Wednesday, July 6, 2022

“भूख से भी बड़ी कोई महामारी होती है क्या बाबूजी?”

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अब कहां? अब कहां? अब कहां? यह सवाल संगम की ओर जाते हर रास्ते पर चादर बिछाये थाल कटोरा लिये बैठे हजारों महिलाओं-पुरुषों की आंखों में गहरी उदासी के साथ बैठा है। दो महीने पहले गंगा किनारे लगा मेला महाशिवरात्रि के साथ ही पूरी तरह से उजड़ चुका है। पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा का एक महीने का कल्पवास कर कल्पवासी कब के विदा हो चुके हैं। एक बार संगम नहाने आने वाले स्थानीय और दूरस्थ श्रद्धालुओं और दाता-धर्मियों, दाता-दानियों का तांता भी अब टूट चुका है।

हां कुछ लोग अब भी संगम नहाने आ जा रहे हैं बस उन्हीं पर उम्मीदें टिकाये ये लोग बैठे हुये हैं। जिनमें से अधिकांश लोग उन्हें उपेक्षा और तिरस्कार भरी नजरों से देखते हुये आगे बढ़ जाते हैं, और रास्ते में बैठे ये भिक्षुक काफी कुछ महाप्राण निराला की पंक्तियों ‘भूख से सूख ओठ जब जाते/ दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते/ घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते’ चरित्रार्थ करते हुये सब कुछ पी जाते हैं।

न इनके लिये जगह एलॉट की गई थी, न टेंट लगाया गया था। ये तो बिन बुलाये मेहमान की तरह खुद ब खुद चले आये। और नालों के पास साड़ियों के छोटे-छोटे तंबुओं को तानकर अपनी अलग ही दुनिया बसा ली। जिसमें घर गृहस्थी के नाम पर फटे पुराने चादर कंबल और टेढ़े मेढ़े थाल कटोरा भर हैं। साड़ी के तंबू के बाहर गंगा के बालू से चूल्हा तैयार कर लिया। खर पतवार इकट्ठा कर उनसे ईंधन का काम ले लिया।

सुबह के वक्त बड़े हनुमान और संगम किनारे कुछ लोग पूड़ी सब्ज़ी बांटने पहुंचे तो सारे मांगने वाले उनकी ओर दौड़ पड़े। और एक-एक पत्तल पूड़ी सब्जी लेकर अपनी-अपनी जगहों पर फिर जा बैठे। इतनी सुबह भला कौन पूड़ी बांटता है? ज़रूर कल की बासी होगी एक ने कहा। दूसरे ने कहा तो भिखारियों को कौन ताजा खाना देता है रे। तीसरे ने कहा सब्ज़ी इतनी ज़्यादा दे रहे हैं और पूड़ी सिर्फ़ दो। संगम नहाकर हाथ में मिठाई का डिब्बा लिये लौटती एक महिला बारी-बारी से मांगने वालों की थाली में एक एक लड्डू रखते हुए आगे बढ़ चली। किसी ने कहा कि लगता है कोई मुराद पूरी हुई है।     

तंबू के आगे कुछ बुझे चूल्हे देख मैंने एक से पूछा क्या यहां भी चूल्हा जलाने की नौबत आती है तो उसने जवाब में कहा- ‘हां’। मैंने कहा मेले में तो भंडारा चलता था, कहने लगा हां चलता तो है लेकिन लोग पंडों और श्रद्धालुओं को खिलाते हैं भिखारियों को नहीं। कोई दानदाता बाहर से खाना लेकर आ जाता है तो उनको भी बांट देता है। कई बार यह शादी-ब्याह, तेरही का बचा हुआ बासी खाना होता है। जो पंडे पुजारी और संपन्न श्रद्धालु नहीं खाते। मैंने बारी-बारी से यहां बैठे कई लोगों से बात की। कुछ ने अपना नाम बताया, कइयों ने नहीं बताया।

दिलचस्प बात यह थी कि यहां उत्तर प्रदेश के दूर दराज़ के जिलों के ही नहीं बल्कि कई राज्यों से भी लोग आये हैं। यानि कि भीख मांगने के लिये भी ये लोग लंबी यात्रायें करते हैं। एक एक बुजुर्ग महिला बांदा जिले से आई थीं नाम था उनका अनारकली। दायें पैर में लकवा मार दिया है। दवा नहीं मिली। अब दूसरों के सहारे ही उनका जीवन चलता है। पूछने पर बताया कि मेला खत्म होने के बाद वो बँधवा के लेटे हनुमान मंदिर के पास बैठेंगी। एक सज्जन सागर, मध्यप्रदेश से आये थे। अब वो यहीं के होकर रह गए हैं।

एक बुजुर्ग महिला सीतापुर जिले से आई हैं। एक प्रतापगढ़ से, एक हरदोई से। नाम पूछने पर सब बताने से हिचकिचाती हैं। एक बुजुर्ग महिला मेरे वीडियो बनाने पर नाराज़गी जाहिर करती हैं। फिर सवालिया अंदाज में पूछती हैं कि भर्ती करोगे बाबू। उन्होंने कहा कि “मेरी भी फोटो ले लो मुझे भी जेल में भर्ती कर दिहे मालिक”। मैंने कहा क्यों भर्ती करेंगे जेल में। उन्होंने कहा तो हम ग़रीब लोगों की फोटो लेकर क्या करेगा बेटा, हमारे नाम का क्या करेगा। जो तेरे से बन पड़े हम ग़रीबों को दे दो बेटा।

बुजुर्ग महिला शोषण पर आधारित इस क्रूर व्यवस्था की साक्षात शिकार थीं। अपनी लाचारगी का इज़हार करते हुये कहती हैं, “ऐ बेटा हमारे बाप दादा मर गये आपका दिया कौरा खाते हुये हम लोग भी मर जायेंगे। बेटा आपका कौरा खाते-खाते। बच्चे हैं अब चाहे वो मजूरी करके खायें चाहे मांगकर खायें।” बुजुर्ग महिला का यह बयान सुनकर विष्णु खरे की कविता ‘एक कम’ की पंक्तियां “लेकिन पूरी तरह तुम्हारे संकोच लज्जा परेशानी /या गुस्से पर आश्रित/ तुम्हारे सामने बिल्कुल नंगा निर्लज्ज और निराकांक्षी/ मैंने अपने को हटा लिया है हर होड़ से” की याद आ सकती है लेकिन सच कह रहा हूँ मुझे उस वक्त खुद पर, अपनी परंपरा पर, इस सरकार पर, इस व्यवस्था पर गुस्सा आ रहा था।

बुजुर्ग महिला ने स्वास्थ्य बीमा कार्ड की ज़रूरत और न होने की अपनी लाचारगी पर मुझसे आगे कहा कि मेरी आंख में तकलीफ़ है। हमारा वो 2 लाख का जो बीमा कार्ड है वो भी नहीं बना कि बीमार हों तो कहीं इलाज करवा लें। बीमार हो जाऊँगी तो लड़के लोग टांग उठाकर फेंक देंगे। सरकार राशन तो दे रही है पूछने पर बुजुर्ग महिला कहती है राशन तो दे रही है बेटा लेकिन पैसा नहीं दे रही। साग-सब्जी-दाल कहां से लायें। सूखा कोई खाता है कि हमीं खा लें। 10 रुपये बुढ़िया को देकर आगे बढ़ा। आगे से गुज़रते ही एक दूसरी अधेड़ मांगने वाली कटोरा आगे कर देती है। साथ में बैठी 8-9 साल की नातिन के पपराये होंठों और सूनी आंखों में सिक्कों की याचना है।

बाल में मुट्ठी भर गर्द और बालू। मैं पूछता हूं कहां की हो। वो बताती हैं जसरा गौहनिया की। मैं पूछता हूं सरकार राशन नहीं देती। तो कहती हैं राशन खर्चा मिलता तो यहां भीख क्यों मांगती बाबू। न घर है न बार। न आधारकार्ड बना है न राशनकार्ड। मैं पूछता हूँ वोटर कार्ड बना है। बुजुर्ग महिला तपाक से कहती हैं वोट मांगने दौड़े आवत हैं कि मोदी के दा, ता केका दा। लेकिन गरीबन के ध्यान नाहीं देते। खाय के लिये मरित हइ भैय्या। फिर एक और 10 के सिक्के टिकाकर आगे बढ़ा। मेरी समझ में एक बात आई की करुणा भी सामर्थ्य की अधीन होती है। चार भिखारी, 10 भिखारी, 25 भिखारी को देने के बाद घटते आर्थिक सामर्थ्य के साथ व्यक्ति में निष्ठुरता आने लगती है।

तपती धूप में छाता ताने लेटी रीवां से आयी एक महिला ने बताया कि अधिकांश भिखारियों के पास राशन कार्ड नहीं है। और अधिकांश लोग भीख मांगते हुये शहर दर शहर राज्य दर राज्य भटकते रहते हैं। इसे मोदी सरकार की भाषा में कहूँ तो ‘बेगिंग टूरिज्म’ या ‘बेगिंग ट्रावेलिंग’ करते हैं। ये लोग पिछले साल की शुरुआत में लगे हरिद्वार कुम्भ में भी गये थे लेकिन कोरोना के चलते उन्हें वहां नहीं बैठने दिया गया था। बाँदा जिले से आये एक अधेड़ शख्स से मैं पूछता हूं कि कोरोना महामारी में जब मंदिर और धार्मिक मेले बंद थे तब कैसे ग़ुजारा किया। जवाब में उसने बताया –“भूख से भी बड़ी कोई महामारी होती है क्या बाबूजी?”

मैहर से आये एक अधेड़ शख्स से मैंने पूछा कि वहां तो शारदा मैय्या का मंदिर है वहां छोड़ यहां क्यों चले आये। तो उसने बताया कि यहां से जाऊंगा तो वहीं बैठूंगा। वहां सारा मेला नवरात्रों में लगता है। अधेड़ आयुवर्ग के फतेहगढ़ के सतनाम सिंह प्रतापगढ़ के अंजनी को देख मुझे तमाम लोगों की बातें याद आई जो कहते हैं कि ये लोग कामचोर, आलसी होते हैं। मैंने उन लोगों से पूछा कोई काम क्यों नहीं करते। दोनों ने एक स्वर में कहा- दिला दो बाबूजी? मुझे घर बैठे अपने बेरोज़गार भाइयों और गांव के बेरोज़गार युवाओं का चेहरा याद हो आया।

फिल्म ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ और कुछ कार्पोरेट अख़बारों की रिपोर्ट्स भी याद हो आई कि ये लोग किसी संगठित गिरोह के लिये भीख मांगते हैं। लेकिन मुझे वहां कोई अपंग, लूला लंगड़ा, काना, अंधा, भेंगा नहीं दिखा जो अपनी निरीहता की विरुपता से करुणा उपजाकर भीख देने के लिये विवश कर रहा हो। मैंने प्रतापगढ़ के अंजनी से पूछा कि क्या कभी किसी मांगने वालों के गिरोह ने आपको अपने गिरोह में शामिल होने के लिये कहा।

इस पर अंजनी ने कहा कि क्यों हमारी ग़रीबी और लाचारी का मजाक उड़ाते हो साहेब। मैंने बात को घुमाते हुये कहा कि मेरे कहने का मतलब वो नहीं था। दरअसल मैं ये जानना चाह रहा था कि आप लोग जब एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं तो क्या कुछ हमपेशा संगी साथी भी साथ जाते हैं। अंजनी ने दोटूक कहा कि हां कभी-कभी एक साथ जाते हैं जब मेले वगैरह में जाना होता है, वर्ना नहीं। मैंने पूछा आप इतने सारे लोग एक साथ एक कतार में बैठकर भीख मांग रहे हैं आप लोगों का आपस में संबंध कैसा है। और जवाब में ‘हां ठीक है’ कहकर उसने निपटा दिया। 

एकल के अलावा सैकड़ों ऐसे भिखारी भी मिले जो परिवार वाले थे। उनके परिवार में दुधमुंहे बच्चों से लेकर किशोरियों तक सैकड़ों बच्चे दिखे। खिलौनों की जगह कटोरे से खेलते हुये। कटोरे में पड़े सिक्के को उछालते ‘एक रुपिया दई दा बाबू भगवान भला करे’ की रट लगाते। स्कूल क्यों नहीं जाते? ये सवाल पूछना ही फ़िज़ूल जान पड़ा। जिनके पास खाने को रोटी नहीं है, पहनने को कपड़ा नहीं है सिर छुपाने को झोपड़ी नहीं है उनसे शिक्षा की बात क्या करता सो नहीं किया। हां उन लोगों से मिलने के बाद मैं इस सोच में पड़ गया कि मोदी-शाह की ज़ोडी गर असम की तर्ज़ पर कभी देश में एनआरसी ले आई तो इन लोगों का अंजाम क्या होगा? उक्त बुजुर्ग महिला के मुताबिक यकीनन सबको भर्ती कर लिया जायेगा।

(इलाहाबाद से जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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