Wednesday, December 7, 2022

दुमका में डायन बिसाही का आरोप लगाकर पीटा, मैला पिलाया और गर्म लोहे से दागा, आरोपी गिरफ्तार

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झारखंड में अंधविश्वास इस तरह हावी है कि डायन बिसाही और ओझागुनी के नाम पर प्रताड़ना और हत्याओं का सिलसिला थमता नहीं दिख रहा है। आए दिन ऐसी घटनाएं खबरों की सुर्खियां बनती रही हैं। राज्य में अंधविश्वास की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि डायन-बिसाही व ओझागुनी के नाम पर प्रताड़ना व हत्याएं आम बात हो गई हैं।

इसके पीछे के असली कारणों को हम देखें तो ग्रामीण क्षेत्र के आदिवासी समाज में अशिक्षा व जागरूकता का घोर अभाव है। वैसे तो ऐसे अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता के नाम पर कई सामाजिक संगठन काम करते हैं, लेकिन इसका प्रभाव इस समाज पर इसलिए नहीं पड़ पाता है कि कुछ एनजीओ इस काम को दुकानदारी समझकर खानापूरी करके अपनी पीठ थपथपाकर अपनी जिम्मेवारी से मुक्त हो जाते हैं और आंकड़ों में उनकी दी गई जागरूकता दर्ज हो जाती है।

इसी प्रताड़ना की कड़ी में झारखंड की उपराजधानी दुमका जिले के असवारी गांव के एक आदिवासी परिवार की तीन महिलाओं सहित चार लोगों को गांव के ही दबंगों (वे भी आदिवासी) ने डायन बताकर 24 सितंबर की रात को उन्हें पीटा और उसके बाद मैला पिलाकर लोहे की गर्म छड़ से शरीर के कई जगहों पर दागा। इतना ही नहीं इन दबंगों ने इस धमकी के साथ कि अगर मामले की जानकारी पुलिस को दी तो इसका अंजाम और भी बुरा होगा, दूसरे दिन 25 सितंबर को भी इन्होंने पीड़ित परिवार के सदस्यों को पीटा और मैला पिलाया।

पीड़ित परिवार का कहना है कि 24 सितंबर की रात गांव के मुनि सोरेन, लखीराम मुर्मू, सुनील मुर्मू, उमेश मुर्मू, मंगल मुर्मू, ज्योतिन व कुछ लोग सोनामुनी के घर में घुस गए। सभी ने 55 साल की रसी मुर्मू, सोनमुनी, श्रीलाल मुर्मू व कोसो को पकड़कर पीटा। इनको डायन कहकर मैला पिलाया। इतने पर संतोष नहीं हुआ तो उनके शरीर को गर्म लोहे से दागा और धमकी दी कि अगर पुलिस को कुछ भी बताया तो अंजाम और बुरा होगा। इसी डर के कारण सभी लोग सारी रात घर में दर्द से तड़पते रहे। जबकि वे 25 सितंबर की सुबह पुनः घर आए और उन सबको पीटा और मैला पिलाया।

ऐसा देख किसी ने सरैयाहाट थाना प्रभारी को इसकी जानकारी दी।

सूचना पाकर सरैयाहाट थाने की पुलिस गांव गई सबसे पहले पीड़ित परिवार के चारों सदस्यों को इलाज के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया। वहीं गंभीर रूप से घायल 47 साल की सोनामुनि टुडू, उसके बेटे 27 साल के श्रीलाल मुर्मू को बेहतर इलाज के लिए रेफर किया गया। पीड़िता कोसो मुर्मू के बयान पर गांव के छह लोगों पर मामला दर्ज किया गया है। मामले में आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है।

श्रीलाल का आरोप है कि गांव के ज्योतिन मुर्मू के इशारे पर वारदात को अंजाम दिया गया है।घायल श्रीलाल ने बताया कि ज्योतिन मुर्मू ने एक बैठक कर उनके खिलाफ डायन होने का षड्यंत्र रचा है। उसके कहने पर ही वारदात को अंजाम दिया गया। हालांकि इन्‍हें आरोपी क्यों डायन कहते थे, इस बारे में पीड़ित परिवार को कुछ भी नहीं पता है।

वहीं गांव वालों ने पुलिस को बताया कि पीड़ित महिलाएं पूजा-पाठ ज्यादा करती थीं इसलिए कुछ लोगों को शक था कि वे लोगों पर भूत-प्रेत करती हैं। यही वजह है कि जब भी किसी का पशु भी बीमार पड़ता था, तो आरोपी उसके लिए इन्हीं महिलाओं को जिम्मेदार ठहराते थे। इस बार भी कुछ ऐसा ही था।

इस संबंध में सरैयाहाट के थाना प्रभारी विनय कुमार ने बताया कि कोसो के बयान पर गांव की ही छह लोगों को नामजद आरोपित बनाया गया है। इन लोगों की पिटाई कर मैला पिलाया और लोहे की छड़ से दागा भी है। पिटाई के कारण का पता लगा रहे हैं।

थाना प्रभारी विनय कुमार ने बताया कि उन्हें जबरन मल-मूत्र पिलाया गया और गर्म लोहे की छड़ों से शरीर को दागा भी गया है। अमानवीय प्रताड़ना का यह दौर 24 सितंबर की रात आठ बजे से 25 सितंबर तक चला। थाना प्रभारी ने बताया कि अस्वारी गांव के ही लोगों ने जादू-टोनाकरने के शक में तीन ग्रामीण महिलाओं- रसी मुर्मू (55), सोनमुनी टुड्डू (60) और कोलो टुड्डू (45) तथा श्रीलाल मुर्मू नामक 40 वर्षीय पुरुष की जमकर पिटाई की तथा उसके बाद उन्हें जबरन मल-मूत्र पिलाया।

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अस्पताल में भर्ती पीड़िता।

उन्होंने बताया कि घटना के बाद पीड़ित परिवार इस कदर सहमा हुआ था कि किसी ने पुलिस से मदद मांगने की हिम्मत तक नहीं की। जब 25 सितंबर को घटना की जानकारी मिली तो हमने गांव में जाकर चारों पीड़ितों को छुड़ाकर इलाज के लिए सरैयाहाट के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया, जहां से चिकित्सक ने सोनामुनी टुड्डू और श्रीलाल मुर्मू की गंभीर स्थिति को देखते हुए बेहतर इलाज के लिए उन्हें देवघर के एक अस्पताल भेज दिया। थाना प्रभारी के अनुसार मामले में प्राथमिकी दर्ज कर ली गयी है और आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है।

ऐसा झारखंड में पहला मामला नहीं है। डायन बिसाही का आरोप लगाकर महिलाओं सहित पुरुषों को भी प्रायः प्रताड़ित किया जाता रहा है। यहां तक कि कई मामलों में ग्रामीणों द्वारा बैठक करके इनकी हत्याएं भी की जाती रही हैं।

हाल ही में गत 6 सितंबर, 2022 को रांची जिले के सोनाहातु थाना क्षेत्र में तीन महिलाओं की डायन बिसाही का आरोप लगाकर हत्या करके शवों को पहाड़ पर फेंक दिया गया।

खबर के मुताबिक सांप काटने से होने वाली मौत और गांव में कुछ लोगों के बीमार पड़ने के कारण यह अफवाह फैलाई गई कि इसके पीछे डायन बिसाही है। इसी अफवाह पर सोनाहातु थाना क्षेत्र के राणाडीह गांव की तीन बुजुर्ग महिलाओं पर डायन बिसाही का आरोप लगाकर उनको लाठी डंडे से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई।

इतना ही नहीं मृतका राइलू देवी के बेटे से भी यह स्वीकार कराया गया कि उसकी मां और गांव की दो अन्य महिलाएं ढोला देवी और आलमोनी देवी डायन बिसाही का कार्य करती हैं। जिसके बाद गांव में एक सभा की गई और तीनों की पीट-पीटकर हत्या कर शवों को पहाड़ पर फेंक दिया गया।

बताते चलें कि गत फरवरी 2019 में दुमका के देवघर के पास जरमुंडी के बरमासा गांव में एक बुजुर्ग महिला पर डायन का आरोप लगाकर पीटा ही नहीं गया बल्कि उसे निर्वस्त्र भी कर दिया गया। उक्त बुजुर्ग महिला के साथ-साथ उसकी पुत्रवधू और बेटी के साथ भी लोगों ने मारपीट की। उसे और उसकी बेटी को लोगों ने दिन भर बंधक बनाकर रखा। हुआ यह था कि दुमका से एक राजनीतिक रैली से 2 फरवरी, 2019 को लौट रहे एक 50 वर्षीय बुजुर्ग सोना लाल किस्कू बस की सीट पर मृत पाए गए थे, जिसके लिए ग्रामीणों ने उक्त महिला पर डायन-बिसाही का आरोप लगाकर उसके साथ मारपीट की और निर्वस्त्र कर घुमाया। जबकि उक्त बुजुर्ग की मौत ठंड लगने से हो गई थी।

कहना ना होगा कि अंधविश्वास इस तरह हावी है कि डायन बिसाही और ओझागुनी के नाम पर महिलाओं की प्रताड़ना और हत्याएं आए दिन खबरों की सुर्खियां बनती रही हैं। राज्य में अंधविश्वास की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि डायन-बिसाही व ओझागुनी के नाम पर प्रताड़ना व हत्याएं आम बात हो गई हैं। ऐसा नहीं है कि इस अंधविश्वास में हुए अपराध पर कार्रवाई नहीं होती। आए दिन इन मामलों के आरोपी को जेल जाना पड़ रहा है, सजा भी होती है बावजूद इसके यह अंधविश्वास थम नहीं रहा है। इसके पीछे का असली कारण आदिवासी समाज में अशिक्षा व जागरूकता का अभाव है।

वैसे तो ऐसे अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता के नाम पर कई सामाजिक संगठन काम करते हैं, लेकिन इसका प्रभाव इस समाज पर इसलिए नहीं पड़ पाता है क्योंकि कुछ एनजीओ इस काम को दुकानदारी समझकर खानापूरी करके अपनी पीठ थपथपाकर अपनी जिम्मेवारी से मुक्त हो जाते हैं और आंकड़ों में उनकी दी गई जागरूकता दर्ज हो जाती है। ऐसा इसलिए होता है कि आगे की उनकी दुकान पुनः सजती रहे।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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