Tuesday, November 29, 2022

मुर्मू की जीत और सिन्हा की हार तय थी, लेकिन सत्तापक्ष का मंसूबा कामयाब नहीं हुआ!

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इस बार के राष्ट्रपति के चुनाव में यह तो तय था कि भाजपा की अगुवाई वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए जिसे भी अपना उम्मीदवार बनाएगा वह आसानी से और बड़े अंतर से जीत जाएगा। इसके बावजूद तीन दिग्गजों के इंकार के बाद यशवंत सिन्हा ने विपक्ष का उम्मीदवार बनना स्वीकार किया और बहुत कमाल की लड़ाई लड़ी। अपनी तमाम कमियों और सीमाओं के बावजूद उन्होंने पूर्व से पश्चिम तक और उत्तर से दक्षिण तक विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास किया। हालांकि उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद किसी न किसी मजबूरी के चलते कुछ विपक्षी पार्टियों ने उनका समर्थन न करते हुए एनडीए की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में मतदान किया। 

सत्तापक्ष के नेतृत्व का मकसद संभवत: अपनी उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को पिछले चुनाव में रामनाथ कोविंद को मिली जीत से भी बड़ी जीत दिलवाने का था, लेकिन कई तरह जोड़-तोड़ के बावजूद उसका वह मकसद पूरा नहीं हो सका। गौरतलब है कि 2017 में रामनाथ कोविंद 65.65 प्रतिशत वोट लेकर राष्ट्रपति चुने गए थे, जबकि इस बार सत्तापक्ष की तमाम कोशिशों के बावजूद द्रौपदी मुर्मू को 64.03 फीसद वोट ही मिल सके। कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी दल जो पूरी तरह सिन्हा के साथ थे, उनके भी कुछ सांसदों और विधायकों ने किसी न किसी लालच या डर के चलते द्रौपदी मुर्मू को वोट दिया। इसके बावजूद यशवंत सिन्हा करीब 36 फीसदी वोट पाकर 1967 के बाद सबसे ज्यादा वोट हासिल करने वाले विपक्षी उम्मीदवार के तौर पर अपना नाम दर्ज कराने में कामयाब रहे। 

इससे पहले 1967 में राष्ट्रपति पद के लिए हुए चौथे चुनाव में विपक्ष के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे जस्टिस कोटा सुब्बाराव को 43.5 फीसदी वोट मिले थे। तब कांग्रेस के उम्मीदवार डॉ. जाकिर हुसैन 56.2 फीसदी वोट हासिल कर जीते थे। सुब्बाराव सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश पद से इस्तीफा देकर चुनाव मैदान में उतरे थे। राष्ट्रपति पद के लिए यही एकमात्र चुनाव रहा, जिसमें समूचा विपक्ष एकजुट रहा था।

चूंकि डॉ. जाकिर हुसैन का अपने कार्यकाल के दूसरे ही साल में अचानक निधन हो गया था, जिसकी वजह से 1969 में राष्ट्रपति पद के लिए फिर चुनाव हुआ था। हालांकि उस चुनाव में हारने वाले उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को सुब्बाराव से भी ज्यादा यानी 49.10 फीसदी वोट मिले थे और 50.90 फीसदी वोटों के साथ वीवी गिरि जीत गए थे। लेकिन उस चुनाव की गिनती सामान्य चुनावों में नहीं की जा सकती। 

राष्ट्रपति चुनाव के इतिहास का वह चुनाव बेहद असाधारण चुनाव के तौर पर दर्ज है, क्योंकि उसमें जीतने वाले वीवी गिरि और उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी संजीव रेड्डी दोनों ही सत्तारूढ़ कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार थे। संजीव रेड्डी को कांग्रेस पार्टी का समर्थन हासिल था, जबकि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वीवी गिरि को समर्थन दिया था। उस चुनाव में कुछ विपक्षी दलों ने सीडी देशमुख को अपना उम्मीदवार बनाया था, जो जवाहरलाल नेहरू की सरकार में वित्त मंत्री रह चुके थे। इस बेहद कश्मकश भरे चुनाव में पराजित हुए संजीव रेड्डी बाद में 1977 में सातवें राष्ट्रपति चुनाव में देश के पहले और इकलौते निर्विरोध राष्ट्रपति बने।

बहरहाल 1952 में हुए पहले राष्ट्रपति चुनाव से लेकर 2017 में हुए 15वें राष्ट्रपति चुनाव तक सिर्फ एक बार 1967 में ही विपक्षी उम्मीदवार को 40 फीसदी से अधिक वोट मिले हैं। पिछले यानी 2017 के चुनाव में विपक्ष की उम्मीदवार मीरा कुमार को 34.35 वोट मिले थे। उनसे पहले 2012 में 14वें राष्ट्रपति चुनाव में यूपीए उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी के खिलाफ भाजपा के नेतृत्व वाले विपक्ष ने पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पीए संगमा को अपना उम्मीदवार बनाया था, जिन्हें 30.07 फीसदी वोट मिले थे। उनसे पहले 2007 में राष्ट्रपति पद के 13वें चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार भैरो सिंह शेखावत को 34.20 फीसदी वोट मिले थे और 65.80 फीसदी वोटों के साथ प्रतिभा देवी सिंह पाटिल जीती थीं।

उससे पहले 2002 में एपीजे अब्दुल कलाम और 1997 में केआर नारायणन को भाजपा और कांग्रेस सहित लगभग सभी विपक्षी दलों ने समर्थन दिया था। अलबत्ता कलाम के खिलाफ वामपंथी दलों ने कैप्टन लक्ष्मी सहगल को अपना उम्मीदवार बनाया था और नारायणन के खिलाफ शिव सेना के समर्थन से पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन निर्दलीय उम्मीदवार के रूप से मैदान में उतरे थे। इसके बावजूद कलाम और नारायणन 90 फीसदी से ज्यादा वोट लेकर जीते थे। 

इनसे पहले 1992 में 10वें राष्ट्रपति के लिए हुए चुनाव में डॉ. शंकर दयाल शर्मा, 1987 में आर. वेंकटरमन और 1982 में ज्ञानी जैल सिंह भी अपने-अपने खिलाफ उतरे विपक्ष के उम्मीदवारों को काफी बड़े अंतर से हरा कर राष्ट्रपति चुने गए थे। राष्ट्रपति पद के लिए हुए पहले तीन चुनाव तो पूरी तरह एकतरफा रहे थे। 1952 में हुए पहले चुनाव में डॉ. राजेंद्र प्रसाद के केटी शाह को महज 15 फीसदी वोट मिले थे। शाह निर्दलीय उम्मीदवार थे। उसके बाद 1957 में हुए दूसरे चुनाव में डॉ. राजेंद्र प्रसाद को और 1962 में तीसरे चुनाव में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के खिलाफ विपक्ष ने तो कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था लेकिन जो निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में थे उन्हें महज एक फीसद वोट मिले थे।

इस प्रकार देखा जाए तो इस बार विपक्ष के कमजोर होने और सरकार समर्थक मीडिया द्वारा उसके बिखराव का बेवजह शोर मचाने के बावजूद विपक्षी उम्मीदवार यशवंत सिन्हा विपक्ष को बहुत हद तक एकजुट रख कर उसके वोट हासिल करने में सफल रहे।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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