Friday, August 12, 2022

कृषि कानूनों में काला क्या है -8:कार्पोरेट जमींदारी लागू हो रही है तो अकबर के ज़माने की जमींदारी प्रणाली क्या बुरी थी?

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देश की आज़ादी के बाद ज़मींदारी का उन्मूलन हुआ जिसे भूमि प्रबन्धन व्यवस्था के तहत सम्राट अकबर और औरंगजेब के शासनकाल में लागू किया गया था और जिसे अंग्रेजों ने भी थोड़े परिवर्तन के साथ भारत में लागू रखा| आजाद भारत में भूमि सुधार के तहत कांग्रेस सरकार ने जमींदारी उन्मूलन कानून बनाकर ज़मींदारी प्रणाली समाप्त कर दी|वर्ष 2000 में तत्कालीन अटल वाजपेयी सरकार ने विशेष अर्थिंक जोन (एसइजेड या सेज) के नाम पर कार्पोरेट जमींदारी कायम करने की कोशिश की और कौड़ियों के मोल कार्पोरेट्स को हजारों एकड़ जमीन दी गयी|अब यह कहने का कोई मतलब नहीं है कि 21वर्ष बाद एक भी सेज सफल नहीं रहा|अब मोदी सरकार ने तीनों नए कृषि कानून बनाकर कार्पोरेट्स का खेती पर कब्जा करने के प्रयासों को संपूर्णता की ओर ले जाने का कदम उठाया है। कृषि कानून का काला यही है|   कारपोरेट खेती ही सरकार को अंतिम विकल्प लग रहा है तो फिर अकबर के ज़माने से चल रही जमीन्दारी प्रणाली ही क्या बुरी थी?

जिस तरह दुनिया भर में आबादी बढ़ रही है उसे देखते हुए 30 साल बाद सबसे ज्यादा मांग में खाद्य पदार्थ होंगे और इसकी पूर्ति के लिए खेती किसानी एक नम्बर पर रहेगी इसलिए कार्पोरेट्स पूरी दुनिया में बड़े पैमाने पर खेती की जमीनें खरीद रहे हैं जिनमें भारत भी पीछे नहीं है।उस समय जिसके कब्जे में जितनी ज्यादा जमीन होगी उसकी ही आर्थिक बादशाहत होगी|

क्या आप जानते हैं यह दूसरी बार है विकसित देशों ने तीनों भारतीय कृषि कानूनों का अपना फायदा पहचानते हुए स्वागत किया है| पहले 2008 में जब रमेश चंद्र कमेटी की सिफारिशों पर भारत ने 1932 में बनाए गए रियायती पार्टनरशिप एक्ट की जगह एक नया लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप एक्ट बनाया था जिसके अनुसार विदेशों में बैठे कम से कम दो या दो से अधिक व्यक्ति व्यापारी या व्यापारिक कंपनियां आपस में मिल बैठकर एक कंपनी बनाकर भारत में व्यापार कर सकते हैं| इसके लिए शर्त यही रखी गई थी कि उन्हें भारतीय सदस्य शामिल करना होगा, जो चाहे जिस तरह से की आर्थिक क्षमता ना रखता हो, वह चाहे एक बस चलाने वाला ही क्यों ना हो|

यह कानून बनने के बाद नार्थ अमेरिका के पेशेवरों की एक संस्था ने इसका जोरदार स्वागत स्वागत किया था और खुलेआम कहां था अब हमें मौका मिला है, हमें बाहर बैठे भारत में व्यापार करने का |इस कानून ने तो हमारे लिए भारत के सारे दरवाजे खोल दिए हैं|देश से बाहर बैठे व्यापारियों को इस कंपनी द्वारा किए गए जुर्म वह घर पकड़ना या सजा देना मुश्किल होगा| भारतीय हिस्सेदार की आर्थिक स्थिति अक्षय ना होने के कारण आप कुछ भी नहीं कर सकेंगे|याद करें भोपाल गैस कांड में कई हजार मौतों की सजा तो बाहर बैठे मालिकों को आज तक नहीं दी जा सकी ।

दूसरा अब तीन कृषि कानूनों को लेकर कनाडा के अखबार टोरंटो स्टार में 22 जनवरी 2021 को हिना आलम द्वारा लिखे लेख में बताया गया है कि भारत में बने नए तीन कृषि कानूनों को कनाडा में बड़ी खेती के व्यापारी स्वागत कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें बाहर बैठे हुए भारत के कृषि क्षेत्र में प्रवेश करने का अथवा दखलअंदाजी करने का अवसर मिल गया है।

ब्रिटिश कोलंबिया की एक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शशि इनार्थ ने कहा है कि भारत में बनाए 3 कृषि कानून आप को खुली छूट देते हैं कि कहीं भी आप अपने उत्पादन भेज सकते हो या खरीद सकते हो, क्योंकि भारत सरकार एमएसपी से पीछे हट गई है| इसके चलते भारत में कृषि उपज की कीमतें गिर जाएंगी और कनाडा को अपनी पैदावार भारत में बेचने का अवसर मिल जाएगा| खास तौर पर इसके इसलिए कि भारत सरकार ने आयात पर कोई टैरिफ लगाने की बात इन कानूनों में नहीं की है|

टोरंटो यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर राजी जयरामन का कहना है कि इन कानूनों का विदेश की कृषि उपज को उपरोक्त फायदा होगा| उसका अनुमान है कि भारत का कारपोरेट सेक्टर अपने असर का इस्तेमाल करके भारत में कृषि उत्पादन का भाव दिलाने में सफल हो जाएगा। तब  देश के व्यापारी अपनी कृषि उपज को भारत में बेच सकेंगे| यह काम भारतीय व्यापारी भी कर सकेंगे क्योंकि उनको खरीद करने, भंडारण करने, निर्यात करने या जमाखोरी के लिए पूरी छूट नये कानून में मिल गयी है।

बड़े व्यापारी संस्थान, जिनकी मार्केट पहुंच पूरा विश्व है, जैसे बिल गेट्स माइक्रोसॉफ्ट एप्पल अमेजॉन आदि ने सोचना शुरू कर दिया है कि आने वाला समय सबसे अधिक मुनाफे वाला व्यापार खाद्य होगा, क्योंकि इस धरती के तीन भाग समुंदर हैं, कुछ पहाड़ों नदियों और जंगलों पठारों में है, कृषि योग्य बहुत कम धरती रह जाती है जो मकानों के निर्माण के साथ दिन प्रतिदिन सिकुड़ रही है| आबादी लगातार बढ़ रही है| इसलिए आने वाले समय में 20 30 वर्षों बाद खाद्य वस्तुओं की मांग बहुत बढ़ जाएगी ।जो संस्थान इस समय कृषि योग्य भूमि पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कब्जा कर लेगा वह विश्व की आर्थिकता पर राज करेगा।

इसका उदाहरण या संकेत इस बात से मिलता है कि जान विलियम्स की ओर से यूट्यूब पर दी गई जानकारी के मुताबिक कंप्यूटर जगत के सबसे बड़े व्यापारी बिल गेट्स ने अमेरिका में 250000 एकड़ कृषि योग्य जमीन खरीद ली है|इसके अनुसार 25001 एरिजोना में 45000 एकड़ कैलिफोर्निया में 16000 एकड़ वाशिंगटन में 9201 इन आंखों में 2201 कैलो रोडो में 15000 एकड़ फ्लोरिडा में खरीद रखी है।

लैंड मैट्रिक्स के 2018 के एक सर्वेक्षण के अनुसार दुनिया में कृषि भूमि का 9 फ़ीसदी भोजन की पैदावार के लिए इस्तेमाल किया जाता है| 38 फ़ीसदी जमीन को अन्य वस्तुओं के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है| वर्ष 2000 से 2018 तक कारपोरेट सेक्टर ने 26.5 मिलियन हेक्टेयर खेती वाला रकबा दुनिया में दूसरे देशों में जाकर खरीद लिया है| इन बड़े व्यापारी संस्थानों ने उन देशों को निशाना बनाया है जहां सबसे कमजोर सरकारें हैं और दूरंदेशी उनमें नहीं है, जैसे कांगो सूडान मोजांबिक इथोपिया तथा सेंट्रल मध्य अफ्रीका| कार्पोरेट्स ने करोड़ों की खेत खरीदे हैं| यह खेत नदियों के नजदीक खरीदे गए हैं ताकि इन नदियों के पानी से इनकी सिंचाई हो सके| सऊदी अरब में पानी की कमी के कारण खेती योग्य जमीन नहीं है| सऊदी अरब भी दुनिया में लाखों एकड़ खेती वाला रकबा खरीद रहा है और वहां कांट्रैक्ट फार्मिंग की योजना बना रहा है|

यह रुझान भारत में भी बढ़ रहा है और केंद्र सरकार इसे बढ़ावा दे रही है| देश के कारपोरेट घराने इस कोशिश में है कि उन्हें खुली मार्केट मिले उन पर कोई नियंत्रण ना हो, उन्हें कोई मंडी टैक्स ना देना पड़े और वह अपने मनचाहे कीमतों पर खाद्य उत्पाद अनाज दलहन तिलहन या कुछ भी खरीद सकेंऔर जमाखोरी करके मनमाने दामों पर बेच सकें| मोदी सरकार ने तीनों कृषि कानून बनाकर उनकी मनोकामना पूर्ण कर दी है।

इसके पहले अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भारत में वर्ष 2000 में अलग-अलग स्थानों पर स्पेशल इकोनामिक जोन (एसईजेड) बनाने के लिए हजारों एकड़ जमीन किसानों से अधिग्रहण कर ली गयी थी| यह जमीन बड़े व्यापारिक घरानों को यह कह कर दी थी कि इस जमीन पर बनी सेज को विदेशी इलाका माना जाएगा और आप यहां जो भी पैदावार करोगे वह विदेशी पैदावार मानी जाएगी, आप को कोई टैक्स या टैरिफ नहीं लगेगा, जो वस्तुएं भारत में अन्य स्थानों पर पैदा होकर इस पेज में आएंगी उनको निर्यात या देश से बाहर भेजे जाने वाली वस्तु माना जाएगा तथा शेष से भारत के अन्य भागों में जाने वाली वस्तुओं को भारत को आयातित अर्थात विदेश से आई वस्तु माना जाएगा।

इस तरह हजारों एकड़ जमीन किसानों से लेकर हरियाणा के दिल्ली और दूसरे शहरों के आसपास कारपोरेट घरानों को दे दी ग,ई जिस पर न सेज बनी, न कारखानों का निर्माण हुआ ना ही  व्यापारिक कारोबार हुआ। देशभर में 800 सेज यूनिट बनाए गए और कौड़ियों के भाव हजारों एकड़ जमीन एक एक सेज में कारपोरेट को दे दिए गए।

एक केस में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के संज्ञान में आया कि से जमीनें तो खेती के लिए कारपोरेट घरानों द्वारा प्रयोग की जा रही हैं, तो सरकार से इस बाबत पूछा गया तो सरकार ने बजाए इसके किए जमीने किसानों को वापस दे दी जाए उल्टा ऑर्डिनेंस जारी करके और उसे बाद में कानून बना दिया और यह प्रावधान कर दिया कि अगर किसी उद्योगपति ने उद्योग के लिए जमीन दी है और उसके प्रयोग की तब्दीली के लिए दरख्वास्त दे रखी है तो इस जमीन पर भूमि सुधार अधिनियम लागू नहीं होगा। इस तरह के कदम पंजाब सरकार ने भी बाद में उठाए।

मोदी सरकार के नए तीनों कृषि कानून कारपोरेट का खेती पर कब्जा करने के प्रयासों को संपूर्णता की ओर ले जाने का कदम  है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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