Wednesday, August 10, 2022

कृषि कानूनों में काला क्या है-9: देश की खाद्य सुरक्षा और गरीबों की राशन वितरण प्रणाली को पलीता

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तीनों कृषि कानून केवल किसानों के अस्तित्व पर ही सवाल नहीं उठा रहे बल्कि आने वाले समय में यदि सरकार आर्थिक तंगी का हवाला देकर आम गरीबों को सस्ता राशन उपलब्ध कराने से हाथ खड़े कर दे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। एसेन्शियल कमोडिटीज अमेण्डमेण्ट एक्ट 2020 में साफ साफ लिखा गया है कि यह पीडीएस और टारगेटेड पीडीएस योजनाओं में ‘फिलहाल लागू नहीं किया जायेगा’ यहां ‘फिलहाल’ शब्द का चयन खतरे की घंटी का काम करता है,क्योंकि यह इस  बात का संकेत है कि राशन (पीडीएस) व्यवस्था भी ‘फिलहाल’ के लिए ही है।दूसरी ओर सरकार का दावा है कि देश की खाद्य सुरक्षा और गरीबों की राशन वितरण प्रणाली पर इन कानूनों का कोई असर नहीं पड़ेगा। अगर ऐसा है तो फ़िलहाल शब्द का इस्तेमाल क्यों किया गया है?कृषि कानून में काला यह भी है।

एसेन्शियल कमोडिटीज अमेण्डमेण्ट एक्ट कम्पनियों को मनमाफिक मात्रा में खाद्यान्न एवं अन्य वस्तुओं की जमाखोरी करने की छूट देता है। इसका सीधा अर्थ  है कि खाद्य सामग्री की कीमतों, जमाखोरी की सीमा और काला बाजारी पर अब कोई कन्ट्रोल नहीं रहेगा। बाजार पूरी तरह से बड़े कॉरपोरेशनों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के नियंत्रण में आ जायेगा। इसका यह भी अर्थ है कि पीडीएस योजना से लाभ उठाने वालों को अब डाइरेक्ट कैश ट्रान्सफर योजना में ले आया जायेगा। खाद्य सुरक्षा में डाइरेक्ट कैश ट्रान्सफर का लगातार विरोध हो रहा है, फिर भी अब पीडीएस से लाभ उठाने वाले गरीबों को सीधे खुले बाजार से खाद्यान्न खरीदने को मजबूर किया जायेगा।

देश के गरीब किसानों की फसल की उचित मूल्य पर खरीद की गारंटी और आम गरीबों को सस्ता राशन उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से 1964 में संसद में एक कानून पारित कर 1965 में फूड कॉरपोरेशन ऑफ इण्डिया (एफ.सी.आई.) की स्थापना की गई थी। यह सरकारी कॉरपोरेशन आज भी भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने का सबसे बड़ा इंजन है।मोदी सरकार निजी पूंजीपतियों के हितों को साधने के लिए एफसीआई को बरबाद करने पर तुली हुई है।इन तीन कानूनों ने तो एफसीआई का डेथ वारण्ट ही लिख दिया है।

गौरतलब है कि 22 जनवरी 2015 को मोदी सरकार ने एफसीआई को पुर्नगठित करने के लिए एक हाई लेवल कमेटी की रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें एफसीआई का निजीकरण करने, गरीबों की जनवितरण प्रणाली का कवरेज घटाने और खाद्य राशन वितरण की जगह डाइरेक्ट कैश ट्रांसफर करने की सिफारिशें की गई थीं। इसके एक साल बाद ही एफसीआई के निजीकरण की प्रक्रिया को शुरू करने की दिशा में ‘प्राईवेट ऐन्टरप्रिन्योर गारंटी स्कीम’ लायी गई,जिसके तहत अडानी की कृषि व्यापार कम्पनियों को खाद्यान्न के निजी गोदाम (ग्रेन साइलोज) बनाने की अनुमति दे दी गई। इतना ही नहीं, एफसीआई से कह दिया गया कि वह अडानी के निजी ग्रेन साइलोज का खाद्यान्न 10 साल तक खरीदने की गारंटी दे, बिना यह चिन्ता किये कि उनमें अनाज कितना रहेगा।

इन पांच सालों के दौरान मोदी सरकार की कारगुजारियों के चलते एफसीआई पर 2.65 लाख करोड़ रु. का कर्जा चढ़ गया है क्योंकि सरकार ने बजट में फूड सब्सिडी हेतु जरूरी पर्याप्त फण्ड एफसीआई के लिए जारी नहीं किये। इस कारण एफसीआई को बैंकों और नेशनल स्माल सेविंग्स फण्ड से पैसा उधार लेना पड़ा। एफसीआई पर इतना कर्ज चढ़ा दिया गया है कि अब मोदी सरकार घाटा दिखा कर आसानी से इसे बंद करने अथवा, यह भी सम्भव है, अपने क्रोनी पूंजीपतियों के हाथों सस्ते में बेचने की बात भी कर सकती है?

दरअसल नब्बे के दशक से ही भारत की सरकारें कृषि और किसानों पर कॉरपोरेट शिकंजा मजबूत बनाने के लिए काम कर रही हैं।आज भारत की कृषि में लगने वाले 70 फीसद से ज्यादा बीज, खाद, कीटनाशक आदि की सप्लाई के बाजार पर केवल चार बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कब्ज़ा है,जिनमें बायर-मॉन्सेटो, केमचाइना-सिनजेन्टा ,डाउ-ड्यूपॉन्ट और बीएएसएफ शामिल है।इसी तरह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एग्रोकेमिकल्स, फार्म मशीनरी, कृषि उत्पाद प्रसंस्करण, कमोडिटी ट्रेडिंग और खुदरा सुपरमार्केट आदि के उत्पादन व व्यापार पर मात्र चार दैत्याकार बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेशनों ए.डी.एम.,बन्ज, कारगिल और लुई ड्रेफस का नियंत्रण है।  

डाउ उसी यूनियन कार्बाइड का नया नाम है, जिसने 1984 में भोपाल गैस कांड किया था और बगैर कोई जिम्मेदारी लिए साफ बच कर भाग गई थी।इन दैत्याकार बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेशनों का सरकारें कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं।भोपाल गैस कांड इसका एक छोटा सा उदाहरण है।आज भारत की सरकार अपने किसानों को बचाने की बजाय, उन्हें इन हत्यारी कॉरपोरेशनों के हवाले करने जा रही है।

मोदी सरकार ने किसानों को लाभ पहुंचाने के नाम पर ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ शुरू कराई है, इससे केवल और केवल बीमा कम्पनियां और भ्रष्ट लोगों को ही फायदा पहुंचा है।किसानों को कुछ नहीं मिल सका। पिछले दो सालों में बीमा कम्पनियों ने इस योजना के तहत कुल रु. 15,795 करोड़ का मुनाफा बनाया,जबकि एक आरटीआई कार्यकर्ता की पहल पर पता चला कि इन्हीं दो सालों में इन कम्पनियों ने रु. 2,800 करोड़ के किसानों के क्लेम का भुगतान करने से मना कर दिया। इस योजना में मोदी सरकार ने कुल 18 कम्पनियों को लाइसेन्स दे रखा है, जिनमें 13 ने तो अकूत मुनाफा बटोरा।

भारत के किसान चारों तरफ से बरबाद हो रहे हैं। वे कर्ज में फंसे हुए हैं। यहां तक कि बड़ी संख्या में आत्महत्यायें कर रहे हैं। 2019 में हर रोज कृषि पर निर्भर 28 लोगों ने मजबूरी में आत्महत्यायें कीं।इस आंकड़े में उन महिला, दलित व आदिवासी किसानों की संख्या शामिल नहीं है, जिन्हें किसान के रूप में मान्यता ही नहीं दी गई है।

पिछले तीन दशकों में, जबसे नव उदारवाद शुरू हुआ है, थोड़ा-थोड़ा करके सरकार ने कम्पनियों के पक्ष में बहुत से नीतिगत बदलाव कर दिये हैं, जो किसानों की बरबादी का कारण बन गये हैं। लेकिन इन तीन कानूनों के माध्यम से सरकार ने किसानों के ऊपर निस्संदेह अब तक का सबसे बड़ा और बर्बर हमला किया है। 

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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