Sunday, January 29, 2023

छह दिसंबर: राजनीतिक हिन्दुत्व का शौर्य और लोकतांत्रिक भारत का शोक दिवस

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6 दिसंबर बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का परिनिर्वाण दिवस और बाबरी मस्जिद का विध्वंस दिवस है। 6 दिसंबर को ही संघ परिवार द्वारा बाबरी मस्जिद ढहाने के लिए चुनना सोचा-समझा राजनीतिक लक्ष्य था। चूंकि बाबा साहब के परिनिर्वाण दिवस को भारत के दलित और लोकतांत्रिक जनगण शोक दिवस के रूप में मनाते हैं और हिंदुत्व का संघी मॉडल समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व की बढ़ती चेतना से हर समय घबराता रहा है। इसलिए उसने 6 दिसंबर के वैचारिक अंतर्वस्तु को बदल देने के लिए बाबरी मस्जिद के विध्वंस के दिन के रूप में चुना।

यह सिर्फ प्रतीकात्मकता नहीं है। बल्कि भारत के वर्णवादी समाज के खिलाफ संघर्ष के महापुरुष के जाने का गम के महत्व को खत्म किया जाना भी है। जो हिंदुत्व की ताकतों की निगाहों में कांटे की तरह चुभता रहा है। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को ढहा कर यह संकेत दे दिया गया था कि अब संवैधानिक उदारवादी लोकतंत्र को जड़ मूल से मिटा देने के लिए वे आवश्यक ताकत इकट्ठा कर चुके हैं।

उस समय लोकतांत्रिक प्रगतिशील वाम ताकतों ने निश्चित ही इस खतरे को गंभीरता से लिया था। क्योंकि उन्होंने देखा कि पहली बार खुले रूप में भीड़तंत्र के समक्ष संवैधानिक संस्थाएं लकवाग्रस्त हो गई हैं। दूसरा, उत्तर प्रदेश की सत्ता पर आक्रामक संघीय नेतृत्व काबिज था। जिसके अगली कतार में जमींदारी उन्मूलन और 40 वर्ष के लोकतांत्रिक प्रयोग से समृद्ध हुआ ओबीसी समूह है। साथ ही संघ की उन्मादी ताकतों ने 6 दिसंबर, 1992 को कांग्रेस के उदार हिंदुत्व को झुकने के लिए बाध्य कर दिया।

तीसरी बात यह है कि उदारीकरण के पहले चरण में भारत का दक्षिण पथगामी होना देशी और विदेशी कॉरपोरेट पूंजी के गठजोड़ को भारतीय संसाधनों के लूट के‌ लिए आवश्यक था।

कांग्रेस के सवर्ण सामंती नेतृत्व के कमजोर लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता के खिलाफ पिछड़ी जातियों के अंदर विकसित हुए शासक वर्गीय समूह (जो मूलतः गांवों में ताकतवर पिछड़ी जातियों से आए नए जोतदार या धनी किसान हैं) सत्ता में भागीदारी के लिए राजनीतिक संघर्ष कर रहे थे। इनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए जनता दल एक संक्रमण कालीन मंच के रूप में काम आया।

संघ परिवार ने पिछड़ी जातियों के नए समूहों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और संख्या बल को देखते हुए लोकतंत्र में इनकी महत्ता को महसूस कर लिया था। इसलिए उसने पिछड़े राजनीतिक समूहों के साथ सहयोग समन्वय  विकसित करते हुए उन्हें जीत लेने की दूरगामी रणनीति अख्तियार की। विहिप द्वारा चलाए गए राम जन्मभूमि आंदोलन में सक्रिय आक्रामक नेताओं के सामाजिक श्रेणियों का गहराई से विश्लेषण किया जाये तो संघ परिवार की दूरगामी परियोजना को समझा जा सकता है।

पिछड़ी जातियों को हिंदू धर्म के व्यापक ढांचे में समायोजित करने के साथ-साथ सत्ता में राजनीतिक हिस्सेदारी की महत्वाकांक्षा को हवा देते हुए भाजपा ने अपना सामाजिक आधार बढ़ाया। 

चूंकि बाबा साहब के प्रति जाति पूर्वाग्रहों के चलते ओबीसी और सवर्ण जातियों में उस तरह का सम्मान नहीं पाया जाता जैसा दलित जातियों में उनके प्रति देखा जाता है। क्योंकि पूंजीवादी नेतृत्व द्वारा बाबा साहब की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता रेडिकल सोच और आधुनिक वैचारिक चेतना संपन्न राष्ट्रीय नेता की छवि को सीमित करके उन्हें सचेत रूप से दलितों का नेता बना देने की कोशिश की गई है। इसलिए पिछड़ी जातियों सहित सवर्ण समाज में बाबा साहब के वास्तविक महत्व को समझने, आत्मसात करने और उनके द्वारा दिखाए गए रास्ते पर चलने में निष्क्रियता या घृणा का भाव मौजूद रहा है।

 इसी समय में कांशीराम सरीखे दलित नेताओं के उभार के साथ दलित राजनीतिक अस्मिता को बुलंद करने में आक्रामक उछाल आया। इस परिस्थिति का लाभ उठाते हुए मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने की पृष्ठभूमि में संघ परिवार ने आक्रामक हिंदुत्व का राजनीतिक एजेंडा तैयार किया।

उदारीकरण की शुरुआत, मंडल कमीशन की रिपोर्ट का लागू होना और राम जन्मभूमि मुक्त आंदोलन के आखिरी चरण यानी बाबरी मस्जिद विध्वंस की पृष्ठभूमि के दौर को अगर आप गहराई से देखें तो इसकी वैचारिक दिशा प्रगतिशील वाम जनवादी लोकतांत्रिक राजनीति के खिलाफ निर्देशित थी।

कांशीराम कट्टर कम्युनिस्ट विरोधी थे। इस विरोध को उन्होंने इस मुहावरे में व्यक्त किया था। ” हरी घास के अंदर छिपे हरे सांप “। चूंकि ग्रामीण गरीबों, दलितों, मजदूरों और कमजोर वर्गों में कम्युनिस्ट पार्टियों खासकर क्रांतिकारी कम्युनिस्टों का ही वास्तविक आधार था। अभी तक जितने भी सामाजिक बराबरी और लोकतांत्रिक अधिकारों के संघर्ष हुए थे सब की अगुवाई मूलतः कम्युनिस्ट ही कर‌ रहे थे।

दूसरी तरफ पिछड़ी और दलित जातियों में आए राजनीतिक उभार में जो लोकतांत्रिक समता मूलक बराबरी की राजनीतिक दिशा थी वह धीरे-धीरे क्षीण होने लगी। अंततोगत्वा क्षेत्रीय पार्टियां और समूह अपना लोकतांत्रिक परिवर्तनकारी आवेग खोकर वाम विरोधी और गैर लोकतांत्रिक अवसरवादी दायरे में कैद हो गईं।

यह नोट करने की बात है कि यह वही दौर था जब राजनीतिक हिंदुत्व के खिलाफ राजनीतिक जातिवाद ने जन्म लिया। इन दोनों के युगलबंदी ने भारतीय राजनीति के लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य को कमजोर कर फासीवाद के विस्तार के लिए उर्वर जमीन तैयार की।

बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद संघ परिवार को उसी तरह का धक्का लगा था। जैसा की 30 जनवरी 1948 को गांधी जी की हत्या के बाद हिंदुत्ववादी राजनीति को लगा था। उस समय हिंदू महासभा और संघ भारतीय राजनीति और समाज में हाशिए पर चले गए थे।

पिछड़ी जातियों में चले सामाजिक सुधारों की मूल प्रवृत्ति अतीत में सवर्ण के रूप में अपने को अभिव्यक्त करने की है। जैसे जनेऊ धारण करना या जातियों के सरनेम के रूप में सिंह या शर्मा लगाने के रूप में दिखा था। साथ ही नारियों को श्रम से मुक्त करने की प्रवृत्ति भी बलवती थी। इस लिए सवर्णों के नक्शे कदम पर चलने और दलितों के खिलाफ दमनात्मक प्रवृत्ति के विकास से पिछड़ों और दलितों में सत्ता संघर्ष शुरू हो गया। संघ परिवार ने इस टकराव का फायदा उठाते हुए कांशीराम मुलायम सिंह को अलग कर दिया। बसपा भाजपा के खेमे में चली गई। वह भी बाबरी मस्जिद के विध्वंस के थोड़े ही दिन बाद। जिसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय राज्य की संस्थाओं के न मिलने आ अंदर हो रहे लोकतांत्रीकरण की गति मंद हो गई।

इस परिघटना ने फिर उसी तरह से हिंदुत्व की राजनीति को वैधता दिलाई जैसा 1974 के जेपी आंदोलन के दौरान हुआ था। उस समय जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहा इंदिरा कांग्रेस विरोधी आंदोलन दक्षिणपंथी दिशा में जाते हुए संघ परिवार के सामाजिक अलगाव को 25 साल बाद तोड़ने में कामयाब हुआ था।

कांशीराम के नेतृत्व में बसपा का अवसरवादी राजनीति का चरण शुरू हुआ। जो 2002 के गुजरात नरसंहार में अकेली पड़ गई भाजपा के राजनीतिक अलगाव को तोड़ने में मायावती के द्वारा गुजरात में चुनाव प्रचार के साथ चरम पर पहुंचा। जिसने आज के दौर में हिंदुत्व की ताकतों को भारतीय राजनीति का निर्णायक खिलाड़ी बनाने में मदद पहुंचाई।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संवैधानिक लोकतंत्र की स्थापना, देसी रियासतों के भारतीय परिसंघ में विलय, जमींदारी उन्मूलन तथा पंचवर्षीय योजनाओं के लागू होने के बाद आये बदलाओं से राजे रजवाड़े और सामंती सोच वाली सवर्ण जातियों को सामाजिक राजनीतिक रूप से पीछे हटने को मजबूर होना पड़ा था। उस समय वे स्वतंत्र पार्टी के रूप में संगठित हुई थीं। लेकिन स्वतंत्र पार्टी की असफलता के बाद यह सामाजिक ताकतें संघ भाजपा की तरफ मुड़ गईं।

अतीत कालीन राजशाहियों के समय को हिंदुत्व के स्वर्ण काल के रूप में चिन्हित करते हुए, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की वैचारिक परियोजना के द्वारा अतीत के गौरव पूर्ण भारत की वापसी का दिवास्वप्न दिखाते हुए संघ और भाजपा ने ऐसा नैरेटिव गढ़ा जिसमें उच्च जातियों के समूह हिंदुत्व की वापसी में अपने अतीत की आत्मछवि भी तलाशने लगे। साथ ही वे अतीत के वर्चस्व वाले युग की वापसी के काल्पनिक आभामंडल से आत्ममुग्ध होकर लोकतांत्रिक विवेक खो बैठे। इसलिए यह समाज निर्णायक रूप से संघ और भाजपा के जाल में फंस कर उनके आक्रामक अग्रिम दस्ते बन गए। मनुस्मृति की छौंक और संविधान को बदलने की उद्घोषणा ने एक नए तरह के आक्रामक हिंसक समाज और व्यक्ति का निर्माण भी किया। इसलिए जिन तथाकथित उच्च जातियों का राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान था। वे अंततोगत्वा आजादी की सभी उपलब्धियों के खिलाफ आज आ खड़ी हुई हैं।

पिछले 30 वर्षों से हिंदुत्व की विध्वंसक राजनीतिक ताकतें 6 दिसंबर को शौर्य दिवस मनाती हैं। साथ ही आज के दिन वे लोकतांत्रिक संस्थाओं के ध्वंस की शपथ लेते हुए बचे-खुचे संवैधानिक गणतंत्र को चुनौती दे रहे हैं। वे इतने अज्ञानी और अनैतिहासिक हो चुके हैं कि खुलेआम घोषणा करते हैं कि संविधान निर्माण में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का कोई योगदान नहीं है।

आजादी के बाद इतिहास के भारत में छः निर्णायक मोड़ रहे हैं।

एक, आजादी के तुरंत बाद 30 जनवरी 1948 को हिंदुत्ववादिओं द्वारा गांधीजी की हत्या।

दो , हिंदुत्ववादी दंगाई अपराधियों द्वारा 22/ 23 नवंबर- 1949 की रात में संविधान लागू होने के 5 दिन पहले ही बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखना।

तीसरा , जेपी आंदोलन की पृष्ठभूमि में 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल की घोषणा।

चार , पंजाब में खालिस्तानी आंदोलन का उभार और इंदिरा गांधी द्वारा स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार के लिए सेना का भेजना। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों का बड़े पैमाने पर कत्लेआम।

 पांचवां 6 दिसंबर, 1992 को बाबा साहब के परिनिर्वाण दिवस पर बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना।

और छठा फरवरी 2002 में गोधरा कांड के बाद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन में गुजरात में मुसलमानों का कत्लेआम होना।

 2014 तक आते-आते भारत में उदारवादी सुधारों का एक चरण पूरा हो गया। जिससे नई आर्थिक नीतियों के प्रणेता मनमोहन सिंह का भारतीय राजनीति में अप्रासंगिक होते जाना स्वाभाविक था। साथ ही हिंदुत्व की ताकतों का एक-एक कर अंदर से भारतीय संस्थाओं पर नियंत्रण करना, साथ ही बदलते हुए राजनीतिक परिवेश में कारपोरेट घरानों का हिंदुत्व की ताकतों के प्रति लगातार बढ़ता लगाव। गुजरात नरसंहार के बाद मोदी की सरकार द्वारा एक-एक कर लोकतांत्रिक नागरिक अधिकारों के ध्वंस और कारपोरेट परस्ती ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को कारपोरेट जगत का खुला समर्थन मिलना।

 9/11 के बाद अमेरिका के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्लामोफोबिया और इस्लामिक आतंकवाद के नैरेटिव को गढ़ना और इसे मुख्य खतरा बना देना भी भारतीय राजनीति को अंदर से गहराई से प्रभावित किया।

यह सब घटनाएं वस्तुतः बाबरी मस्जिद के विध्वंस की पृष्ठभूमि, उदारीकरण की नीतियों के लागू होने , सोवियत संघ के विघटन के बाद वैश्विक परिदृश्य में आए परिवर्तन और भारत में क्रांतिकारी वाम आंदोलन के पीछे हटने के स्वाभाविक परिणाम थे। जिनके चलते सामाजिक न्याय वादियों से लेकर हिंदुत्ववादी तक सबके निशाने पर भारतीय लोकतंत्र की संस्थाएं लोकतांत्रिक व्यवहार और सामाजिक एकता के तत्व आते गये हैं। जिस कारण से हिंदुत्व ने आमतौर पर सामाजिक न्याय वादियों को समय-समय पर अपने अंदर पचा लिया।

भारतीय लोकतंत्र के विकास की इस मंजिल पर फासिस्ट राजनीतिक हिंदुत्व भारत की सत्ता पर पूर्णतया अपना नियंत्रण कायम कर लिया है।

 8 वर्षों के मोदी के काल में भारत की सभी लोकतांत्रिक संस्थाएं लगभग अप्रासंगिक हो चुकी है। न्यायपालिका अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत है। कार्यपालिका घुटनों के बल रेंग रही है। चुनाव धन बल और सांप्रदायिक उन्माद के तूफानी वेग में इस तरह से संचालित किए जा रहे हैं की आम नागरिक और मतदाता जाति धर्म की हिस्टीरिया का शिकार हो जाता है। जिसके गर्भ में हिंदुत्व फासीवाद का एक पूरा मॉडल धीरे-धीरे उभरता हुआ भारतीय लोकतंत्र पर काबिज होता चला गया।

आज जब हम 6 दिसंबर 2022 के दिन बाबा साहब के परिनिर्वाण दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं तो हमारे सामने संविधान लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के सभी सूत्रों पर खतरे मौजूद हैं।  लोकतंत्र में अतिरेक के नियमन की सभी संस्थाएं लगभग ठप कर दी गई हैं और संघ परिवार का भारत के सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं पर एकतरफा कब्जा है।

इस दौर में आर्थिक संकट गहरा हो रहा है। बेरोजगारी चरम पर है। आजादी के बाद के 75 वर्ष यानी अमृत काल में भारतीय लोकतंत्र के विकास यात्रा उल्टी दिशा में मुड़ चुकी है। गरीबी, भुखमरी, निरक्षरता, कुपोषण, नारी और दलित समाज पर हमले तथा अल्पसंख्यकों का हाशियाकरण भारतीय राजनीति का स्थाई तत्व बन गया है ।प्रगतिशील लोकतांत्रिक ताकतों पर भीषण हमले जारी हैं। हजारों राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता बिना किसी गुनाह के जेलों में सड़ रहे हैं ।

जब मैं 6 दिसंबर बाबरी मस्जिद विध्वंस की पूर्व संध्या पर यह लिख रहा हूं तो खबर आ रही है कि उत्तर प्रदेश में 68 स्थानों पर जीएसटी के नाम पर मुख्यत: अल्पसंख्यकों की दुकानों और प्रतिष्ठानों में छापामारी चल रही है।

स्वयं राष्ट्रपति को विकास के इस मॉडल पर यह कहना पड़ा ‘क्या विकास यही है’ ।लोकतंत्र में जेलों की संख्या बढ़ रही है। जेलों में गरीब परिवारों अल्पसंख्यकों आदिवासियों दलित कैदियों की भीड़ बढ़ती जा रही है। सर्वोच्च न्यायालय को इस पर गहरी चिंता व्यक्त करनी पड़ी है। यहां तक कहना पड़ा है कि निचली अदालतें जमानत पर फैसला देते समय भय महसूस करती हैं।

इसी विकास मॉडल के दौर में 6 दिसंबर को संविधान निर्माता बाबा साहब को याद कर रहे हैं तो हमारे सामने भारी चुनौतियां मौजूद हैं । लोकतांत्रिक नागरिकों को इस चुनौती को स्वीकार करनी होगी। किसानों, छात्रों, मजदूरों ने संघर्ष के नए रास्ते खोले हैं दलित अल्पसंख्यक धीरे-धीरे भय और आतंक के वातावरण से बाहर आते हुए अपनी मजबूत दावेदारी ठोकने की तरफ बढ़ रहे हैं। ऐसा लगता है  कि राष्ट्रीय आंदोलन के मूल्य और परंपराएं पुनर्जागरण के लिए कसमसा रही हैं ।

राजनीतिक दलों में भी परिवर्तन के संकेत दिख रहे हैं। कुछ नए समीकरण और गठबंधन भी अस्तित्व में आये हैं जो भाजपा संघ के खिलाफ भविष्य में एक बड़ी चुनौती बन सकते हैं।आइए भारतीय लोकतंत्र के क्षितिज पर उगते हुए सूरज की लाल रोशनी के स्वागत के लिए दृढ़ कदमों से आगे बढ़ें।

बाबा साहब के परिनिर्वाण दिवस और बाबरी मस्जिद के विध्वंस के काले अध्याय की रचना करने वाली काली ताकतों के खिलाफ एकताबध्द होकर फासीवाद के खिलाफ लोकतंत्र के नए मूल्यों के सृजन के लिए आगे आए। यही बाबरी मस्जिद के विध्वंस का प्रायश्चित और बाबा साहब को सच्ची श्रद्धांजलि होगी और फासीवाद पर मरणांतक प्रहार भी होगा।

(जयप्रकाश नारायण सीपीआई एमएल उत्तर प्रदेश की कोर कमेटी के सदस्य हैं। आप आजकल आजमगढ़ में रहते हैं।)

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