Monday, December 5, 2022

शैक्षणिक कट्टरता ने छीना मुस्लिम महिलाओं से शिक्षा का अधिकार: हिजाब प्रकरण पर पीयूसीएल

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इस बात में कोई शक़-ओ-शुबह नहीं है कि धार्मिक कट्टरता समाज को प्रतिगामी, रुढ़िवादी और संकीर्ण बनाती है। और इस बात में भी दो राय नहीं है कि समाज को प्रगतिशील, परिवर्तनकामी और उदार बनाना है तो सबको शिक्षित करना होगा। यानि शिक्षा ही वो हथियार है जिससे धार्मिक व सामाजिक कट्टरता की हदबंदिया टूटती हैं लेकिन यदि शिक्षा देने वाले संस्थान ही कट्टरपन के शिकार हो जायें तो क्या।

हर किसी के लिए शिक्षा सुनिश्चित करना जिनकी जिम्मदारी है वही अनुशासनात्मक कट्टरता के शिकार हो जायें तो क्या। तब दो कट्टरतायें मिलकर शिक्षा को दुरूह व दुष्कर बना देंगे। कर्नाटक राज्य सरकार द्वारा अपने प्रधानमंत्री (जिन्हें एक खास कौम की टोपी और कपड़े से सख्त चिढ़ है) को खुश करने के लिये मुस्लिम लड़कियों व महिलाओं पर यूनिवर्सिटी कॉलेज में हिजाब पहनने पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया गया और न्यायपालिका ने भी उनकी हाँ में हाँ मिलाकर प्रधानमंत्री की इच्छा को राजाज्ञा बना दिया। 

सरकार और कोर्ट के इस फैसले से कर्नाटक की मुस्लिम लड़कियों व स्त्रियों की शिक्षा व शिक्षा के अधिकार व अन्य अधिकारों पर क्या प्रभाव पड़ा इसका विस्तृत अध्ययन करके पीयूसीएल की कर्नाटक इकाई ने एक 43 पन्नों की रिपोर्ट तैयार किया है। अतः कर्नाटक सरकार द्वारा अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी के त्याग पर स्तब्ध मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा के अधिकार की रक्षा, पीयूसीएल कर्नाटक ने करने का फैसला किया और ज़मीनी स्तर पर हिजाब प्रतिबंध के प्रभाव को पूरी तरह से समझने के लिए अध्ययन किया। 

पीयूसीएल की रिपोर्ट टीम के सदस्यों द्वारा कर्नाटक के विभिन्न जिलों की यात्रा करके कर्नाटक की, उन महिलाओं की गवाही को समझा और अपनी रिपोर्ट का आधार बनाया जिन्हें शिक्षा और अन्य हितों से जुड़े अधिकारों से वंचित कर दिया गया है। पीयूसीएल ने अपने अध्ययन रिपोर्ट में दावा किया है कि राज्य सरकार के स्कूल में हिजाब पहनने पर प्रतिबंध लगाने के निर्णय ने कक्षाओं में भाग लेने के दौरान हिजाब पहनने वाली छात्राओं को एक ही झटके में शिक्षा के अधिकार से वंचित कर दिया है। साथ ही उनकी शिक्षा, अभिव्यक्ति का अधिकार और अन्य संबद्ध अधिकार, और यहां तक कि उनकी सुरक्षा को भी ख़तरे में डाल दिया है।

रिपोर्ट के मुताबिक उच्च न्यायालय के दो आदेशों के बाद, जिसने पीयू कॉलेजों में हिजाब को प्रतिबंधित कर दिया, सरकार ने एक अधिसूचना जारी की कि हेडस्कार्फ़ (हिजाब) का निषेध कर दिया यह कहकर कि यह भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 का उल्लंघन नहीं है। इस अधिसूचना ने राज्य में विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों पर हिजाब पहनने वाली छात्राओं के ख़िलाफ़ बदनामी का अभियान शुरू करने के लिए निगरानी रखने वाले तत्वों को खुली छूट दे दी है। राज्य सरकार ने इन स्वघोषित चौकीदारों की जांच करने से इनकार कर दिया है। इस तरह सत्ता की ताकतों ने उन्हें कानून के शासन की किसी भी धारणा से मुक्त कर दिया है। इससे भी आगे जाकर, यहां तक कि इन ताकतों को मौन प्रोत्साहन भी दिया ताकि मुस्लिम महिलाओं को उनके शिक्षा के अधिकार तक पहुंचने से रोकने के सरकार की छुपी हुई लेकिन वास्तविक इरादे वाली नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू करवा सकें।

पीयूसीएल की रिपोर्ट महत्वपूर्ण घटनाओं की समयरेखा प्रदान करके शुरू होती है और फिर इसे नौ अनुभाग में व्यवस्थित किया गया है जिसमें निर्णय की कानूनी आलोचना, उद्देश्य और कार्यप्रणाली, मीडिया की भूमिका, नौकरशाही की प्रतिक्रियाएं, प्रभावित छात्रों पर फैसले का प्रभाव–शैक्षिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक, संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन: का विश्लेषण, छात्र प्रशंसापत्र (testimonies)  निष्कर्ष, और सिफारिशें।

न्यायिक फैसले पर क्या कहती है रिपोर्ट

पीयूसीएल रिपोर्ट ‘रेशम बनाम कर्नाटक राज्य’ के मामले के फैसले की आलोचना करती है। कर्नाटक हाई कोर्ट महत्वपूर्ण अधिकारों और स्वतंत्रताओं को आलोचक की नज़र से देखती है और कहती है कि हिजाब पहनना इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है। अतः संविधान के अनुच्छेद 25 द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उलंघ्घन नहीं करना दरअसल मामले पर ग़लत फोकस करता है। पीयूसीएल की रिपोर्ट न्यायिक फैसले में इस स्पष्ट मूर्खता की ओर इशारा करती है जिसमें शिक्षा को सुनिश्चित करने की कीमत पर स्कूल की एक अनिवार्य विशेषता के रूप में ‘यूनिफॉर्म’ को बनाए रखने की शुचिता को प्राथमिकता देती है और इसके साथ ही अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों की स्वतंत्रता की स्वतंत्रता का उल्लंघन कर उनके साथ भेदभाव करती है। और उसे शैक्षिक स्थानों में संवैधानिक सिद्धांतों के सहारे अमलीजामा पहनाया जाता है।

बाकी रिपोर्ट टीम द्वारा एकत्र किए गए साक्ष्यों के विश्लेषण पर केंद्रित है जो कि विभिन्न श्रेणियों की एक समग्र तस्वीर पेश करती है। इसमें मीडिया की भूमिका, नौकरशाही की भूमिका शामिल है, उन साक्षात्कारों द्वारा उठाई गई चिंताएं, और अधिकारों के उल्लंघन का विश्लेषण, गवाहों के माध्यम से आये हैं, शामिल है।

मीडिया के विश्लेषण से पता चलता है कि कैसे स्थानीय मीडिया ने सिर पर स्कार्फ़ पहने महिलाओं के प्रति घृणा घटना की लपटों को हवा दी, और कुछ मामलों में महिलाओं को उनके कैंपस में परेशान किया जाता है। नौकरशाही अनुभाग में, रिपोर्ट में टीम द्वारा विभिन्न प्रशासनिक शाखाओं के साथ बातचीत जिसमें पुलिस, कॉलेज प्रशासन के सदस्य और समुदाय के सदस्यों के साथ अपनी बातचीत में देखे गए रुझानों को शामिल किया गया है

पीयूसीएल (कर्नाटक) की रिपोर्ट उन विभिन्न तरीकों की ओर इशारा करती है जिसमें निर्णय से प्रभावित पक्षों को बाहर रखा गया था। कॉलेज विकास समिति (सीडीसी) के मामले में लोकतांत्रिक संरचना की कमी एक प्रमुख खामी है। सीडीसी अक्सर जवाबदेही या स्थानीय हितधारकों के प्रतिनिधित्व की किसी भी ठोस प्रणाली के बिना सत्तावादी निकायों के रूप में कार्य किया।

रिपोर्ट कहती है कि स्थानीय पुलिस समुदाय की जकड़न को बढ़ाएगी। रिपोर्ट दस्तावेजीकरण करती है कि कैसे कॉलेज परिसरों में पुलिस की मौजूदगी से हिजाब पहनने वाली छात्राओं में भय की संस्कृति पैदा होगी, और अक्सर स्थानीय समुदाय द्वारा किसी भी तरह की असहमति की अभिव्यक्ति को निषिद्ध करेगी। पुलिस की तैनाती छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने से अधिक आदेश के प्रवर्तन को सुनिश्चित करने से अधिक सुनिश्चित करने पर केंद्रित थी। रिपोर्ट का दूसरा खंड दो व्यापक प्रवृत्तियों की ओर इशारा करता है, एक तो अंतरिम आदेश पारित करने से पहले शुरू होता है जहां छात्रों के ख़िलाफ़ एक बदनामी अभियान चलाया गया बिना किसी बाधा के, और दूसरा अंतरिम आदेश के पारित होने के साथ शुरू होता है जहां सरकारी तंत्र ने मुस्लिम महिलाओं के बहिष्कार के अभियानों में भाग लिया।

रिपोर्ट का तीसरा अनुभाग छात्रों की चिंताओं को, शिक्षा, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक शीर्षकों के तहत समायोजित किया गया है। शैक्षिक सरोकार महिलाओं के संघर्षों पर केंद्रित हैं और उनके शैक्षिक भविष्य के बारे में चिंता, और कैंपस में शैक्षिक प्रमाण पत्र तक पहुंच, कॉलेज परिसरों के भीतर, उत्पीड़न और सुरक्षा के मुद्दों को कवर करना। सामाजिक सरोकारों ने बड़ी चिंताओं पर ध्यान केंद्रित किया है जिसमें व्यापक समाज द्वारा मुस्लिम महिलाओं के सशक्तिकरण के पहले के रुझानों को उलटते हुए हमले की धमकियों द्वारा मुस्लिम स्त्रियों को सार्वजनिक स्थानों से अलग थलग कर दिया जा रहा है।

मनोवैज्ञानिक चिंताओं ने प्रतिबंध से निर्मित डर और घबराहट की भावनाओं पर ध्यान केंद्रित किया। यह खंड राज्य भर के छात्रों द्वारा गूँजती अभिव्यक्ति के साथ समाप्त होता है कि इन समस्याओं का समाधान भारतीय संविधान के वादों को लागू करना है जिससे कि एक शैक्षिक स्थान के भीतर एक सम्मानजनक जीवन के लिए उनके अधिकारों की रक्षा हो। पीयूसीएल की रिपोर्ट का अगला खंड विभिन्न गवाहों के हवाले से कर्नाटक के तमाम जिलों से संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का उदाहरण प्रस्तुत करता है। विश्लेषण शिक्षा संबंधित अधिकारों पर केंद्रित है और यह देखता है कि शिक्षा के साथ अधिकार कैसे जुड़े, यानी: अधिकार जो पूरा करने के लिए आवश्यक हैं शिक्षा का अधिकार और पूर्ण मानव के रूप में शैक्षिक स्थानों में भाग लेने के अधिकार पर हमला किया गया है।

यह खंड विभिन्न शीर्षकों के तहत साक्ष्यों से टिप्पणियों को सारांशित करता है यह दिखाने के लिए कि कैसे इन संबद्ध अधिकारों का व्यवस्थित रूप से उल्लंघन किया गया है। इनमें शामिल हैं: बिना किसी भेदभाव के शिक्षा का अधिकार, गरिमा का अधिकार, निजता का अधिकार, अभिव्यक्ति के अधिकार का अधिकार, गैर-भेदभाव का अधिकार, और मनमानी राज्य कार्रवाई से स्वतंत्रता।

यह खंड इस टिप्पणी के साथ निष्कर्ष पर पहुंचता है कि कैसे प्रतिबंध ने मूल संवैधानिक आदर्शों के लिये ख़तरा पैदा कर दिया है। संवैधानिक नैतिकता की रक्षा करने के अपने दायित्व को पूरा करने में राज्य सरकार पूरी तरह से विफल होने की इस स्थिति में, ये करना नागरिकों का दायित्व व जिम्मेदारी बनती है। चूंकि किसी ने भी ऐसा अधिक अनुग्रह, गरिमा और साहस के साथ नहीं किया है जितना युवा मुस्लिम महिलाओं ने शिक्षा के अधिकार पर दावा किया था। रिपोर्ट उस टीम द्वारा सिफारिशों की एक सूची के साथ समाप्त होती है जो अधिकारों के नुकसान को संबोधित करने की दिशा में राज्य को संबोधित करता है।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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