Wednesday, July 6, 2022

युद्ध में झुलसती मनुष्यता और मनुष्य की क्रूरता का आख्यान  

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दुनिया में नर्क और दर्द का दायरा बहुत बड़ा है। अपेक्षाकृत विकसित समझे जाने वाले ऐसे यूरोपीय देश, जहां एक समय समाजवाद की जमीन तैयार की जा रही थी, वे  भी इससे अछूते नहीं हैं। अलग-अलग जातीय-समूहों और देशों के बीच होने वाले हिंसक-टकरावों और युद्धों ने मनुष्यता को रौंद डाला है। नर्क और दर्द के इस भयावह दायरे में मनुष्य की क्रूरता का भी विस्तार हुआ है। गरिमा श्रीवास्तव की क्रोएशिया प्रवास डायरीः देह ही देश( तीसरा संस्करण-2021, राजपाल एंड संस, कश्मीरी गेट, दिल्ली) इसी तरह के नर्क और दर्द का मार्मिक दस्तावेजीकरण है। यह सिर्फ युद्ध का दस्तावेज नहीं है, युद्ध के साथ और उसके बाद होने वाले विस्थापन, तनाव, धर्मांधता और जातीय शुद्धता से प्रेरित सामुदायिक हमलों, हिंसा, बलात्कार-सामूहिक बलात्कार और अलग-अलग देशों में चलाये जाने वाले वेश्यालयों की भयावह कथा है।

गरिमा श्रीवास्तव भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद(ICCR) की तरफ से सन् 2010-11 के बीच क्रोएशिया के जाग्रेब विश्वविद्यालय के सुदूर पूर्वी अध्ययन विभाग में प्रतिनियुक्ति पर पढ़ाने गयी थीं। दुनिया के विभिन्न देशों के बीच इस तरह के शैक्षिक-सांस्कृतिक आदान-प्रदान चलते रहते हैं। आम तौर पर भारत के अनेक हिन्दी अध्यापक इस योजना के तहत विदेश जाते हैं और कुछ साल पढ़ाकर स्वदेश लौट आते हैं। इससे उनकी माली हालत भी सुधर जाती है। कुछेक परदेस में ही दूसरे या तीसरे अनुबंधों का इंतजाम कर वहां ज्यादा वक्त के लिए रह जाते हैं। लेकिन गरिमा श्रीवास्तव ने इस असॉइनमेंट का रचनात्मक उपयोग किया। इसलिए नहीं कि उन्हें यह किताब लिखकर शोहरत या पैसा कमाना था। 

वहां की स्थितियों को देखकर वह चकित थीं। मर्माहत हुईं। हैरान हुईं। युद्ध से बेहाल मुल्कों की महिलाओं की स्थिति देखकर दक्षिण-पूर्वी यूरोप क्या समूची दुनिया के बारे में उनकी धारणा बदल रही थी। आस-पास के देशों की वहां से वह बिल्कुल अलग तस्वीर देख रही थीं। अपने दैनन्दिन काम के अलावा उन्होंने युद्ध प्रभावित क्षेत्रों और देशों में घूमना शुरू किया, लोगों से मिलती रहीं और उनके भयानक अनुभवों की कहानी लिखती रहीं। उनकी वही कलमबद्ध डायरी स्वदेश लौटने के कुछ वर्ष बाद देह ही देश के रूप में छपी। 

जाग्रेब में रहते हुए युद्ध के बाद के जिन दक्षिण-पूर्वी यूरोपीय मुल्कों को उन्होंने नजदीक से देखा, वहां लोग अपने अतीत से जूझ रहे थे या स्वयं उनका अतीत ही वर्तमान बन चुका था। इस बारे में गरिमा स्वयं बताती हैं ‘बोस्निया, हर्जेगोविना, क्रोएशिया की स्त्रियों के अनुभव मुझे सोते-जागते कुरेदते रहते, बेचैन करती रहतीं वे। रास्ता था डायरी लिखना, क्योंकि भारत में भी यह सब सुनने में खास दिलचस्पी किसी की थी नहीं, न किसी के पास इतना वक्त था मुझे देने के लिए कि अनुभव बांट सकूं, वैसे भी तकनीक की अपनी सीमाएं होती हैं।  1992 से 1995 तक चले युद्ध और झड़पों में संयुक्त युगोस्लाविया से विखंडित हुए सभी छोटे-छोटे देशों ने कुछ न कुछ खोया। आम नागरिक की शांति भंग हुई, नागरिक अधिकारों का हनन हुआ, बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ, लाखों लोग शरणार्थी बनने को विवश हुए। इस पूरे दौर में युद्ध की जघन्य हिंसा का शिकार बनीं-स्त्रियां-क्योंकि उनकी देह ही शोषण की साइट थी।’(पृष्ठ-8).

कैसी विडम्बना है, सन् 1992-95 के बीच चले युद्ध के दुष्परिणामों को भोगने के बावजूद पूर्व के सोवियत रूस का हिस्सा रहे यूक्रेन और रूस के बीच आज फिर एक युद्ध लड़ा जा रहा है। सही अर्थों में यह अमेरिका और रूस का ‘यूक्रेन-युद्ध’ है। शायद, इसीलिए यह लंबा खिंच रहा है। युद्धरत यूक्रेन को हौसला देने ब्रिटेन के बड़बोले प्रधानमंत्री जानसन ने हाल ही में कीव का दौरा किया और यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेन्स्की के साथ उनकी तस्वीरें पूरी दुनिया के टीवी चैनलों और अखबारों में प्रमुखता से दिखाई गयीं। नाटो और यूरोपीय संघ से सम्बद्ध देश आज रूस के विरूद्ध यूक्रेन की पीठ ठोंक रहे हैं और यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेन्स्की इन ताकतवर देशों से और ज्यादा सामारिक सहायता की मांग कर रहे हैं ताकि वे युद्ध में रूस को शिकस्त दे सकें। 

काश, युद्ध को तत्काल रोकने की कोशिशें ज्यादा हुई होतीं! दोनों तरफ के युद्धोन्माद में जेलेन्स्की जैसे नौसिखिए राजनेता को शायद ही इस बात का एहसास है कि यूक्रेन और उसका समाज आज किस तरह बर्बाद होकर बिखर रहा है, किस बड़े पैमाने पर विस्थापन हो रहा है और हाल तक हंसते-खेलते रहे परिवारों का निकट भविष्य में क्या हाल होने वाला है! महिलाओं और बच्चों को किन-किन मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है; इस पर दोनों पक्षों की तरफ से मानवीय और यथार्थवादी विचार नहीं नजर आ रहा है। आज के इस भयावह परिदृश्य में गरिमा श्रीवास्तव की किताब देह ही देश अपनी प्रासंगिकता का बोध कराती है। दुनिया के तमाम ताकतवर देशों के निर्णयकारी लोगों के लिए यह एक दस्तावेजी-चेतावनी की तरह है। 

यूक्रेन युद्ध की तरह हर युद्ध के आर्थिक-राजनीतिक कारण होते हैं। क्रोएशिया और बोस्निया के खिलाफ युद्ध के भी ठोस आर्थिक-राजनीतिक कारण थे। गरिमा ने अपनी डायरी में लिखा हैः ‘ क्रोएशिया और बोस्निया के खिलाफ पूरे युद्ध का एक ही उद्देश्य था कि यहां के नागरिकों का जीवन इतना दूभर बना दिया जाये कि वे खुद ही अपने गांवों-खेतों और शहरों को छोड़कर चले जायें और वृहत्तर सर्बिया का सपना पूरा हो सके, सैनिकों ने सीधे जनसाधारण पर हमले किये-सामूहिक हत्या, व्यवस्थित बलात्कार और यातना शिविर भी, खूब सोची-समझी रणनीति के तहत बनाये गये। इस बार की छुट्टियों में मैं उत्तर-पश्चिम बोस्निया की प्रिजेडोर नगर पालिका के अंतर्गत आने वाले कुछ ऐसे लोगों से मिली हूं जो युद्ध के पहले यहां की कोयला खदानों, ईंट भट्ठों, लौह अयस्क की खदानों और अन्य खनिजों के उत्खनन एवं व्यापार से सम्बद्ध थे, 1992 की गर्मियों में सर्बियाई सैनिक बलों ने स्थानीय प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण कर लिया, बिना  किसी सैन्य प्रतिक्रिया के यह इलाका बड़े आराम से सर्बिया के पास आ गया और तब शुरू हुआ घृणा, बर्बरता का खेल, जिस पर आने वाले समय को शर्मसार होना था। ’(पृष्ठ-82).  

उस भयानक युद्ध का वर्णन करते हुए गरिमा एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य को सामने लाती हैं। वह बताती हैं कि सिर्फ सन् 1993 में तकरीबन बीस हजार बोस्नियाई स्त्रियां बलात्कार या यौन हिंसा का शिकार हुईं। वह आगे कहती हैं :‘इतना तो तय है कि सामूहिक बलात्कारों को युद्ध नीति के रूप में इस्तेमाल किया गया, जिसके तीन लाभ थे-पहला तो आम जनता में भय का संचार करना, दूसरा नागरिक आबादी को विस्थापन के लिए विवश करना और तीसरा सैनिकों को बलात्कार की छूट देकर पुरस्कृत करना।’ (पृष्ठ-84).सर्बियाई सैनिकों ने जिस तरह बोस्नियाई मुस्लिम औरतों और स्कूल जाती लड़किय़ों के साथ क्रूरता की, वह अकल्पनीय है। गरिमा ने जब ऐसी भुक्तभोगी महिलाओं से बात की तो उन्होंने अपनी दर्दनाक कहानी का समापन करते हुए जो कुछ कहा वह नाकाफी था। दरअसल, उन औरतों की यातना को व्यक्त करने में कोई भी शब्द सक्षम नहीं थे। उन्होंने अपने आंसुओं को रोकते हुए बार-बार कहा कि एक औरत के साथ इससे बदतर कुछ हो ही नहीं सकता! 

गरिमा श्रीवास्तव की यह किताब वैसे तो 192 पृष्ठों में सिमटी विदेश-प्रवास के दिनों की कड़वी और तल्ख यादों की डायरी है। पर कई कारणों से यह हमारे समय की एक महत्वपूर्ण हिन्दी कृति है। एक कारण तो यह कि हिन्दी में आमतौर पर ऐसी किताबें नहीं लिखी जाती हैं। हमारे देश के अनेक शिक्षक-प्रोफेसर अक्सर ही विदेश में शिक्षण की प्रतिनियुक्ति पर जाते रहते हैं। वे ऐसे भी देशों में जाते हैं, जहां उथल-पुथल मची होती है या कुछ समय पहले वे देश युद्ध, महामारी या आतंक जैसी चुनौती को झेल चुके होते हैं। पर ज्यादातर शिक्षक-प्रोफेसर, खासकर हिन्दी शिक्षक उन देशों में दो या तीन साल की प्रतिनियुक्ति का उपयोग विदेशी मुद्रा अर्जित कर कुछ समृद्ध होने में करते हैं या विदेश की अच्छी शराब और उत्तम भोजन का सुख लेने में लगा देते हैं। पर गरिमा अपना पैसा खर्च कर क्रोएशिया के आसपास के कई हलकों में जाती हैं और मनुष्यता पर 1992-95 के युद्ध के भयावह असर की बारीक से बारीक बात को अपनी डायरी में दर्ज करती हैं।

देह ही देश इस कारण भी एक महत्वपूर्ण कृति है कि इसमें मुल्कों, समुदायों और समाजों के टकराव के कारणों और उसके दुष्परिणामों पर बहुत ईमानदार ढंग से प्रकाश डालने की कोशिश की गयी है। उन्होंने क्रोएशिया और उसके आसपास के देशों में जो कुछ देखा और उसे अपनी डायरी में दर्ज किया, वह दुनिया के अनेक मुल्कों और हलकों की कहानी है। ऐसे मुल्कों की भी जहां हाल-फिलहाल दो देशों के बीच कोई युद्ध नहीं हुआ हो। आंतरिक उथलपुथल, जातीय तनाव और दंगे-फसाद के बाद भी वर्चस्व की शक्तिय़ों की शह पर उपद्रवियों की क्रूर भीड़ या समूह और कई हलकों में स्वयं कानून व्यवस्था या सरहदी इलाकों की रक्षा में लगाई गयी सुरक्षा एजेंसियों के वेतनभोगी कर्मी उत्पीड़ित जातियों या समूहों के लोगों, खासकर औरतों पर ऐसे जुल्मोसितम अक्सर ही ढाते रहते हैं। हां, इनका दायरा कुछ हलकों तक सीमित होता है। गरिमा बहुत साहसिक ढंग से अपने स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश का उदाहरण देती हैं, जहां के एक सूबे-मणिपुर में जुलाई, 2004 के दौरान सुरक्षा बलों से सम्बद्ध कुछ दुराचारी तत्वों के खौफनाक उदाहरण सामने आये। ऐसे ही एक खौफनाक कांड-मनोरमा बलात्कार-हत्याकांड के विरोध में मणिपुरी महिलाओं ने तब सरकारी दफ्तर के सामने निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया था।

लेखिका ने पुस्तक के शुरूआती हिस्से में बताया है कि संयुक्त यूगोस्लाविया के विखंडन से बोस्निया, हर्जेगोविना, क्रोएशिया, मैसीडोनिया और स्लोवेनिया जैसे पांच स्वायत्त देशों में हुआ जो बाद में चलकर सर्बिया, मांटेग्रो और कोसोवो में बंटा। वह बताती हैं कि आज भी सात हजार से ज्यादा क्रोएशियन शरणार्थी बोस्निया और हर्जेगोविना में हैं और इस देश में लगभग 1 लाख 31 हजार 600 लोग विस्थापित हैं। शायद और बेहतर रहा होता अगर गरिमा ने यूगोस्लाविया के विखंडन और उसके कारणों की कथा अलग अध्याय के रूप में दर्ज करतीं और उससे टूटकर बने देशों के अपने-अपने अंतर्विरोधों, टकरावों और संघर्षों का संक्षिप्त विवरण देतीं। 

उनकी डायरी में ये विवरण जगह-जगह बिखरे पड़े हैं। पर ऐतिहासिक तथ्य़ों का संक्षिप्त रूप में ही सही, एक जगह होना पाठकों के लिए ज्यादा उपयोगी होता। इससे किसी देश या जातीय समूह की पहचान करने में पाठक को सहजता होती। पर गरिमा की डायरी का विषयवस्तु हिन्दी के लिए इतना महत्वपूर्ण और नया है कि पुस्तक की ऐसी कुछ तकनीकी या संपादकीय कमियां मुझ जैसे पाठक की पसंद को तनिक भी कम नहीं करतीं। डायरी के हरेक हिस्से में गरिमा बेहद ईमानदार नजर आती हैं। अपने मुल्क और लोगों से हजारों किमी दूर आकर विदेश-प्रवास में जिंदगी को सार्थक मोड़ देने की उनकी कोशिश इस डायरी में हर जगह झांकती है। इसीलिए उनकी क्रोएशिया प्रवास-डायरी हिन्दी में डायरी लेखन की एक महत्वपूर्ण किताब बन गयी है। 

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)   

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