Sunday, August 14, 2022

कृषि कानूनों में काला क्या है -6: इन कानूनों में समर्थन मूल्य का कोई प्रावधान नहीं

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किसान कहते हैं तीनों कृषि कानून काले हैं, जबकि मोदी सरकार का दावा है कि 12 दौर कि वार्ता के बाद भी किसान सरकार को नहीं बता पाए कि कानूनों में काला क्या है? क्या आप जानते हैं नए कृषि कानूनों में एमएसपी का कोई प्रावधान नहीं है। यही तीनों कृषि कानूनों में सबसे बड़ा काला है।सरकार चाहे इन कानूनों से किसानों का कितना भी भला होने का दावा करे यदि ये तीन कानून रहेंगे तो किसान पूरी तरह कार्पोरेट्स के जरखरीद गुलाम बनकर रह जायेंगे। इन कानूनों में समर्थन मूल्य का कोई प्रावधान नहीं है । यह इन कानूनों की सबसे बड़ी नाकामी है ।यहीं से किसानों का शक और गहरा हुआ कि दाल में काला नहीं है बल्कि पूरी दाल ही काली है।   

वर्ष 1965 में ग्रीन रिवॉल्यूशन के समय एमएसपी को घोषणा हुई थी। साल 1966-67 में गेहूं की खरीद के समय इसकी शुरुआत हुई। आयोग ने 2018-19 में खरीफ सीजन के दौरान मूल्य नीति रिपोर्ट में कानून बनाने का सुझाव दिया था।10 जुलाई 2013 को तत्कालीन  भारत सरकार की ओर से अलार्म जारी किया गया कि सरकार ने फसलों का कम से कम समर्थन मूल्य तय किया है और सरकारी खरीद जारी रखने व किसानों को समर्थन मूल्य देते रहने की संबंध में सरकारी  एजेंसियां काम करेंगी और समर्थन मूल्य पर खरीदारी जारी रखेंगे रखेंगी। यदि इन एजेंसियों द्वारा किसानों के समर्थन मूल्य देने में कोई नुकसान होता है तो भारत सरकार इस पूरे नुकसान को सहन करेंगी। इसके तहत एफसीआई हर प्रकार के अनाज की खरीदारी करेगी।नाफेड सीडब्ल्यूसी एनसीसीएफ तथा एसएसएसई दाल और 13 वाले बीजों को खरीदेगी । नाफेड कपास कपास भी खरीदेगी।

एक घोषणापत्र का नंबर है F.No.6-3/2012-FEB-ES (Vol.11) और यह पेज 64 पर है ।) नए कृषि कानूनों में इस प्रोग्राम का कोई जिक्र ही नहीं बल्कि सरकार और एफसीआई खरीदार की परिभाषा से बाहर निकल चुके हैं । इन एजेंसियों को बंद किया जा रहा है । एफसीआई को बंद करने की सिफारिश शांता कुमार समिति पहले ही कर चुकी है।

एमएसपी जिसे न्यूनतम समर्थन मूल्य कहा जाता है । मिनिमम सपोर्ट प्राइस एक तरह से किसानों के फसल की मूल्य की गारंटी है । सरकार की ओर से किसानों को कुछ फसलों पर दाम की गारंटी दी जाती है जिसे एमएसपी कहा जाता है ।बाजार में फसल के दाम भले ही कितने ही कम क्यों न हो सरकार उसे किसानों से तय एमएसपी पर खरीदेगी । सरकार जिन फसलों को लेकर एमएसपी तय कर देती है उन फसलों को वो एक निर्धारित रेट पर ही खरीदती है । इससे किसानों को नुकसान होने की कम संभावना होती है ।

कृषि लागत और मूल्य आयोग हर साल खरीफ और रबी सीजन की फसल आने से पहले एमएसपी  को लेकर अध्ययन करता है । इस वक्त  23 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार तय करती है जिसमें अनाज, दलहन और कुछ कामर्शियल फसल भी शामिल हैं । गेहूं, मक्का, धान, जौ, बाजरा, चना, मूंग, उड़द, मसूर, सरसों, सोयाबीन, सूरजमूखी, गन्ना, कपास, जूट समेत कई फसलों के दाम सरकार निर्धारित करती है और फिर उसी दाम पर किसानों से खरीदती है।

एमएसपी के दायरे में कुछ सब्जियों को भी रखा गया है । कृषि सुधारों के लिए 2004 में स्वामीनाथन आयोग बना था ।आयोग ने अपनी रिपोर्ट में एमएसपी तय करने के कई फार्मूलों को लागू करने का सुझाव दिया था । डॉ. एमएस स्‍वामीनाथन कमेटी ने सिफारिश की थी कि एमएसपी औसत उत्‍पादन लागत से कम से कम 50 फीसदी अधिक होना चाहिए । अगर ऐसा होता है तो किसानों की आमदनी बढ़ेगी ।नये कानूनों में स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को अनदेखा करके मोदी सरकार ने एमएसपी ही गायब कर दिया।

खेती की लागत के अलावा कई दूसरे फैक्टर्स के आधार पर सीएसीपी फसलों के लिए एमएसपी का निर्धारण करता है। सीएसीपी, एमएसपी की सिफारिश करने के लिए किसी फसल की लागत के अलावा उसकी मांग व आपूर्ति की परिस्थिति, मार्केट प्राइस ट्रेंड्स (घरेलू और वैश्विक) और अन्य फसलों से तुलना पर भी विचार करती है। उपभोक्ताओं पर एमएसपी के कारण महंगाई और पर्यावरण पर मिट्टी और पानी के प्रयोग पर प्रभाव के अलावा कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र के उत्पादों के बीच के कारोबारी शर्तों पर भी विचार किया जाता है। सरकार इन सुझाव पर स्टडी करने के बाद एमएसपी की घोषणा करती है।

एमसपी में किसानों को एक तय दाम से कम कीमत पर अपनी फसल को बेचने की मजबूरी नहीं होती है। सरकार को निर्धारित दाम पर फसल खरीदने पड़ते हैं। कृषि कानूनों के जरिए एमएसपी खत्म करने की साजिश हो रही थी।कृषि कानूनों को वापस लेने की सरकार की घोषणा के बाद भी किसानों का आंदोलन खत्म नहीं हुआ है। किसानों को कहना है कि कृषि कानूनों को सरकार पहले संसद में लाकर रद्द करने की प्रक्रिया पूरी करे।भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने कहा है कि सरकार पर भरोसा नहीं है। इसके साथ ही किसानों की मांग है कि सरकार एमएसपी की गारंटी दे और इसे लेकर कानून बनाया जाय।इसके साथ ही किसान बिजली संशोधन बिल को भी वापस करने की मांग कर रहे हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह इलाहाबाद मेंरहते हैं।)

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