Thursday, August 18, 2022

कश्मीर को हिंदू-मुस्लिम चश्मे से देखना कब बंद करेगी सरकार?

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पाकिस्तान में प्रशिक्षित और पाक-समर्थित आतंकवादी कश्मीर घाटी में लंबे समय से सक्रिय हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी की घोषणा करते समय दावा किया था कि इससे कश्मीर घाटी में आतंकवाद पर नियंत्रण पाने में मदद मिलेगी। कश्मीर से संविधान के अनुच्छेद 370 और 35ए को हटाते समय भी यही तर्क दिया गया था।

इस माह (मई 2022) पाक-समर्थक अतिवादी संगठन कश्मीर टाईगर्स द्वारा राहुल भट्ट नामक एक कश्मीरी पंडित की हत्या कर दी गई। यह एक दुःखद और चिंताजनक खबर है। सरकार और सत्ताधारी दल के मुखर नेताओं ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली है और व्हाटसएप यूनिवर्सिटी को कश्मीरी मुसलमानों को कटघरे में खड़ा करने का एक और मौका मिल गया है। सच यह है कि इस कुत्सित घटना को एक आतंकी संगठन ने अंजाम दिया है जिसके सदस्यों को हर तरह के अमानवीय कार्य करने का प्रशिक्षण पाकिस्तान में स्थित शिविरों में दिया गया है। ये शिविर अमरीका द्वारा उपलब्ध करवाए गए धन से संचालित हैं।

कश्मीर में जो अव्यवस्था फैली हुई है उसके पीछे कई कारक हैं। कश्मीर की स्वायत्तता में शनैः-शनैः कमी किए जाने से वहां के युवाओं में आक्रोश और अलगाव का जो भाव उत्पन्न हो गया था उसी का लाभ उठाते हुए हमारे पड़ोसी देश ने अमरीका की मदद से घाटी में आतंकवाद को हवा दी। अमरीका का लक्ष्य पश्चिम एशिया के कच्चे तेल के संसाधनों पर अपना कब्जा बनाए रखना है। इसके अलावा, कश्मीर, भौगोलिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण स्थान पर है और इसलिए भी अमरीका वहां अपना दखल बनाए रखना चाहता है।

पूर्व में प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने कश्मीरी असंतुष्टों के विभिन्न समूहों से वार्ता करने का प्रयास किया था। उन्होंने बिल्कुल ठीक कहा था कि कश्मीर मसले का हल इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत से निकाला जा सकता है। बाद में डॉ. मनमोहन सिंह ने भी इस समस्या के सुलझाव के लिए असंतुष्टों से बातचीत करने की पेशकश की थी। आज जहां वाजपेयी के प्रयासों की चर्चा ही नहीं की जाती वहीं डॉ. मनमोहन सिंह की यासीन मलिक से मुलाकात को इस तरह से प्रस्तुत किया जाता है मानो कांग्रेस ने आतंकवाद को प्रोत्साहन दिया था।

विश्वनाथ प्रताप सिंह के शासनकाल में रूबैया सईद के अपहरण के बाद आतंकियों को जेल से रिहा किया गया था। उस पर कोई बात नहीं की जाती परंतु कश्मीर की वर्तमान स्थिति के लिए कांग्रेस को दोषी ठहराया जाता है। इस समय जरूरत इस बात की है कि कश्मीर को उसकी स्वायत्तता फिर से लौटाई जाए और वहां प्रजातंत्र की जड़ें गहरी की जाएं। इसकी जगह वहां केन्द्र सरकार का शासन कायम कर दिया गया है और प्रजातांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर किया जा रहा है। घाटी में सेना और अन्य सशस्त्र बलों की भारी मौजूदगी से नागरिक जीवन प्रभावित हो रहा है। सन् 2014 में मोदी के शासन में आने के बाद से घाटी में प्रजातंत्र की बहाली के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए हैं।

हम सबको मालूम है कि यूपीए शासन काल में कश्मीरी पंडितों को उनकी मातृभूमि में वापस बसाने के लिए गंभीर और ईमानदार प्रयास किए गए थे। यह तय किया गया था कि सबसे पहले वहां कुछ पंडित परिवारों को फिर से बसाया जाए। इसके लिए पर्याप्त धनराशि भी आवंटित की गई थी। यूपीए ने वार्ताकारों का एक दल, जिसमें दिलीप पडगांवकर, एमएम अंसारी और राधा कुमार शामिल थे, को कश्मीर भेजा था। इस दल ने घाटी का गहन दौरा किया और बड़ी संख्या में आम रहवासियों और विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियों से बातचीत की। अपनी रिपोर्ट में दल ने कहा कि कश्मीर में शनैः-शनैः स्वायत्तता की बहाली की जानी चाहिए। परंतु इस रपट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

संविधान के अनुच्छेद 370 को कश्मीर से हटाना हमेशा से भाजपा के एजेंडा में रहा है। ऐसा बताया जाता था कि यह कश्मीर की समस्त समस्याओं को हमेशा के लिए हल कर देगा। आज अनुच्छेद 370 को हटे दो वर्ष बीत चुके हैं। कश्मीर में नागरिकों का जीवन अब भी दूभर है और राज्य में नीति निर्माण में प्रजातांत्रिक संस्थाओं का कोई हस्तक्षेप नहीं है। राहुल भट्ट की हत्या से यह बहुत साफ है कि घाटी में सुरक्षा की स्थिति कतई बेहतर नहीं हुई है।

राज्य में प्रजातांत्रिक सिद्धातों की किस हद तक अवहेलना की जा रही है यह इससे जाहिर है कि लेफ्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा ने हत्या के विरोध में प्रदर्शन कर रहे कश्मीरी पंडितों से मिलने से इंकार कर दिया। इसके बाद प्रदर्शनकारी हवाई अड्डे की ओर बढ़ने लगे जहां पुलिस ने अश्रु गैस के गोले दागकर उन्हें तितर-बितर कर दिया। कश्मीर में शासन किस तरह का व्यवहार कर रहा है इसकी बानगी उमर अब्दुल्ला का एक ट्वीट है जिसमें उन्होंने इस घटना को शर्मनाक बताया है। उमर अब्दुल्ला ने लिखा ‘‘यह शर्मनाक है कि न्यायसंगत और औचित्यपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों पर जबरिया रोक लगाई जा रही है। यह कश्मीर के लोगों के लिए नया नहीं है। जब प्रशासन के पास केवल हथौड़ा होता है तो हर समस्या उसे एक कील की तरह नजर आती है। अगर लेफ्टिनेंट गवर्नर की सरकार कश्मीरी पंडितों की रक्षा करने में असमर्थ है तो उन्हें विरोध प्रदर्शन करने का पूर्ण अधिकार है।”

देश में यह धारणा फैलाई जा रही है कि कश्मीर की समस्या हिन्दू-मुस्लिम समस्या है और वहां मुसलमान, अल्पसंख्यक हिन्दुओं का दमन कर रहे हैं। हिन्दी फिल्म ‘कश्मीर फाईल्स’, जिसे शीर्ष दक्षिणपंथी नेतृत्व का पूरा समर्थन प्राप्त है, भी इसी धारणा को मजबूत करने का प्रयास है। सच्चाई इसके विपरीत है। अनंतनाग में विरोध प्रदर्शन कर रहे पंडित यह जानना चाहते हैं कि क्या राहुल भट्ट की हत्या उस नए कश्मीर का नमूना है जिसे मोदी बनाना चाहते हैं। कश्मीरी पंडित उनके शोक के समय में उनका साथ देने के लिए कश्मीरी मुसलमानों के प्रति अपना आभार भी व्यक्त कर रहे हैं।

बार-बार कहा जा रहा है कि केन्द्र सरकार के अधीन कश्मीर का प्रशासन बहुत बढ़िया ढंग से चलाया जा रहा है। परंतु पंडितों का कहना है कि यह कैसा प्रशासन है जिसमें आतंकवादी दिनदहाड़े एक सरकारी दफ्तर में घुसकर एक कमर्चारी की हत्या कर रहे हैं। राहुल भट्ट की पत्नी मीनाक्षी भट्ट ने कहा कि मोदी और शाह कश्मीरी पंडितों को बलि का बकरा बना रहे हैं और उनका इस्तेमाल अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए कर रहे हैं। मीनाक्षी भट्ट ने दोनों को चुनौती दी कि वे बिना सुरक्षा के घाटी में घूमकर दिखाएं। इसके साथ ही सुरक्षा कारणों से 350 कश्मीरी पंडितों ने सरकारी नौकरियों से त्यागपत्र भी दे दिया।

ऐसा नहीं है कि घाटी में केवल कश्मीरी पंडित परेशान हैं। राहुल भट्ट की हत्या के बाद रियाज अहमद की भी जान ले ली गई। आरटीआई द्वारा हासिल की गई जानकारी के अनुसार पिछले 31 सालों में कश्मीर में आतंकवादियों ने 1,724 व्यक्तियों की हत्या की जिनमें से 89 कश्मीरी पंडित एवं शेष ‘अन्य धर्मों के व्यक्ति’ थे। इस बीच राज्य के विभिन्न हिस्सों से नागरिकों की हत्या की खबरें आती रही हैं। मरने वालों में कश्मीरी पंडितों और मुसलमानों के साथ-साथ देश के अन्य हिस्सों से घाटी में काम करने आए लोग भी शामिल हैं।

साम्प्रदायिक तत्व कश्मीर की स्थिति और उसकी मूल समस्या के बारे में लोगों को गुमराह कर रहे हैं। राहुल भट्ट और रियाज अहमद की हत्या का मूल कारण एक ही है। राहुल भट्ट की हत्या का स्थानीय मुसलमानों द्वारा कड़ा विरोध यह साबित करता है कि सामाजिक स्तर पर आज भी मुसलमानों और हिन्दुओं में एका बना हुआ है।

(लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं। अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया ने किया है।)

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