पर चर्चा की जाएगी। इस चर्चा का विषय “रूपेश कुमार सिंह की पत्रकारिता पर निशाना क्यों?” था।

चर्चा के शुरुआत में रूपेश जिस तरह से जमीनी स्तर के मुद्दों पर अपनी रिपोर्टिंग करते थे, जिन मुद्दों को “वैकल्पिक प्रगितिशील” मीडिया तक भी छूना नहीं चाहती, के बारे में बात की गई। रूपेश आदिवासी मुद्दों पर खासकर के अपनी रिपोर्टिंग करके अपनी बात रखते थे।

विक्रम ने 2019 में रूपेश की पहली गिरफ्तारी की बात याद करते हुए कहा कि उस समय पेगासस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके रूपेश की पार्टनर और उनकी बहन के मोबाइल की जासूसी की गई थी। आजकल के ज्यादातर मीडिया कंपनी जन विरोधी मुद्दों को लेकर सरकार से सवाल ना करने की बजाय निचले पद वाले अफसरों से सवाल करती हैं, जबकि रूपेश का सीधा सवाल उस सरकारी संगठन से होता था, जिसके वजह से वह मुद्दा उत्पन्न हुआ। इस बात को लेकर रजनी जी ने इस बात पर जोर डाला की जो सरकार से डायरेक्ट सवाल करेगा उस पर दमन जोर शोर से होगा। रूपेश ना सिर्फ सरकारी संगठनों का विरोध करते थे बल्कि आजकल के सवर्ण “प्रगतिशील” मीडिया कंपनी जो जमीनी स्तर और आदिवासी मुद्दों की तरफ ध्यान नहीं देती है, उनका भी पुरजोर विरोध करते थे।

रजनी और विक्रम दोनों ने कहा कि पत्रकारों को किसी भी जगह की रिपोर्टिंग करके उस बारे में भूल नहीं जाना चाहिए बल्कि वहां के नियमित अपडेट लेते रहना चाहिए। रजनी ने गिरिडीह में अपने निजी अनुभव को याद करते हुए बताया कि कैसे वहां के सीआरपीएफ कैंप की वजह से डर का माहौल रहता है, बिना बात के ग्रामीणों के साथ हाथापाई करना और उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में दखल डालने का काम किया जाता है।

हाल में गुमला और सरायकेला – खरसावां में हुई गिरफ्तारी को लेकर रजनी कहा कि आदिवासी समाज के मुख्यमंत्री होने की वजह से सरकार के खिलाफ लड़ाई अपनों के खिलाफ लड़ना जैसा हो जाता है। आगे UAPA का इस्तेमाल कर के कैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं, जनपक्षधर पत्रकारों, कलाकारों का दमन किया जा रहा है, उस बात पर भी चर्चा हुई। इस बात पर भी रोशनी डाली गई कि जिस एफआईआर के तहत रूपेश की गिरफ्तारी हुई है, वह एफआईआर किसी और के नाम पर दर्ज था और रूपेश का नाम अलग फर्जी तरीके से डाला गया है।

भगवान दास किस्कू, जो कि ग्रामीण डॉक्टर के रूप में काम करते थे, जिन्होंने हेमंत सोरेन को सीआरपीएफ कैंप के विरुद्ध एक मेमोरंडम दिया था, उन्हें भी फर्जी तरीके से गिरफ्तार करके आज महीनों बाद तक जेल में रखा गया है। सरकार के नतीजों के खिलाफ और उत्पीड़ित समाज के पक्ष में लिखने वालों पर सरकार और पुलिस हमेशा नजर रखती है और उनको पकड़ने की खोज में रहती है, जो काफी खतरनाक है।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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