Tuesday, November 29, 2022

नेहरू ने कभी नहीं कहा था-मैं शिक्षा से अंग्रेज, संस्कृति से मुस्लिम और जन्म से हिंदू हूं

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नाज़ियों और फासिस्टों के भारतीय चेले वर्षों तक पं. जवाहरलाल नेहरू का विभिन्न तरीकों से चरित्र-हनन करते रहे हैं। आज भी यह सिलसिला उनके फ़र्ज़ी उद्धरणों और फोटोशॉप तस्वीरों के माध्यम से निरंतर जारी है। खुद को उनके सामने बौना पाते हुए उनकी वैश्विक प्रसिद्धि से जले-भुने लोगों के इस खास वर्ग द्वारा सोशल मीडिया में उनका लगातार अपमान किया जाता रहा है।

ऐसी ही मनगढ़ंत कहानियों में उनकी आत्मकथा के हवाले से फैलाया जाता रहा यह जबरदस्त झूठ भी शामिल है कि उन्होंने स्वयं अपने बारे में कहा था—”मैं शिक्षा से अंग्रेज, संस्कृति से मुस्लिम और हिंदू सिर्फ जन्म के एक संयोग से हूं” (I am English by education, Muslim by culture and Hindu by an accident of birth)।

सबसे पहले यह अफवाह उड़ाने वाले थे—डॉ. नारायण भास्कर खरे। वे 1926 में नागपुर से प्रकाशित मराठी अखबार ‘तरुण भारत’ के संस्थापक-संपादक थे। उन्होंने 1916 में अपनी राजनीति की शुरुआत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से की और 1938 तक इसके सदस्य रहे। वायसरॉय की कार्यकारी परिषद के सदस्य के रूप में भी कार्य किया। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हुए और फिर 1935 के अधिनियम के बाद जब 1937 में ब्रिटिश भारतीय प्रांतों के लिए चुनाव हुए तो वे मध्य प्रांत (वर्तमान मध्य प्रदेश) और बरार के मुख्यमंत्री हुए। तब इनके मंत्रिमंडल में द्वारिका प्रसाद मिश्र और रविशंकर शुक्ल भी हुआ करते थे।

रविशंकर शुक्ल, द्वारिका प्रसाद मिश्र और डी.एस. मेहता को बर्खास्त करने के कारण कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस ने एनबी खरे के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर उनको जुलाई 1938 में पार्टी से बाहर कर दिया तो राज्य का मुख्यमंत्री प. रविशंकर शुक्ल को बनाया गया। इससे खार खाये खरे ने महात्मा गांधी और सरदार पटेल पर ‘टु माय कंट्रीमेन: माई डिफेंस’ शीर्षक से पार्टी से बाहर करने का आरोप लगाते हुए एक पैम्फलेट लिखा।

इसके बाद डॉ. नारायण भास्कर खरे ने हिंदूवादी ताकतों से संपर्क किया और अलवर राज्य के प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिये गये। फिर संविधान सभा में भी अलवर प्रतिनिधि के रूप में शामिल किये गये।

महात्मा गांधी की हत्या के बाद खरे को नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे के साथ साजिश का हिस्सा होने के संदेह में दिल्ली में नजरबंद कर दिया गया लेकिन सबूतों के अभाव में छोड़ दिये गये। उन्हें फरवरी 1948 में संविधान सभा और अलवर राज्य के प्रधानमंत्री के पद से भी बर्खास्त कर दिया गया। इसके बाद एन.बी. खरे 15 अगस्त, 1949 को हिंदू महासभा में शामिल हुए और 1949 से 1951 तक इसके अध्यक्ष और 1954 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा के उपाध्यक्ष रहे।

इसी दौरान नारायण भास्कर खरे 1952 में लोकसभा के पहले चुनाव में दक्षिणपंथियों की वित्त-पोषक देसी रियासतों में प्रमुख रहे ग्वालियर से निर्वाचित भी हुए। नेहरू के बारे में भारत और विदेश की कई प्रतिष्ठित राजनीतिक हस्तियों की टिप्पणियों का संकलन कर रफीक ज़कारिया द्वारा 1959 में प्रकाशित पुस्तक ‘ए स्टडी ऑफ़ नेहरू‘ में एक योगदानकर्ता एन.बी. खरे भी हैं। इस पुस्तक के पृष्ठ 215 पर ‘द एंग्री एरिस्टोक्रेट‘ शीर्षक से खरे का लेख, नेहरू पर एक आलोचना है। इसमें उन्होंने दावा किया है कि नेहरू ने अपनी आत्मकथा में कहा है कि ‘वे (नेहरू) शिक्षा से अंग्रेज, संस्कृति से मुस्लिम और जन्म की दुर्घटनावश हिंदू हैं।’

झूठ-कपट और छल-प्रपंच का मायाजाल फैलाने वाले नाज़ियों के भारतीय संस्करण संघियों ने बरसों बाद एक पतली सी पुस्तिका निकाली जिसमें एक पृष्ठ पर यह कथन नेहरू द्वारा स्वयं के बारे में कहना बता दिया गया। आज यह कथन सोशल मीडिया और तमाम वेबसाइट्स पर मौजूद है, जो गूगल करने पर दिखाई दे जाता है।

नेहरू की वैश्विक स्तर पर समादृत राजनीतिक विचारधारा और उनकी विरासत दक्षिणपंथी सगठनों तथा सोशल मीडिया नेटवर्क के लिए एक प्रकार का मानसिक अभिशाप है। इसीलिए नेहरू की तमाम बातों के साथ-साथ उनकी वंशावली, सुभाष चंद्र बोस व सरदार पटेल से उनके सम्बंध, उनकी शिक्षा नीति और आरएसएस के साथ उनके समीकरण आदि-इत्यादि को लेकर अफवाहें उड़ाई जाती हैं। देश के पहले प्रधानमंत्री प. जवाहरलाल नेहरू अपनी मृत्यु के पांच दशक से भी अधिक समय बाद आज तक आमजन के बीच एक चर्चित व्यक्तित्व बने हुए हैं तो दक्षिणपंथियों के लिए ईर्ष्या-द्वेष के केंद्र हैं।

सत्य से डरने वाले तथा झूठ-कपट और छल-प्रपंच का मायाजाल फैलाकर लोगों को भ्रमित कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने वाले विकृत मानसिकता से ग्रस्त अन्य संघियों की तरह नारायण भास्कर खरे के पास इतिहास में याद किये जाने के लिए नेहरू को दी गई गालियां भर थीं लेकिन भले ही उन गालियों के श्रेय से भी आदत से मजबूर संघियों ने उनका नाम मिटा दिया है परन्तु इन असत्य-प्रचारकों के प्रेरणास्रोत बी.एन. खरे को हिन्दुस्तान जरूर याद रखेगा।

(श्याम सिंह रावत वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल नैनीताल में रहते हैं।)

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