Tuesday, August 9, 2022

ताकि यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण हो

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यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण के लिए बीते साल के आख़िर में देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फै़सला दिया। शीर्ष अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ के उस विवादास्पद फै़सले को ख़ारिज कर दिया, जिसमें अदालत ने यौन उत्पीड़न के एक मामले में आरोपी को पॉक्सो मामले से यह कहकर बरी कर दिया था कि स्किन टू स्किन कॉन्टैक्ट यानी त्वचा से त्वचा का संपर्क हुए बिना नाबालिग बच्ची की छाती छूना यौन उत्पीड़न नहीं कहा जा सकता है। अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा, अगर कोई बच्चे को सेक्सुअल मंशा से टच करता है, तो पॉक्सो एक्ट के तहत वह सेक्सुअल असॉल्ट का अपराध होगा, इसके लिए स्किन टू स्किन टच होना अनिवार्य नहीं है। जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस एस रवीन्द्र भट्ट की पीठ ने अपने फै़सले में स्पष्ट तौर पर कहा, पॉस्को एक्ट के तहत यदि स्किन टू स्किन टच अनिवार्य किया जाएगा, तो फिर इस कानून का मक़सद ही ख़त्म हो जाएगा। बच्चों को सेक्सुअल ऑफ़ेंस से बचाने के लिए पॉक्सो एक्ट बनाया गया है।

इसकी धारा 7 के तहत टच या फ़िजिकल टच के तहत स्किन टू स्किन टच परिभाषित किया जाना ग़लत व्याख्या होगी। यह संकीर्ण, विवेकहीन और न्याय विरुद्ध होगी। अदालत यहीं नहीं रुक गई, बल्कि उसका कहना था कि ‘‘यदि इस तरह की व्याख्या को स्वीकार कर लिया जाता है, तो ऐसी स्थिति में अगर कोई आरोपी ग्लब्ज पहनकर बच्चों को ग़लत इरादे से छुए, तब सज़ा कैसे होगी ? यह न्याय विरुद्ध स्थिति बन जाएगी। कानून का यह मक़सद नहीं हो सकता है कि किसी अपराधी को कानून के फंदे से बच निकलने का मौक़ा दिया जाए।’’ अदालत का यह कहना सही भी था। बॉम्बे हाईकोर्ट का फै़सला, बच्चों के प्रति अप्रिय और अस्वीकार्य व्यवहार को वैध कर रहा था।
गौरतलब है कि बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने पिछले साल की शुरुआत में सत्र अदालत के उस फै़सले पर रोक लगा दी थी, जिसमें एक शख़्स को पॉक्सो एक्ट की धारा 8 के तहत जो बच्चों के यौन उत्पीड़न पर लगाई जाती है, दोषी ठहराया था और तीन साल जे़ल की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि त्वचा से त्वचा का संपर्क हुए बिना नाबालिग पीड़िता का स्तन स्पर्श करना, पॉक्सो एक्ट के

तहत यौन हमला नहीं कहा जा सकता। नागपुर खंडपीठ की जस्टिस पुष्पा वी. गनेडीवाला ने इस आधार पर उस शख़्स को पॉक्सो कानून के तहत यौन उत्पीड़न के मामले से बरी कर दिया था। अदालत ने अपने फै़सले में तर्क दिया था कि पॉक्सो एक्ट के तहत अपराध में अधिक सजा का प्रावधान है। आरोप अधिक गंभीर हैं, इसलिए दोषसिद्धि के लिए पुख़्ता सबूतों की ज़रूरत है। अदालत ने आरोपी को पॉक्सो एक्ट की धारा 8 से बरी करते हुए, आईपीसी की धारा 354 के तहत दोषी माना। इस फै़सले का सबसे विवादित पहलू वह था, जिसमें जस्टिस पुष्पा वी. गनेडीवाला ने पॉक्सो के तहत यौन हमले की एक अलग ही परिभाषा दे दी। अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा, ‘‘परिभाषा के अनुसार अपराध के कुछ महत्वपूर्ण तत्व हैं-यह यौन मंशा से किया गया हो, बच्चे के योनि, शिश्न, गुदाद्वार या स्तन छुए गए हों या उन्हें इस व्यक्ति या किसी और व्यक्ति की योनि, शिश्न, गुदाद्वार या स्तन छूने को मजबूर किया गया हो या फिर बिना पेनेट्रेशन के यौन मंशा से कोई और कृत्य किया गया हो।’’ ज़ाहिर है कि यह फै़सला, जब मीडिया में आया, तो इस पर विवाद शुरू हो गया। कई सामाजिक और बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस फ़ैसले की तीख़ी आलोचना की।

उनका कहना था कि यह फै़सला बिल्कुल अस्वीकार्य, अपमानजनक और घृणित है। इसे वापस लिया जाना चाहिए। यह फैसला, इस प्रकृति के अन्य मामलों को आगे चलकर प्रभावित कर सकता है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने भी महाराष्ट्र सरकार से बॉम्बे हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ तत्काल अपील दायर करने को कहा। उसका कहना था, ‘स्किन टू स्किन कॉन्टैक्ट’ वाली टिप्पणी की समीक्षा की जानी चाहिए। राज्य को इसका संज्ञान लेना चाहिए। यह नाबालिग पीड़िता के लिए बेहद अपमानजनक है। इस फै़सले के ख़िलाफ़ सामाजिक और बाल अधिकार कार्यकर्ता तो सामने आए ही, अटॉर्नी जनरल के ज़रिये केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट का रुख़ कर, फ़ैसले पर स्वतः संज्ञान लिया था। सरकार का कहना था, आदेश बेतुका है और इस फ़ैसले के ख़तरनाक नतीजे़ होंगे। फै़सले के खि़लाफ़ दाखिल अपील पर सुनवाई करने के दौरान शीर्ष अदालत ने इस  फै़सले पर तुरंत रोक लगा दी और इस मामले में विस्तार से सुनवाई शुरू की।

साल 2012 में पारित किया गया पॉक्सो क़ानून, ख़ास तौर पर नाबालिगों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा के अपराधों की परिभाषा, न्यायिक प्रक्रिया और दंड तय करता है। क़ानून का मक़सद, यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करना है। इस कानून के तहत 18 साल से कम उम्र के लड़के या लड़की दोनों को प्रोटेक्ट किया गया है। क़ानून की धारा 42 के मुताबिक अगर कोई यौन अपराध बच्चे के ख़िलाफ़ हो और पॉक्सो क़ानून में पहले के क़ानूनों से कोई अलग बात हो, तो पॉक्सो के प्रावधानों को ही मान्य माना जाएगा। लेकिन इस मामले में मुंबई हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने पॉक्सो की जगह आईपीसी की धारा 354 को इस्तेमाल करना सही समझा और अपराध को यौन उत्पीड़न मानने से इंकार कर दिया। एक अहम बात और, पॉक्सो एक्ट में यौन हमले को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। इसमें यौन मंशा से छूने के बारे में भी प्रावधान है। कानून की धारा 7 के तहत जब कोई यौन मंशा के साथ बच्ची/बच्चे के निजी अंगों को छूता है या बच्ची/बच्चे से अपना या किसी व्यक्ति के निजी अंग को छुआता है या यौन मंशा के साथ कोई अन्य कृत्य करता है।

जिसमें संभोग किए बगैर यौन मंशा से शारीरिक संपर्क शामिल हो, उसे यौन हमला कहा जाता है। यानी ‘स्किन टू स्किन कॉन्टैक्ट’ यौन उत्पीड़न को परिभाषित करने के लिए अधिनियम में अनिवार्य नहीं है। जबकि बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाते हुए, पॉक्सो अधिनियम को फ़िर से परिभाषित करने का प्रयास किया था। ज़ाहिर है यह फै़सला, कई स्तरों पर ख़तरनाक था। क्योंकि यह यौन उत्पीड़न शब्द को फिर से परिभाषित करता है, जिसे पॉक्सो द्वारा निर्धारित किया गया है। यदि इस फै़सले का विरोध नहीं किया जाता, शीर्ष अदालत में अपील नहीं की जाती, तो यह एक बेहद ख़तरनाक मिसाल कायम करता। भविष्य में इस फ़ैसले को ज़मानत के लिए और यौन अपराधियों को बरी करने के लिए उद्धृत किया जाता। हमारे यहां यौन अपराधों के मामलों में बच्चों को न्याय दिलाना वैसे भी आसान नहीं, इस फै़सले के बाद यौन अपराधियों पर मुक़दमा चलाना और भी ज़्यादा मुश्किल हो जाता। इस फै़सले से महिला सुरक्षा से जुड़े विभिन्न प्रावधानों पर विपरीत असर होता।
 

एक लिहाज़ से देखें, तो इस फ़ैसले ने महिलाओं की सुरक्षा से संबंधित कानूनी प्रावधानों को एक दम महत्वहीन बनाकर रख दिया था। अभियुक्त ने नाबालिग बच्ची को बहलाया और एक कमरे में ले गया। उसके कपड़े उतारे बगैर उसकी छाती छूने की कोशिश की और सलवार उतारने के लिए बढ़ा। पीड़िता के चिल्लाने पर अपने हाथ से उसका मुंह भींचा और फिर कमरा बाहर से बंद कर दिया। बेटी की चीखें सुन कर मां उसे ढूंढ़ती हुई उस कमरे तक पहुंची, उसे आज़ाद करवाने में कामयाब हुई। मामले की प्रकृति को देखते हुए, अपराधी पर पॉस्को एक्ट के तहत ही कार्यवाही होनी चाहिए थी। लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरोपी को आईपीसी की धारा 354 के तहत दोषी माना।

निचली अदालत द्वारा अपराधी को दी गई न्यूनतम तीन साल की सज़ा को तय अपराध के लिए ज़्यादा माना। जबकि अपराध की गंभीरता को समझने के लिए उसका नाबालिग पर मानसिक असर जानना बेहद ज़रूरी है। बच्चे को ग़लत तरीके से छुए जाने का एहसास भर और किसी वयस्क के साथ असुरक्षित होने की भावना ही लंबे समय तक मन में गहरा असर छोड़ सकती है। इस पूरे मामले मेें सबसे ज़्यादा हैरान करने वाली बात यह थी कि जज ख़ुद एक महिला हैं। बावजूद इसके वह, इस वारदात से बच्ची के मासूम जे़हन पर पड़ने वाले मानसिक असर से बेख़बर बनी रहीं। उन्होंने विवादास्पद फैसला दिया, जो आखि़रकार महिलाओं के ख़िलाफ़ जाता।
 

साल 2012 में निर्भया मामले के बाद तेज़ हुई क़ानून सुधार की प्रक्रिया और उससे कई दशक पहले से नारीवादी कार्यकर्ताओं की अथक कोशिशों के परिणामस्वरूप महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा की परिभाषा बढ़ाई गई। पीड़िता के हितों को ध्यान में रखने वाली न्याय प्रणाली तय की गई और दंड कड़े किए गए। यहां तक कि महिलाओं के ख़िलाफ़ अश्लील मौखिक इशारों को भी हिंसा की श्रेणी में लाने की कोशिशें की जा रही है। अफ़सोस की बात यह है कि दूसरी तरफ़ इस तरह के बेहूदा फ़ैसले आ रहे हैं।  पॉक्सो एक्ट कहीं भी स्किन टू स्किन कॉन्टैक्ट की बात नहीं कहता है। यह अधिनियम, शारीरिक हिंसा की बात करता है। जिसका अर्थ है कि जबरदस्ती यौन हिंसा की गई है।

यौन हिंसा के ख़िलाफ़ बने इस क़ानून में उत्पीड़न तय करने के लिए कपड़ों के उतारे जाने या शरीर के शरीर से छूने की कोई शर्त का उल्लेख नहीं है। क़ानून, अपराध तय करने के लिए यौन हिंसा की मंशा को तवज्जोह देता है। ज़ाहिर है कि जो बात क़ानून में नहीं है, उसे फ़ैसले की बुनियाद बनाना, पीड़िता के लिए सरासर नकारात्मक कदम था। पॉक्सो क़ानून बच्चों के हित को सबसे ऊपर रखने के इरादे से लाया गया था और ये उसके दिशा-निर्देश में भी साफ़-साफ़ लिखा है।

बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले में अपराधी के पक्ष को तरज़ीह दी गई और बच्चों के ख़िलाफ़ यौन अपराध के मूल नियम को किनारे किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के विवादास्पद फ़ैसले को ख़ारिज कर, पोक्सो कानून में यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण के जो प्रावधान हैं, उन्हें फ़िर से बहाल किया है।

(जाहिद खान वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं।)

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