Tuesday, July 5, 2022

पीएम और सीएम का विरोध अगर देशद्रोह है तो फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या हुआ जनाब? 

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यह सवाल उठ सकता है कि 1870 से चले आ रहे इस राजद्रोह कानून पर अभी इतनी कौन सी आफत आ गयी कि सुप्रीम कोर्ट को, इस याचिका पर लगातार सुनवाई करना पड़ा, सरकार को इस पर पुनर्विचार करने का आश्वासन एक हलफनामे के रूप में अदालत में दाखिल करना पड़ा ? इसका उत्तर यह होगा कि 2014 के बाद, जब से, मोदी सरकार सत्ता में आई है तो, धारा 124A आईपीसी के मुकदमे सरकारों ने अधिक दर्ज करने शुरू कर दिए। इसकी प्रतिक्रिया हुई। लोग सजग तथा सतर्क हुए। 2019 के लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस ने इस कानून को खत्म करने की बात अपने घोषणापत्र में भी कही और कुछ याचिकाएं भी दायर हुयीं। 

देश भर के सभी राज्यों में घटित अपराधों के अभिलेखों के रखरखाव का दायित्व नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो का है। लेकिन एनसीआरबी पहले राजद्रोह के केसों का डाटा अलग से नहीं रखता था। उसे अन्य अपराध में डाल दिया जाता था। इसका कारण, इस कानून में दर्ज मुक़दमों की संख्या का कम होना था। लेकिन साल 2014 से NCRB ने इसका डाटा अलग से रखना शुरू कर दिया। पहले भी बहुत से लोगों पर, राजद्रोह के केस लगते रहे हैं, लेकिन साल 2014 में देश में मोदी सरकार के आने के बाद इन केसों की संख्या में अच्छी खासी बढ़ोत्तरी हुयी। 

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, साल 2014 से 2017 के बीच राजद्रोह के 163 मामले दर्ज किए गए और साल 2018-20 तक इन मामलों की संख्या 236 तक पहुंच गई। साल 2010 से साल 2021 तक राजद्रोह के 867 मामलों में 13,306 लोगों को आरोपित किया गया। बिहार, तमिलनाडु और यूपी में इस कानून का खूब इस्तेमाल हुआ, वहीं मिजोरम, मेघालय और नागालैंड में साल 2010 के बाद कोई राजद्रोह का केस दर्ज नहीं हुआ। जिन राज्यों में सबसे ज्यादा राजद्रोह के आरोपी रहे, उनकी संख्या झारखंड में 4641, तमिलनाडु में 3601, बिहार में 1608, यूपी में 1383 और हरियाणा में 509 है।

बिहार में नीतीश कुमार की सरकार के दौरान 161 राजद्रोह के केस दर्ज हुए और 1498 लोग आरोपी बनाए गए। तमिलनाडु में जयललिता सरकार के दौरान 125 राजद्रोह के केस दायर किये गए और 3402 लोग आरोपी बनाए गए। यूपी में योगी सरकार के कार्यकाल में, राजद्रोह के 100 केस फाइल हुए, जिसमें 1049 लोग आरोपी बनाए गए। झारखंड में रघुवर दास की सरकार में 46 राजद्रोह के मामले सामने आए जिसमें 1581 लोग आरोपी बनाए गए। कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी की सरकार में राजद्रोह के 18 मामले सामने आए, जिसमें 77 लोग आरोपी बनाए गए। 

राजद्रोह  के मुकदमों को लेकर निम्न आंकड़े थोड़ा हैरान करने वाले हैं। बीते 11 सालों में जितने राजद्रोह के मामले सामने आए हैं, उनमें से करीब 70 फीसदी मामले, 2014 के बाद सामने आए हैं। 2014 वही साल था, जब देश में मोदी सरकार केंद्र की सत्ता पर काबिज हुई थी। आंकड़ों के मुताबिक, साल 2014 से 595 राजद्रोह के केस सामने आए जो कि 2010 से अब तक सामने आए कुल केसों का 69 फीसदी है। मिली जानकारी के मुताबिक, जिन लोगों पर राजद्रोह के केस लगे, उनमें 653 पुरुष और 94 महिलाओं के केस हैं। 

सुप्रीम कोर्ट ने 11 मई को एक ऐतिहासिक आदेश के द्वारा, भारतीय दंड संहिता की धारा 124A के तहत 152 साल पुराने देशद्रोह कानून को प्रभावी ढंग से तब तक के लिए स्थगित कर दिया है  जब तक कि केंद्र सरकार इस प्रावधान पर पुनर्विचार नहीं कर लेती। पीठ ने यह देखने के बाद इस तरह का आदेश पारित किया कि, 

“केंद्र सरकार का इरादा है कि, वह इस औपनिवेशिक प्रावधान के लिए “पुनर्विचार और पुन: परीक्षा” की आवश्यकता महसूस कर रही है। इसका अर्थ यह है कि सरकार, न्यायालय द्वारा व्यक्त किए गए प्रथम दृष्ट्या दृष्टिकोण से सहमत है कि “124A IPC एक  कठोर प्रावधान है। यह वर्तमान सामाजिक परिवेश के अनुरूप नहीं है और इसका उद्देश्य और उपयोग तब था जब देश औपनिवेशिक शासन के अधीन था”।  इसलिए, कोर्ट ने आदेश दिया कि भारत संघ इस प्रावधान पर पुनर्विचार कर सकता है।

अदालत ने आगे कहा कि, “अदालत एक तरफ, राज्य के कर्तव्य और दूसरी तरफ, नागरिकों की नागरिक स्वतंत्रता के अधिकार के बीच संतुलन की जटिलता से अवगत है। दोनों में, विचार संतुलन की आवश्यकता है। याचिकाकर्ता का कहना यह है कि,

” कानून का यह प्रावधान, 1870 का है और अब इसका दुरुपयोग किया जा रहा है। अटॉर्नी जनरल ने हनुमान चालीसा के पाठ के लिए दर्ज मामलों जैसे स्पष्ट दुरुपयोग के उदाहरण भी दिए थे।”

पीठ ने पहले सॉलिसिटर जनरल की दलील के बाद, याचिकाओं की सुनवाई को तब तक के लिए टालने के केंद्र के सुझाव पर सहमति जताई थी, जब तक कि वह इस प्रावधान पर पुनर्विचार नहीं कर लेती। अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि केंद्र राज्यों को धारा 124ए की समीक्षा पूरी होने तक देशद्रोह के मामले दर्ज नहीं करने का निर्देश जारी करे और उस पर अपनी प्रतिक्रिया मांगी।”

याचिकाकर्ता द्वारा उठाया गया मुख्य तर्क यह था कि, “यदि स्थगन, वास्तव में दिया गया था, तो धारा 124 ए के तहत पहले से दर्ज लोगों के हितों की रक्षा कैसे की जा सकती है और क्या भविष्य के मामलों को पुनर्विचार समाप्त होने तक स्थगित रखा जा सकता है? 

सुनवाई के दौरान, भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को सूचित किया कि, ” एक संज्ञेय अपराध को पंजीकृत होने से नहीं रोका जा सकता है, इस बात को ध्यान में रखते हुए केंद्र द्वारा जारी करने के लिए एक प्रस्तावित मसौदा निर्देश तैयार किया गया है। एक बार संज्ञेय अपराध हो जाने के बाद, केंद्र या न्यायालय द्वारा प्रावधान के प्रभाव पर रोक लगाना उचित नहीं होगा।  इसलिए, मसौदा जांच के लिए एक जिम्मेदार अधिकारी का चयन करने का सुझाव देता है, और उसकी संतुष्टि न्यायिक समीक्षा के अधीन है।”

लंबित मामलों के संबंध में, एसजी ने कहा कि, “वे प्रत्येक मामले की गंभीरता के बारे में सुनिश्चित नहीं हैं। उन्होंने कहा कि इनमें से कुछ लंबित मामलों में ‘आतंक’ का एंगल हो सकता है या धन शोधन (मनी लांडरिंग) शामिल हो सकती है। अंतत: उन्होंने जोर देकर कहा कि, “लंबित मामले न्यायिक मंच के सामने हैं और हमें अदालतों पर भरोसा करने की जरूरत है।”

उन्होंने कहा, “आप का क्या विचार है, अगर धारा 124 ए आईपीसी से जुड़े जमानत आवेदन मुकदमे का एक चरण है, तो जमानत आवेदनों पर तेजी से फैसला किया जा सकता है।”

एसजी ने तर्क दिया कि “किसी अन्य मामले में संवैधानिक पीठ द्वारा बनाए गए प्रावधानों पर रोक लगाने के लिए कोई अन्य आदेश पारित करना सही दृष्टिकोण नहीं हो सकता है।”

सॉलिसिटर जनरल ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि, “इस मामले में आक्षेपित धारा के तहत कोई भी व्यक्तिगत आरोपी अदालत के समक्ष नहीं था। अतः इस जनहित याचिका पर विचार करना इस कारण से एक खतरनाक मिसाल हो सकता है। चर्चा यह नहीं थी कि, क्या केदार नाथ खराब कानून है, लेकिन कानून में परिवर्तन के कारण धारा 124 ए अभी भी संवैधानिक थी या नहीं।  उन्होंने कहा कि अगर यह असंवैधानिक पाया जाता है तो इस पर रोक लगाई जा सकती है।” 

याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई और कहा कि यह पूरी तरह से अस्वीकार्य है। सुनवाई के दौरान, सरकार की तरफ से एक सुझाव यह आया कि राजद्रोह की एफआईआर पर पहले पुलिस अधीक्षक उसका परीक्षण कर लें तब उसे दर्ज किया जाय। 

इस सुझाव पर पीठ के, न्यायमूर्ति कांत ने बताया कि केंद्र के अनुसार, पंजीकरण के पूर्व प्राथमिकी (एफआईआर) की जांच पुलिस अधीक्षक के पास जानी चाहिए थी और फिर पूछा कि याचिकाकर्ताओं ने प्राथमिकी के पंजीकरण की जांच के लिए एक निष्पक्ष प्राधिकारी के रूप में किसे प्राथमिकता दी जाय ?”

इस पर कपिल सिब्बल ने जवाब दिया कि  “प्राथमिकी किसी के पास नहीं जानी चाहिए और इस पर पहली बार में ही अंतरिम अवधि के दौरान रोक लगा दी जानी चाहिए।”

उन्होंने कहा कि “उन्होंने धारा 124ए के संचालन पर रोक लगाने के लिए इस न्यायालय का दरवाजा नहीं खटखटाया है और यह बिंदु, केवल केंद्र द्वारा संकेत दिए जाने के कारण आया है।

न्यायमूर्ति कांत ने कहा कि, “यह बिंदु इस मामले में बाद में आया है, और अदालत केवल अपने हस्तक्षेप के दौरान आक्षेपित धारा के तहत दर्ज मामलों के लिए एक व्यवहार्य समाधान तलाशने की कोशिश कर रही थी।”

न्यायाधीशों ने आपस में एक निजी चर्चा की और उसके बाद, अदालत ने सभी पक्षों से पूछा कि, “वर्तमान में कितने याचिकाकर्ता जेल में हैं।”

वरिष्ठ अधिवक्ता सीयू सिंह ने जवाब दिया कि एक मामले में याचिकाकर्ता को पत्रकार किशोरचंद्र वांगखेम का हवाला देते हुए इस न्यायालय द्वारा संरक्षित किया गया है। मैं इस ओर इशारा कर रहा हूं क्योंकि सॉलिसिटर जनरल ने कहा है कि, कोई भी आरोपी अदालत के समक्ष नहीं है। इस बीच, वरिष्ठ वकील सिब्बल ने प्रस्तुत किया कि वर्तमान में, 13,000 व्यक्ति इस प्रावधान के तहत जेल में बंद हैं।

हालांकि, एसजी ने प्रस्तुत किया कि किशोरचंद्र वांगखेम द्वारा दायर याचिका प्राथमिकी को रद्द करने की नहीं बल्कि धारा 124 ए को असंवैधानिक घोषित करने की मांग करती है।

तब सीजेआई रमना ने तब कहा कि, “बेंच ने विस्तृत चर्चा की थी और उपरोक्त के मद्देनजर, यह पाया गया था कि भारत संघ न्यायालय द्वारा व्यक्त की गई प्रथम दृष्ट्या राय से सहमत है कि धारा 124A की कठोरता, वर्तमान सामाजिक के अनुसार नहीं है।” 

इससे पहले एक अवसर पर, अदालत ने संदर्भ के मुद्दे पर प्रारंभिक तर्क सुनने का फैसला किया था और सभी पक्षों से इस मुद्दे पर अपनी लिखित दलीलें और केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर अपना हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा था।  

अदालत के इस आदेश के अनुसार, भारत के सॉलिसिटर जनरल ने अपने लिखित प्रस्तुतीकरण के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष जोर देकर कहा कि, 

“केदार नाथ सिंह निर्णय, एक अच्छी मिसाल है और इस पर विचार करने की आवश्यकता नहीं है।  उन्होंने यह भी प्रस्तुत किया है कि दुरुपयोग के अलग-अलग उदाहरण, केदारनाथ केस की रूलिंग को उखाड़ने का आधार नहीं हो सकते हैं, जो छह दशकों से अधिक समय तक समय की कसौटी पर खरी उतरी है।”

इस बीच, याचिकाकर्ताओं ने एक आवेदन दायर कर धारा 124ए के संचालन पर रोक लगाने की मांग की थी, अगर अदालत इस मामले को एक बड़ी पीठ को सौंपने का फैसला करती है तो। वैकल्पिक राहत के रूप में, याचिकाकर्ता ने यह निर्देश मांगा कि, मामले के लंबित रहने के दौरान धारा 124ए के तहत देशद्रोह के अपराध के लिए कोई नई प्राथमिकी दर्ज नहीं की जाए और सभी लंबित जांच और कार्यवाही पर रोक लगा दी जाए।

सेना के मेजर-जनरल एसजी वोम्बटकेरे (सेवानिवृत्त) और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा, पत्रकार अनिल चमड़िया, पीयूसीएल, पत्रकार पेट्रीसिया मुखिम और अनुराधा द्वारा दायर रिट याचिकाओं के एक बैच में यह मुद्दा उठा था। 

इस मुकदमे की सबसे महत्वपूर्ण और तार्किक दलील यह थी कि, राज्य और सरकार में अंतर है। दोनों अलग अलग चीजें हैं। सरकार राज्य का पर्याय एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में नहीं हो सकती है। ब्रिटिश राज में यह कानून इसलिए लाया गया था क्योंकि ब्रिटिश राज को हमने चुना नहीं था, वह हम पर थोपा गया था। ब्रिटिश राज थोड़ी बहुत अभिव्यक्ति की आज़ादी भी देता था, पर वह आज़ादी उतनी नहीं थी, जितनी ब्रिटेन के अपने नागरिकों में थी। अंग्रेजों के उपनिवेश के नागरिक, उनके लिए दोयम दर्जे के नागरिक थे। वे उन पर रूल यानी राज करते थे न कि, गवर्न यानी शासन करते थे। वे क्राउन यानी सम्राट थे और हम उनकी प्रजा थे।

ब्रिटिश पार्लियामेंट, सेक्रेटरी ऑफ इंडिया, ब्रिटिश सरकार, भारत की भाग्य विधाता थी, जिसे चुनने में हमारी कोई भूमिका नहीं थी। राजा और प्रजा के बीच में एक चिरन्तन अविश्वास का भाव बना रहता था। तब जनता की हर आलोचना को ब्रिटिश सरकार अपने खिलाफ एक षड्यंत्र मानती थी। तब इस कानून का उपयोग जनता के दमन और राज को येन केन प्रकारेण बनाये रखने के लिए किया जाता था। राज्य और सरकार में कोई अंतर नहीं था। इसीलिए सरकार का विरोध राज्य का विरोध माना और समझा जाता था। 

पर 1947 के बाद जब देश आजाद हुआ और 1950 में गणतंत्र की स्थापना हुयी तो राज्य किसी अन्य देश का नहीं बल्कि जनता का हुआ और जनता ने संविधान के अनुसार जो संसद चुनी, उसके प्रति सरकार जवाबदेह बनी। तब सरकार की आलोचना, राज्य यानी देश के खिलाफ आलोचना नहीं हुई। 2014 के बाद एक और अजीब बात हुई। सरकार की आलोचना तो देशद्रोह मानी ही जाने लगी, बल्कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की आलोचना भी देशद्रोह का अपराध मान कर धारा 124A आईपीसी के अंतर्गत मुक़दमे दर्ज किये जाने लगे।

ऐसी स्थिति में इस कानून का दुरुपयोग और हुआ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जो, सर्वोच्च मौलिक अधिकार है को, इस कानून के द्वारा बाधित करने की कोशिश की गयी। एक बात साफ तौर पर समझने की ज़रूरत है कि सरकार की आलोचना, देशद्रोह नहीं है बल्कि सरकार के कुकृत्यों पर चुप्पी देश की अस्मिता, अस्तित्व और संविधान के विरुद्ध कृत्य है। सरकार को इस कानून पर पुनर्विचार करते समय अभिव्यक्ति की आज़ादी, मौलिक अधिकार, नागरिक अधिकार और देश हित के विभिन्न पहलुओं पर संतुलित दृष्टिकोण से विचार करना चाहिए।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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