Wednesday, December 7, 2022

‘शिक्षक दिवस’ और सर्वपल्ली राधाकृष्णन के गौरव-गान के मायने

Follow us:

ज़रूर पढ़े

कहते हैं कि इतिहास एक ‘ट्रेचरस टेरेन’ है जहां बतायी जाने वाली चीजें कम होती हैं और छिपाई गई या तोड़-मरोड़कर बतायी जाने वाली चीजें ज्यादा। कुछ विद्वान इतिहास को ‘स्टेग्नोग्राफी’ के रूप में भी देखते हैं यानी एक ऐसी प्रच्छन्न कला-लेखन के रूप में जो लिखी गई बातों के बारे में संदेह पैदा करने नहीं देता। मगर इन सबके बावजूद पिछले करीब पचास-साठ सालों में इतिहास-लेखन के इस ‘छलियापन’ का काफी भंडाफोड़ हुआ है और दरबारी व सत्ता-पोषित इतिहासकारों द्वारा परोसे गए व्यंजनों के जहर से लोगों को संक्रमित होने से बचाने के लिए काफी प्रयास हुए हैं और अब भी हो रहे हैं।

आज भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति व दूसरे राष्ट्रपति तथा भारतीय दर्शन के हिंदूवादी भाष्यकार डाॅ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म दिवस है जिसे 1962 के बाद सरकारी तौर पर ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। आइए, जानते हैं कि इस दिवस और राधाकृष्णन के गौरव-गान के मायने क्या हैं।

प्राचीन शास्त्रकारों ने एक सूत्र वाक्य दिया था – ‘‘सा विद्या या विमुक्तये’’ अर्थात् विद्या वह है जो मुक्ति प्रदान करे। हर अभिशाप और रोग से मुक्ति जो मनुष्य को हर तरह की दासता में धकेलता है। क्या सचमुच डाॅ. राधाकृष्णन के विचार और जीवन-संदेश इस कसौटी पर खरे उतरते हैं? राधाकृष्णन को महान दार्शनिक और राजनेता बताया जाता है। क्या वे सचमुच बहुविध शाखाओं-प्रशाखाओं तथा बहुरंगी छटाओं वाले भारतीय दर्शन के आधुनिक भाष्यकार थे? क्या वे भारतीय दर्शन में समायी विभिन्न दृष्टियों तथा चिंतन प्रणालियों की अद्भुत विविधताओं को समझने और जीने वाले चिंतक-विचारक थे?

नहीं, बिलकुल नहीं।

डाॅ. राधाकृष्णन वर्ण-जाति व्यवस्था के कट्टर समर्थक, नारी मुक्ति के विरोधी और ब्राह्मणवादी धर्म संचालित दर्शन को भारत की सांस्कृतिक विरासत का सर्वोच्च स्वरूप मानने वाले भारतीय दर्शन के हिंदूवादी प्रवक्ता थे। वे उस ‘मनुस्मृति’ से मोह-मुग्ध थे जो आज भी उदार-चेता हिंदुओं के लिए कलंक का आख्यान और दलित-वंचितों तथा सभी महिलाओं के लिए बेइज्जती और गुलामी का शास्त्रीय दस्तावेज तथा आरएसएस जैसे संगठनों के लिए एक महान संदर्भ ग्रंथ बना हुआ है।

Screenshot 2020 09 05 at 9.39.01 AM

डाॅ. राधाकृष्णन की दृष्टि में ‘‘मनुस्मृति एक उत्कृष्ट धर्मशास्त्र है जिसमें नैतिक मूल्यों व नियमों का विधान है। इसमें उन प्रथाओं तथा परंपराओं का गौरव-गान है, जिनका नाश हो रहा था’’। वे जन्म आधारित वर्ण-जाति व्यवस्था को ‘ईश्वर का आदेश’ मानते थे। वे अपनी पुस्तक ‘इंडियन फिलासफी’ के खंड एक में स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि ‘‘किसी को भी जाति व्यवस्था की भर्त्सना करने का अधिकार नहीं है क्योंकि इसका मूलाधार बहुत सोच-समझकर तैयार किया गया है। यह जाति ही थी जिसने विभिन्न नस्लों को बिना लड़े साथ जीने का अवसर दिया और शासकों तथा शासितों – दोनों की सहजीविता और स्वतंत्रता को बरकरार रखने में मदद की’’।

वे जाति को एक ऐसी व्यवस्था के रूप में देखने के लिए कभी तैयार नहीं हुए जो गैर-बराबरी, जुल्म-सितम और नाइंसाफी को वैधता प्रदान करती है। महिलाओं की शिक्षा के विषय पर भी उनकी राय एक कुटिल ब्राह्मणवादी की राय जैसी ही थी। उन्होंने लिखा ‘स्त्री और पुरुष दोनों समान होते हैं, मगर उनके कार्यक्षेत्र अलग-अलग हैं। स्त्री शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि स्त्री आदर्श माता और आदर्श गृहिणी बन सके’’।

डाॅ. राधाकृष्णन हर तरह के राजनीतिक और आर्थिक बदलाव के खिलाफ थे। उनकी भाषा में ‘‘शांति राजनीतिक अथवा आर्थिक बदलाव से नहीं आ सकती। यह मानवीय स्वभाव में बदलाव से ही आ सकती है। मनु, नारद, शंकर, दयानंद और सावरकर की विरासत के विलक्षण उत्तराधिकारी यह विद्वान हिंदुत्व को ही भारतीय दर्शन का पर्याय मानते थे और मुक्तिकारी बौद्ध दर्शन में वेद-वेदांतकी घुसपैठ करवाते थे। उन्होंने बौद्ध दर्शन की विशिष्टता को भी नकारने का भरपूर प्रयास किया। उनकी नजर में महात्मा बुद्ध उपनिषदों के विचारों को ही स्थापित करने वाले ‘वैदिक हिंदू’ थे।

radhakrishnan 759

श्रीमन राधाकृष्णन ने यहां तक कह डाला कि ‘‘आरंभिक बौद्ध विचार असली थे ही नहीं… बुद्ध हिंदू के रूप में जन्मे, बड़े हुए और हिंदू के रूप में ही काल-कवलित हुए’’। हालांकि उन्होंने अकादमिक तौर पर विश्व के विभिन्न धर्मों तथा दर्शनों का तुलनात्मक अध्ययन किया था, मगर वे दयानंद, विवेकानंद, सावरकर, गोलवलकर जैसों की तरह ‘हिंदू धर्म की श्रेष्ठता’ के प्रचारक बने रहे। उनकी नजर में ‘‘हिंदू धर्म और संस्कृति में प्रवाह तथा चेतनता है, अन्यों में जड़ता है’’। यह जानना भी दिलचस्प है कि डाॅ. भीमराव अम्बेडकर ही नहीं, उस दौर के प्रखर क्रांतिकारी राष्ट्रवादी राहुल सांकृत्यायन ने भी अपनी पुस्तक ‘दर्शन-विग्दर्शन’ और ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ में राधाकृष्णन की बखिया उधेड़ दी थी और उन्हें ‘पोंगापंथी धर्म प्रचारक करार दिया था।

डाॅ. राधाकृष्णन रबीन्द्रनाथ टैगोर से खासे प्रभावित बताए जाते हैं और कहा जाता है कि प्रख्यात वैज्ञानिक सी.वी. रमन तथा इतिहासकार व प्रशासक राजनेता के.एम. पणिक्कर उनके मित्र थे। मगर सच यह है कि राधाकृष्णन इन सबसे बेहद जुदा ख्यालों के थे। अपनी मेधा, दृष्टि बोध  और प्रतिबद्धताओं में राधाकृष्णन टैगोर और सी.वी. रमन के अरमानों में पलीते लगाने वाले थे। कहा यह भी जाता है कि वे मूलतः दार्शनक थे जिन्हें भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राजनीति के रंगमंच पर स्थापित किया था, मगर सच तो यह है कि राधाकृष्णन शुरू से ही अति महत्वाकांक्षी, कैरियरवादी और हिंदूवादी सोच के थे। शायद कम ही लोग जानते होंगे कि वे न केवल अंबेडकर, बल्कि प्रखर राजनेता और इस्लामिक दर्शन के विद्वान मौलाना अबुल कलाम आजाद से सख्त नफरत करते थे।

Screenshot 2020 09 05 at 9.41.49 AM

उनके निशाने पर कृष्ण मेनन भी थे जिन्हें वे ‘कट्टर अमेरिका विरोधी’ मानते थे। वे जगजीवन राम जैसे दर्जनों दलित पृष्ठभूमियों से आए लोगों को नापसंद करते थे। 26 फरवरी, 1966 को जब मुंबई में राजनीतिक बियावान में पड़े सावरकर की मौत हुई, तब राष्ट्रपति के रूप में अपने प्राधिकार का बेजा इस्तेमाल करते हुए उन्होंने भारतीय संसद से सावरकर को श्रद्धांजलि दिलवायी। यों यहां यह जानना भी दिलचस्प है कि उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के दिग्गज नेता हीरेन मुखर्जी और श्रीपद अमृत डांगे भी सावरकर की याद में आंसू बहाने से पीछे नहीं रहे।

डाॅ. राधाकृष्णन के बारे में अनेक किंवदंतियां हैं जो सफेद झूठ हैं। इन झूठों को राधाकृष्णन को औकात से ज्यादा महान बनाने के लिए फैलाया गया है। आधिकारिक तौर पर ऐसे कोई साक्ष्य नहीं हैं जो इन ‘झूठों’ को ‘झूठा’ बता सकें। कुछ झूठ तो बेहद जायकेदार हैं, जैसे यह कि 1949 से 1952 के बीच राधाकृष्णन तब के सोवियत संघ में भारत के राजदूत के रूप में दो बार वहां के सर्वोच्च नेता जोसेफ स्टालिन से मिले और जब वे कार्यकाल के अंत में भारत रवाना होने वाले थे, तब उन्होंने स्टालिन के गालों पर थपकियां दी थीं और तब स्टालिन ने भावातुर होकर कहा था कि ‘‘आप पहले व्यक्ति हो जिसने मुझे दैत्य नहीं, इंसान समझा है। आपके यहां से जाने से मैं बेहद दुखी हूं।

आप लंबे समय तक जियें। मैं तो ज्यादा जीना नहीं चाहता। मेरी आंखें नम हो रही हैं’’। और यह भी कि जब राधाकृष्णन चीन के शीर्ष नेता माओत्से तुंग से मिलने गए, तब दावत के दौरान माओ ने शाकाहारी राधाकृष्णन की थाली में अपनी थाली से गोश्त का एक टुकड़ा डाल दिया, मगर राधाकृष्णन परेशान नहीं हुए क्योंकि यह तो माओ का उनके प्रति प्यार था।

डाॅ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिवस और ‘शिक्षक दिवस’ के अवसर पर आप सबको ढ़ेर सारी बधाई!

(रंजीत अभिज्ञान सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

क्यों ज़रूरी है शाहीन बाग़ पर लिखी इस किताब को पढ़ना?

पत्रकार व लेखक भाषा सिंह की किताब ‘शाहीन बाग़: लोकतंत्र की नई करवट’, को पढ़ते हुए मेरे ज़हन में...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -