Sunday, September 25, 2022

अब सत्ता के निशाने पर मेधा पाटेकर, संगठनों ने दर्ज करायी कड़ी प्रतिक्रिया

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छत्तीसगढ़। एमपी के बड़वानी जिले में मशहूर एक्टिविस्ट मेधा पाटेकर के खिलाफ बड़वानी कोतवाली थाने में मामला दर्ज किया गया है। मेधा पाटेकर पर आरोप है कि उनके द्वारा चलाए जा रहे एनजीओ नर्मदा नव निर्माण अभियान में करोड़ों का हेरफेर किया गया है। आदिवासी बच्चों की पढ़ाई के नाम पर राशि लेकर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में लगाई गई है। ये सभी आरोप बड़वानी जिले के टेम्ला के रहने वाले प्रीतम बडोले ने लगाए हैं। पुलिस ने मेधा पाटेकर सहित 11 लोगों पर इस मामले में एफआईआर दर्ज की है। फिलहाल पुलिस इस मामले में मीडिया से बात करने में बच रही है। इस बारे में जब मीडिया ने मेधा पाटेकर से बात की तो उन्होंने इन सभी आरोपों को खारिज कर दिया।

जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय (NAPM) की ओर से जारी वक्तव्य में कहा गया है कि जैसा संचार माध्यमों से ज्ञात हुआ है, मेधा पाटेकर व नर्मदा नव निर्माण अभियान के 11 न्यासियों के खिलाफ मध्य प्रदेश के बड़वानी थाने में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 420 के अंतर्गत प्राथमिकी दर्ज की गयी है। संगठन इस कार्रवाई की भर्त्सना करता है। यह कितनी बुरी बात है कि जनहित में महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश के विस्थापित आदिवासियों व ग्रामीणों और उसमें भी खासकर बच्चों के कल्याण के लिए दो दशकों से काम करने वाले इस किस्म के न्यास पर कुछ निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा ऊल-जलूल आरोप लगाए जा रहे हैं।

ऐसा ज्ञात हुआ है कि भारतीय जनता पार्टी की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के खरगोन के एक कार्यकर्ता प्रीतम राज बडोले ने वित्तीय अनियमितता, धोखाधड़ी व देशद्रोह के आरोप लगाए हैं। कुछ माह पहले गाजियाबाद के संजीव झा ने मेधा पाटेकर व नर्मदा नव निर्माण अभियान के ऊपर इसी तरह के झूठे आरोप लगाए थे। कुछ संचार माध्यमों के अनुसार प्राथमिकी प्रवर्तन निदेशालय ने दर्ज कराई है किंतु अभी तक आरोपियों को कोई सूचना नहीं मिली है। 6 अप्रैल 2022 को नर्मदा नव निर्माण अभियान ने पिछले 17 वर्षों के आय व्यय के ब्योरे के आधार पर इन आरोपों का स्पष्टीकरण दिया है। नर्मदा नव निर्माण अभियान ने कहा है कि उसका हिसाब किताब पूरा है और वह किसी भी जांच में सहयोग करेगी। हालांकि यह स्पष्ट है कि भाजपा मेधा पाटेकर व उनसे जुड़ी संस्था को बदनाम करना चाह रही है।

9 जुलाई को दर्ज प्राथमिकी में नामजद लोग लम्बे समय से जनता के मुद्दों के साथ जुड़े हैं। इसमें वे परिवार भी शामिल हैं जो दशकों से सरदार सरोवर बांध से हुए अन्यायकारी विस्थापन के खिलाफ और न्यायिक आदेशों के आधार पर अपने पुनर्वास की लड़ाई लड़े हैं। अन्य न्यासी घाटी में अधिकार व न्याय के लिए हुए जन आंदोलन के समर्थक रहे हैं व उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, आदि, मुद्दों पर रचनात्मक कार्य को सम्भव बनाया है।

यहां यह बताना जरूरी है कि नर्मदा घाटी के लोगों व उनके समर्थकों ने लम्बे समय से सरकार या निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा उत्पीड़न व बदनामी झेली है। 2007 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने वी.के. सक्सेना (जो अब दिल्ली के उप राज्यपाल हैं) गलत इरादों से दायर एक याचिका को निजी हित याचिका बताया और सक्सेना पर दण्ड लगाते हुआ कहा कि मेधा पाटेकर बांध से विस्थापित लोगों के पुनर्वास के हित हेतु काम कर रही हैं। (10 जुलाई 2007 का फैसला)

किसान, मजदूर, आदिवासी व अन्य समुदायों को अपने अधिकारों के लिए गोलबंद करते हुए व जहां सरकारी सेवाएं पहुंची नहीं हैं ऐसे अंदरूनी आदिवासी क्षेत्र में बच्चों के लिए शिक्षा व अन्य की पहल करते हुए नर्मदा बचाओ आंदोलन ने पिछले 37 वर्षों से बिना रुके तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए संविधान व कानून के दायरे में रहते हुए संघर्ष व रचना के आधार पर काम किया है। मेधा पाटेकर ने पिछले तीन दशकों से देश भर के संघर्षों को समर्थन दिया है व उन्हें मजबूत किया है। यह शर्म की बात है कि सरकार उनकी मदद करने के बजाए ऐसे वंचित तबकों के लिए काम करने वालों को अपराधी ठहराने की कोशिश कर रही है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि ये झूठे आरोप, जिन्हें संचार माध्यम बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करते हैं, उसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं जिसमें नागरिक अधिकारों, मानवाधिकारों के लिए काम करने वालों, सत्य उजागर करने वालों व छात्रों के खिलाफ मुहिम चलाई गई है जो सभी सरकार के जन विरोधी चरित्र व हाशिए पर रह रहे समाज के साथ हो रहे अन्याय को उजागर कर रहे हैं।

जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय भाजपा सरकार द्वारा बदले की भावना से जनहित में काम करने वालों के खिलाफ कार्यवाही की भर्त्सना करता है।

संगठन ने मांग किया है कि मेधा पाटेकर व नर्मदा नव निर्माण अभियान के सभी न्यासियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी तुरंत वापस ली जाए।

उसने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि वह अपनी किसी भी जांच या विधि प्रवर्तन संस्था के माध्यम से कोई जबर्दस्ती न करे।

संगठन उन सभी कार्यकर्ताओं के संगठन बनाने के संवैधानिक अधिकार व स्वतंत्रता के अधिकार के साथ खड़े हैं जो अपने जनहित के काम की वजह से राज्य उत्पीड़न के शिकार हैं।

11जुलाई, 2022: नर्मदा नवनिर्माण अभियान, नर्मदा घाटीके आदिवासी, किसान, मजदूर, मछुआरे आदि समुदायोंके साथ दशकों से कार्यरत संस्था के खिलाफ झूठे आरोप लगाने की साजिश फिर से शुरू हुई है । मेधा पाटेकर और नर्मदा नवनिर्माणके 11 विश्वस्तों के नाम दाखिल की हुई शिकायत के आधार पर दर्ज किया FIR अभी तक कोई जाँच न होते हुए ही दर्ज किया गया है ।

उसमें लगाए गए आरोप, जैसे जीवनशालाओं के बच्चों की शिक्षा तथा अन्य शिक्षा विषयक कार्य के लिए पायी राशि राष्ट्र विरोधी कार्य पर खर्च की गयी, सभी झूठे है। पूर्व में की गई इस प्रकार की शिकायतों पर संगठन के लोग और विश्वस्त जवाब दे चुके हैं । सर्वोच्च अदालत ने जुलाई 2007 में जो फैसला दिया, उसमें नर्मदा आंदोलन पर लगाये आर्थिक स्रोतों के संबंध में किये गये आरोप झूठा साबित हो चुके हैं।

शिकायतकर्ता प्रीतमराज बडौले,जो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एवं राजनीति से जुड़ा व्यक्ति है, उसने अपने वक़्तव्य में कहा है कि नर्मदा नवनिर्माण अभियान की जीवनशालाएं अस्तित्व में ही नहीं है। यह सरासर झूठ एवं मेधा पाटेकर और अभियान के निर्माण कार्य को बदनाम करने की साजिश है  हम इसे धिक्कारते हुए यह दावा करते हैं कि तकरीबन 30 वर्षों से शुरू होकर जारी रही जीवनशालाओं से हजारों आदिवासी बच्चे शिक्षित होकर आगे बढ़े हैं। जीवनशालाओं के ही लिए दिया गया कोई भी चंदा किसी भी राष्ट्रविरोधी कार्य के लिए उपयोग में नहीं लाया गया है ।

नर्मदा नवनिर्माण अभियान संवैधानिक मूल्यों की चौखट में शिक्षा के साथ पुनर्वास और अन्य कार्यक्षेत्रों में भी सक्रिय है। हमारे हर कार्य के लिए जमा की गयी तथा खर्च की गयी राशि का हिसाब, ऑडिट एवं सभी कागजात वैध रूप से रखे जाते हैं । इस पर बेबुनियाद आरोप की शिकायत पर निष्पक्ष जाँच ही सच्चाई साबित कर सकती थी। बिना जाँच के अपराधी प्रकरण दर्ज करने की प्रक्रिया यही दर्शाती है कि हमारे सामाजिक कार्य को बदनाम और बरबाद करने की साजिश है! हमारे राष्ट्रहित में,गरीब,श्रमिकोंके साथ चल रहा कार्य इस साजिश से  रुकेगा नहीं ।

उन्होंने इन सभी आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कहा कि हमारे पास सभी दस्तावेज और प्रमाण हैं, जिसने भी ये शिकायत की है उसे भ्रमित किया गया है। उन्होंने कहा कि हमने पैसे का इस्तेमाल लोगों को आजीविका पैदा करने में मदद करने के लिए किया है और करते रहेंगे। 

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन संयोजक मंडल ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि नर्मदा बचाओ आंदोलन एवं नर्मदा नव निर्माण अभियान के साथियों के  खिलाफ हुई FIR न तो उस अन्याय पूर्ण विकास और दमन की दास्तां को बदल पाएगी और न उसके खिलाफ हुए ऐतिहासिक संघर्ष को बदनाम कर पाएगी।

मेधा पाटेकर और नर्मदा नव निर्माण अभियान के संघर्षशील साथियों के खिलाफ FIR की छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने भी निंदा की है।उसने FIR को तत्काल निरस्त करने की मांग की है। देश भर में जाने माने बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को झूठे आरोपों में उलझाने की यह अगली कड़ी है, और इसी के कारण एक भय और आतंक का माहौल पैदा किया जा रहा है, जिसमें लोकतंत्र घुट रहा है और सरकार की तानाशाही को बढ़ावा मिल रहा है।

पिछले तीस वर्षों से मेधा जी और नर्मदा बचाओ आंदोलन ने विस्थापित लोगों के अधिकारों के लिए, महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश के मजदूर, किसान, आदिवासी, मछुआरे समुदायों के साथ मिल कर निरंतर संघर्ष किया है। अपनी पूरी जिंदगी नर्मदा की घाटी में डूब में आ रही पूरी एक सभ्यता, असंख्य जिंदगियों को बचाने और उनके बेहतर पुनर्वास में लगा दी। नर्मदा बचाओ आंदोलन ने पूरे देश और पूरी दुनिया में विस्थापन और पुनर्वास की बहस शुरू की। पर्यावरण और न्याय संगत विकास के मुद्दे को प्रमुखता से सामने लाया। 

इन्हीं संघर्षों के कारण देश-विदेश में बड़े बांधों के दुष्प्रभावों पर अध्ययन हुआ जिस के दबाव में आकर विश्व बैंक ने भी इन बांधों में निवेश करने से मना कर दिया। नर्मदा घाटी के इस महत्वपूर्ण संघर्ष ने देश भर में हो रहे लोगों के विस्थापन को एक चुनौती दी, और ऐसे विकास के मॉडल पर सवाल खड़े किए, जिससे आदिवासी, ग्रामीण, वंचित समुदायों  का विनाश हो रहा हो।

संगठन ने कहा कि दर्ज FIR न तो नर्मदा घाटी के उस अन्याय पूर्ण विकास और दमन की दास्तां को बदल पाएगी और न उसके खिलाफ हुए ऐतिहासिक संघर्ष को बदनाम कर पाएगी। 

मीडिया से प्राप्त जानकारी के अनुसार एक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्य, प्रीतम राज बडोले ने बड़वानी थाने  में मेधा पाटेकर, रूमी जहांगीर, विजया चौहान, कैलाश अवास्या, मोहन पाटीदार, आशीष मंडलोई, केवल सिंह बसावे, संजय जोशी, श्याम पाटिल, सुनीति एसआर, नुरजी पदवी व केसव वासवे पर धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज की है। यह सब नर्मदा नवनिर्माण अभियान के ट्रस्टी हैं, और इनमें से कई स्वयं विस्थापित परिवारों से हैं। इस प्रायोजित FIR में जिन ट्रस्टियों के विरुद्ध शिकायत की गई है, उनमें से आशीष मंडलोई का वर्ष 2012 में देहांत हो चुका है। और नुरजी पदवी वर्तमान ट्रस्टी नही हैं।

इससे पहले भी मेधा पाटेकर पर ऐसे ही पैसों की हेरा फेरी के बेबुनियाद इल्जाम लगाए गए हैं, जिसको सुप्रीम कोर्ट ने 2007 में निरस्त कर शिकायतकर्ता पर ही अर्थदंड लगाया था। सीबीए का विश्वास है कि पूर्व के केस की तरह वर्तमान का केस भी द्वेष भावना से राजनैतिक उद्देश्यों के कारण लगाया गया है।

हाल ही में गुजरात के दंगों में न्याय की लड़ाई लड़ने वाली जुझारू वकील तीस्ता सीतलवाड़, और पूर्व डीजीपी आर बी श्रीकुमार की गिरफ्तारी, तथ्य शोधक मोहम्मद जुबैर की गिरफ्तारी, मानवाधिकार के अंतर्राष्ट्रीय संगठन एमनेस्टी और उनके मुख्य कार्यकर्ता आकार पटेल पर कई करोड़ों का अर्थदंड  – ये सब दर्शाते हैं कि किस सुनियोजित तरीके से सरकार अपने आलोचकों को चुप कराना चाहती है। संगठन ने कहा कि हम अपनी आवाज़ ऊंची कर के निम्न मांगे करते हैं-

उक्त प्रीतम राज बड़ोले द्वारा दर्ज किये गए FIR को निरस्त किया जाए, और उस पर आगे कोई कार्यवाही नहीं कि जाए।

 देशभर में सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ झूठे प्रकरणों के सिलसिले को बंद किया जाए। भीमा कोरेगांव केस, दिल्ली दंगों का केस, तीस्ता सीतलवाड़, आर बी श्रीकुमार, सिद्धिकी कप्पन, संजीव भट्ट, मोहम्मद ज़ुबैर इत्यादि राजनैतिक बंदियों को रिहा किया जाए।

देशभर में जो व्यक्ति और संगठन, संविधान के भीतर रह कर सामाजिक, आर्थिक न्याय के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं, उन पर दमनात्मक प्रहार बंद किये जायें। अन्याय के  विरुद्ध आवाज उठाना हमारा अधिकार ही नहीं, ज़िम्मेदारी भी है।

(छत्तीसगढ़ से जनचौक संवाददाता तामेश्वर सिन्हा की रिपोर्ट।)

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