Thursday, July 7, 2022

दस मार्च को जिन बातों पर नज़र रहेगी

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चुनाव अब लोकतंत्र को सुनिश्चित करने का किस हद तक पैमाना रह गए हैं, इस प्रश्न के लगातार अधिकाधिक प्रासंगिक होते जाने के बावजूद सच यही है कि अभी भी बहुसंख्यक लोगों के लिए ये सवाल अभी महत्त्वपूर्ण नहीं है। आम तौर पर गतिरुद्ध हो चुकी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के बीच भी अधिकांश लोगों को चुनावों से समाधान निकल आने की उम्मीद बची हुई है। इसीलिए जब कभी चुनाव होते हैं, तो राजनीतिक रूप से जागरूक लोगों का भी लगभग सारा ध्यान उन पर केंद्रित हो जाता है। यही स्थिति अभी है, जब देश के पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव हो रहे हैं। दरअसल, उनमें से तीन राज्यों- पंजाब, उत्तराखंड, और गोवा- में मतदान पूरा हो चुका है। उत्तर प्रदेश और मणिपुर में सात मार्च को आखिरी चरण का मतदान होगा। जैसा कि सर्वविदित है, इन सभी राज्यों में मतगणना दस मार्च को होगी।

पारंपरिक नजरिए में चुनावों को लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। इसे जनादेश को व्यक्त करने वाला सबसे प्रभावी माध्यम भी समझा जाता है। इस नजरिए से दस मार्च को आम तौर पर लोगों की निगाहें यह देखने पर टिकी होंगी कि दस मार्च को किस राज्य में कौन-सी पार्टी जीतती है और कितने बड़े अंतर से जीतती है। बेशक उससे ही तय होगा कि संबंधित राज्य में किसकी अगली सरकार बनेगी। लेकिन वह सरकार बनने से देश की वर्तमान परिस्थिति में क्या और कितना बदलाव आएगा, ये प्रश्न अक्सर चर्चा में नहीं आता। बेशक इस प्रश्न का संबंध देश की पॉलिटिकल इकॉनमी से है। पॉलिटिकल इकॉनमी के स्वरूप को समझना एक अधिक गंभीर मसला है। अक्सर इस पर चुनावी संदर्भ में चर्चा करने की जरूरत नहीं महसूस की जाती।

बहरहाल, इस विषय को किसी अलग चर्चा के लिए छोड़ देते हैं। लेकिन अगर दस मार्च को आने वाले चुनाव नतीजों को गहराई से समझना हो, तो गुजरे वर्षों में राजनीति के बदले संदर्भ बिंदु (रेफरेंस प्वाइंट) को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दरअसल, राजनीति के आज के संदर्भ बिंदु को ध्यान में ना रखने का ही यह नतीजा होता है कि चुनाव और उनसे उभरने वाले राजनीतिक संकेतों के बारे में लगाए गए अनुमान अक्सर गलत साबित हो जाते हैं।

ये ध्यान देने का पहलू हैः एक समय राजनीति का संदर्भ बिंदु जन कल्याणकारी कार्यों के मामले में सरकारों का कामकाज होता था। तब रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े मुद्दे राजनीति के भी प्रमुख मुद्दे होते थे। लेकिन भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी के उदय के साथ यह संदर्भ बिंदु पृष्ठभूमि में जाने लगा। नरेंद्र मोदी की खूबी यह है कि उन्होंने इस परिघटना को अंजाम तक पहुंचा दिया। यानी 2014 में उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद वो संदर्भ बिंदु पूरी तरह से बदल गया।

अगर अधिक विस्तार में गए बिना इस बात पर गौर करें कि आज राजनीति- खास कर चुनावी राजनीति का संदर्भ बिंदु क्या है, तो यह साफ होगा कि हिंदुत्व, उग्र राष्ट्रवाद, और मोदी राज का न्यू वेल्फरियरिज्म भारतीय राजनीति की दिशा तय करन वाले केंद्रीय बिंदु बने हुए हैं। बेशक, कुछ राज्य अभी भी अपवाद हैं, जहां मोदी काल में भी भारतीय जनता पार्टी के पांव नहीं पसर सके हैं। लेकिन देश के ज्यादातर हिस्सों में- हिंदुत्व और न्यू वेल्फयरिज्म के जरिए भाजपा ने कम से कम एक तिहाई मतदाताओं को गोलबंद कर रखा है। 2014 के बाद से अब तक किसी भी चुनाव में- भाजपा के प्रभाव क्षेत्र वाले राज्यों में इस गोलबंदी में गिरावट आने के संकेत नहीं मिले हैं। दरअसल, ज्यादातर मौकों पर इस ध्रुवीकरण के और मजबूत होने के संकेत मिले हैं। मसलन, पिछले साल पश्चिम बंगाल के विधान सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी बहुमत पाने में भले विफल रही, लेकिन उसके वोट प्रतिशत में 2016 के विधान सभा चुनाव की तुलना में लगभग पौने चार गुना की बढ़ोतरी दर्ज हुई।

इन नए संदर्भ बिंदु का खास पहलू यह है कि आम जिंदगी की बढ़ती परेशानियां चुनाव परिणाम तय करने के लिहाज से अप्रासंगिक बनी हुई हैं। हिंदुत्व के मुद्दे ने भाजपा के ठोस वोट बैंक का विस्तार किया है। मोदी के पहले के दौर में राष्ट्रीय स्तर पर ये वोट बैंक 18 से 20 प्रतिशत था। आज यह निश्चित रूप से 25 प्रतिशत से ज्यादा है। यानी ये वो मतदाता हैं, जिन्हें महंगाई, बेरोजगारी, कोरोना काल की भयावहता, या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की कमजोर पड़ती स्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ता। अपने प्रतिक्रियावादी चरित्र के कारण वे इस बात से संतुष्ट हैं कि लोकतांत्रिक संविधान के गुजरे वर्षों में हुए प्रयोग के कारण सामाजिक वर्चस्व की व्यवस्था में जो बदलाव आ रहे थे, मोदी राज ने उस परिघटना को न सिर्फ रोक दिया है, बल्कि उसकी दिशा भी पलट दी है। इससे कारण उन्हें ये काल हिंदू गौरव का दौर लगता है।

इसके ऊपर न्यू वेल्फेयरिज्म से आर्थिक रूप से पिछड़े तबकों के एक हिस्से में मोदी राज के कल्याणकारी होने का भाव उभरा है। न्यू वेल्फेयरिज्म से मतलब दूरगामी परिणाम देने वाले सार्वजनिक निवेश को खत्म कर उसका एक हिस्सा प्रत्यक्ष लाभ के रूप में देने की अपनाई गई नीति से है। इसके तहत स्वास्थ्य, शिक्षा, वैज्ञानिक शोध, मानवीय बुनियादी ढांचे, आदि में निवेश को घटाया गया है। उससे बचाई गई रकम के एक हिस्से से पहले रसोई गैस, मकान, प्रत्यक्ष नकदी ट्रांसफर आदि के कार्यक्रम चलाए गए। कोरोना काल में मुफ्त अनाज का वितरण इसका हिस्सा बना है। यह यूं ही नहीं है कि चुनाव करीब आते ही उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने गेहूं और चावल के साथ घी, तेल, और नमक आदि का भी मुफ्त वितरण शुरू कर दिया।

हिंदुत्व के राजनीतिक परिदृश्य और न्यू वेल्फरियज्म के आर्थिक हस्तक्षेप से भाजपा की जो राजनीतिक ताकत बनी है, उसके रहते उसे हराना कठिन बना रहा है। उसे उसके प्रभाव क्षेत्र वाले राज्यों में सिर्फ वहां हराया जा सका है, जहां उसके विरोधी मतदाताओं का संपूर्ण ध्रुवीकरण संभव हो सका। अनेक राज्यों में ऐसा होने के बावजूद भाजपा अकेले या अपने सहयोगी दलों के साथ भारी पड़ी है। प्रश्न है कि दस मार्च को जब मौजूदा दौर के चुनावों के परिणाम आएंगे, तो क्या इससे कुछ अलग राजनीतिक सूरत उभरेगी?

वैसे अभी जिन पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, उनमें पंजाब भी है। पंजाब उन गिने-चुने राज्यों में एक है, जो मोदी राज के पॉलिटिकल रेफरेंस प्वाइंट से अब तक दूर रहा है। हालांकि वहां भी भाजपा अपनी सहयोगी पार्टी अकाली दल के साथ सत्ता में रह चुकी है, लेकिन वहां राजनीति का संदर्भ भाजपा के प्रभाव क्षेत्र वाले राज्यों से अलग रहा है। इस रूप में पंजाब के नतीजों को देखने की कसौटी इस बार भी उससे अलग होगी, जो बाकी चार राज्यों में रहेगी। पंजाब में जिन बातों पर निगाह रहेगी, उनमें प्रमुख हैः

हाल में तीन कृषि कानूनों के खिलाफ चले सफल संघर्ष में पंजाब के किसानों की भूमिका सबसे बड़ी रही। इस दौरान ‘किसान- मजदूर एकता’ की बातें काफी बढ़-चढ़ कर की गईं। पंजाब में किसान मोटे तौर पर जाट सिख हैं। जबकि खेतिहर मजदूर ज्यादातर दलित समुदाय से आते हैं। अब पंजाब में कांग्रेस ने दलित समुदाय से आए चरणजीत सिंह चन्नी को अपना मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया है। दस मार्च को यह जाहिर होगा कि किसान आंदोलन के कारण क्या सचमुच उच्च वर्गीय किसान मजदूरों के प्रति अपने पारपंरिक पूर्वाग्रहों से उबर गए हैं? या एक दलित के मुख्यमंत्री रहने की संभावना ने उन्हें एकमुश्त किसी दूसरे खेमे में धकेल दिया है?

मौजूदा चुनाव ने किसान आंदोलन में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने वाले पंजाब के संगठनों को विभाजित कर दिया। एक हिस्सा इन चुनावों में अपनी ताकत आजमा रहा है। उसके उम्मीदवारों का क्या हाल होता है, यह जन आंदोलनों के दीर्घकालिक भविष्य के लिहाज से महत्त्वपूर्ण होगा? क्या जन संघर्ष और चुनावों के बीच कोई संबंध है या कायम हो सकता है, इस प्रश्न का उत्तर दस मार्च को मिलेगा।

दरअसल, देखने की बात यह भी होगी कि जिस आंदोलन को ऐतिहासिक और वैश्विक स्तर पर एक मिसाल के तौर पर देखा गया है, क्या चुनावी राजनीति पर उसका कोई परिणाम होता है? कांग्रेस, अकाली दल, आम आदमी पार्टी- इन तीनों का दावा है कि उन्होंने किसान आंदोलन का समर्थन किया। लेकिन असल सवाल यह है कि जिन वजहों से वो किसान आंदोलन हुआ, उन पर इन पार्टियों ने कोई वैकल्पिक नजरिया रखा है- इसके कोई संकेत नहीं हैं। तो फिर चुनाव में किसानों का मुद्दा किस रूप में व्यक्त हो सकता है, यह एक दिलचस्प सवाल है।

बहरहाल, बाकी चार राज्यों- उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, और मणिपुर में चुनाव का मुख्य संदर्भ वही है, जिसकी चर्चा हमने ऊपर की है। यानी क्या हिंदुत्व और न्यू वेल्फयरिज्म ही सबसे निर्णायक पहलू साबित होगा, अथवा रोजी-रोटी और रोजमर्रा की जिंदगी के दूसरे मुद्दों की अहमियत बहाल होने की शुरुआत वहां होगी? इस सिलसिले में इन तथ्यों पर गौर करना जरूरी हैः

उत्तर प्रदेश में 2014 और 2019 के लोक सभा चुनावों और 2017 के विधान सभा चुनाव में भाजपा+ को कभी 40 फीसदी से कम वोट नहीं मिले। पिछले विधान सभा चुनाव में उसे 40 प्रतिशत वोट मिले थे।

उत्तराखंड में 2017 के विधान सभा चुनाव में भाजपा को 47 प्रतिशत वोट मिले थे। पिछले दो लोक सभा चुनावों में उसे क्रमशः 55 और 61 फीसदी वोट मिले।

गोवा में हालांकि पिछले चुनाव में कांग्रेस को 17 और भाजपा को 13 सीटें मिली थीं, लेकिन वोट प्रतिशत के लिहाज से भाजपा लगभग चार फीसदी के बड़े अंतर से आगे रही थी। उसे 32.9 प्रतिशत वोट मिले, जबकि कांग्रेस को 28.7 प्रतिशत वोट ही मिल सके थे।

मणिपुर की कहानी भी गोवा जैसी ही थी। वहां 60 सदस्यों वाली विधानसभा में कांग्रेस को 28 और भाजपा को 21 सीटें मिली थीं। लेकिन कांग्रेस को जहां 35.3 प्रतिशत वोट मिले, वहीं भाजपा को 36.5 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे।

तो इन चारों राज्यों में वोट प्रतिशत के लिहाज से भाजपा की स्पष्ट बढ़त थी। 2019 के लोक सभा चुनाव में अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी दलों से भाजपा का फासला और बढ़ गया। लेकिन उसे अगर एक बार की घटना मान कर छोड़ दें, तब भी ध्यान देने वाली बात यही है कि चुनाव चाहे कोई भी रहा हो, मोदी राज में भाजपा को एक तिहाई से कम वोट कहीं- कभी नहीं मिले। दस मार्च को जब इस बार के चुनाव के नतीजे आएंगे, तो उसे देखने का असल पैमाना यही होगा कि क्या इस बार ऐसा होता है?

अगर मोदी काल के पहले की राजनीति के संदर्भ पर गौर करें, तो सत्ता में होने का नुकसान अक्सर संबंधित दल को होता था। लोगों की ऊंची अपेक्षाओं पर खरा ना उतरने की कीमत उसे चुकानी पड़ती थी। लेकिन मोदी काल में भाजपा के साथ ये पहलू अब तक लागू नहीं हुआ है। इसीलिए इन्कम्बैंसी और एंटी इन्कम्बैंसी की बातें अब चर्चा से गायब हो गई हैं।

तो इन चार राज्यों के दस मार्च को आने वाले चुनाव परिणाम में यह एक अहम पहलू होगा कि क्या एंटी इन्कम्बैंसी (यानी सत्ता में होने की वजह से होने वाला नुकसान) का असर इस बार भाजपा पर होता है? अगर ये नुकसान होता भी है, तो उसका परिमाण क्या होता है? यानी वो क्षति बड़ी होती है, या मामूली नुकसान के साथ भाजपा बच निकलती है? गौरतलब है कि भाजपा के लिए एंटी इन्कम्बैंसी का शिकार होने की तमाम परिस्थितियां मौजूद हैं। अर्थव्यवस्था से लेकर आम सामाजिक माहौल और राज्य व्यवस्था के लोकतांत्रिक संचालन से जुड़े पहलुओं की कसौटी पर भाजपा का कामकाज बेहद खराब रहा है। कोरोना काल के भयानक नजारों ने उसकी विफलता को और खोल कर सबके सामने रख दिया। अगर इतनी विकट स्थिति से किसी सत्ताधारी दल के चुनावी प्रदर्शन पर फर्क ना पड़े, तो फिर यही मानना पड़ेगा कि उसके शासन की रीति-नीति उतने मतदाताओं को ध्रुवीकृत रखने में अब भी सफल है, जिससे चुनाव के फर्स्ट पास्ट द पोस्ट सिस्टम (यानी हमारी मौजूदा चुनावी प्रणाली) में सत्ता में आना संभव हो जाता है। 

इसके साथ ही जो पहलू कसौटी पर हैं और जिनके इम्तहान के नतीजा दस मार्च को आएगा, उनमें शामिल हैः

क्या 1990 के दशक जैसे मंडलवादी समीकरण अब भी चुनावों में कारगर हैं? गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के सिलसिले में यह कहा गया है कि समाजवादी पार्टी ने इस बार विभिन्न पिछड़ी जातियों की नुमाइंदगी करने वाले दलों का एक व्यापक गठजोड़ बनाया है।

गौरतलब यह भी होगा कि क्या किसी जाति विशेष के नेता के दल बदलने से उस जाति के बहुसंख्यक मतदाता भी पाला बदल लेते हैं?

क्या जातीय अस्मिता की राजनीति के जरिए हिंदुत्व की व्यापक अस्मिता की राजनीति को नियंत्रित करने की एक बार फिर जताई गई उम्मीदों में सचमुच दम है?

बहरहाल, यह अनुमान अभी ही लगाया जा सकता है कि चुनाव नतीजा चाहे जो हो, संसदीय राजनीति में शामिल ज्यादातर दलों की बुनियादी सोच पर उससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यही बात उन ज्यादातर लोगों पर भी लागू होगी, जो खुद को लिबरल डेमोक्रेसी का पक्षधर बताते हैं। ये तमाम दल और लोग इस चुनाव के बाद अगले चुनावों पर नजर टिका लेंगे। जबकि जरूरत इस बात की है कि चुनाव नतीजे चाहे जो रहें, संसदीय राजनीति के दायरे में नए संदेश और जनता तक संदेश पहुंचाने के नए माध्यमों के बारे में एक व्यापक बहस छेड़ी जाए। संदेश कौन दे रहा है, उसकी साख जनता के बीच कैसे बने, इस अहम सवाल पर विचार किया जाए।

जबकि अब तक हर चुनाव के बाद होता यह है कि चुनाव और प्रचार तंत्र पर भाजपा के बने वर्चस्व को सामने आए परिणाम का कारण बता कर वैकल्पिक राह ढूंढने के अपने दायित्व से किनारा कर लिया जाता है। जबकि पैसे के स्रोत, सत्ता के प्रभाव, संस्थाओं के दुरुपयोग, और प्रचार तंत्र पर पूरा नियंत्रण कुछ ऐसे पहलू हैं, जिन पर भाजपा के नियंत्रण को आरंभ में ही स्वीकार कर अब चुनावी और राजनीतिक चर्चाओं में उतरा जाना चाहिए। चुनावों में फिलहाल सबके लिए समान धरातल की स्थितियां नहीं हैं। यह असमान धरातल भी हिंदुत्व और न्यू वेल्फेयरिज्म की तरह ही भाजपा की एक चुनावी ताकत है। लेकिन इसका जवाब इसको लेकर रोने में नहीं, बल्कि उसके विकल्प पर विचार करने से निकलेगा। बहरहाल, उस पर बात दस मार्च के बाद। फिलहाल, तो निगाहें इस पर टिकी हुई हैं कि दस मार्च को राजनीति के वर्तमान संदर्भ बिंदु के बारे में क्या संकेत मिलते हैं?

(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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