Wednesday, August 10, 2022

भारत में लोकतंत्र बचेगा या मनुस्मृति वाली शासन प्रणाली लागू होगी?

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फ्रांस के राजा लुइस और रानी मैरी से लेकर हिटलर और मुसोलिनी तथा दुनिया भर के अन्य जन-विरोधी शासकों के अंत का इतिहास न तो कांग्रेसियों ने लिखा है और न ही किसी वामपंथी ने, जो देश के वर्तमान गर्वोन्मत्त और आत्ममुग्ध सत्ताधारियों को चीख-चीख कर चेतावनी दे रहा है।

और, यह चित्र भी एक ऐसी ऐतिहासिक घटना की याद दिला रहा है जिसमें सामान ढोने वाली एक साधारण घोड़ा गाड़ी पर संगीनों के साये में सहम कर बैठी हुई महिला के दोनों हाथ पीछे की ओर बंधे हुए हैं। उसी के बगल में मायूस बैठे सिर झुकाये आदमी के भी दोनों हाथ बंधे हुए हैं।

मान-सम्मान और पद-प्रतिष्ठा से च्युत बंदी बनाकर इस तरह ले जाये जा रहे ये दोनों कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि फ्रांस के राजा लुइस और रानी मैरी हैं।

इतिहास में दर्ज है कि फ्रांस में सत्ता और चर्च की दुरभिसंधि से प्रचलित शोषणकारी एकाधिकारवादी राजतंत्र और जमींदारी प्रथा समाप्त कर संवैधानिक राजतंत्र लागू करने और चर्च के अधिकारों को सीमित कर जनता को मताधिकार देकर प्रजातांत्रिक व्यवस्था को लागू करने के लिए सर्वहारा वर्ग ने फ्रांस में ईस्वी सन् 1789 से 1799 के बीच दस साल तक लगातार संघर्ष किया।

अंततोगत्वा 1799 में राजा लुइस और रानी मैरी की गिरफ्तारी के बाद फ्रांस की जनक्रांति समाप्त हुई। बहुमूल्य वस्त्राभूषण पहनकर बड़ी ठसक से सोने की शानदार बग्घी में सफर करने वाले राजा-रानी दोनों को माल ढोने वाली टूटी-फूटी साधारण घोड़ा गाड़ी में कैदियों की तरह बैठाकर जेल में बंद कर दिया गया। 

इससे पहले भी इतिहास में अनेकों राजा, महाराजा और सम्राट युद्ध में पराजित हुए, मारे गये या बराबरी वाले विजेता द्वारा कारावास में डाल दिये गये लेकिन यह पहली बार हुआ जब जनांदोलन के कारण न केवल किसी राजा के साम्राज्य का अंत हो गया, बल्कि उसे कैदखाने में बंद किया गया और अंततः राजा लुइस तथा रानी मैरी को मौत के घाट उतार दिया गया।

फ्रांस की क्रांति का प्रभाव दुनिया के दूसरे देशों पर भी पड़ना शुरू हुआ तो एक-एक कर तमाम साम्राज्यों की नींव दरकने लगी और राजशाही का अंत होने लगा। यूरोप, अफ्रीका, रूस, चीन में राजतंत्र को जनक्रांति के द्वारा उखाड़ फेंका गया। आलीशान महलों से संचालित राज परिवारों की शक्ति छीनकर जनता द्वारा निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के हाथों में आ गई।

गुजरते हुए वक्त के साथ जनक्रांतियों का सिलसिला जारी रहा। फ्रांस की क्रांति के डेढ़ सौ साल बाद भारत में भी जनता ने ब्रिटिश शासन का जुआ अपने कंधों से उतार कर सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ले ली।

उधर 1979 में कट्टरपंथी मुस्लिम देश अफ़ग़ानिस्तान में भड़के जनविद्रोह के कारण कम्युनिस्ट सरकार की स्थापना के लिए सोवियत सैनिकों ने देश में प्रवेश किया और सदैव के लिए राजशाही का अंत हो गया‌।

नेपाल में भी राजतंत्रीय व्यवस्था के विरुद्ध वर्षों तक चलते रहे जनांदोलनों और उथल-पुथल के बाद 2008 में लोकतंत्र की स्थापना हुई।

हालांकि इसी बीच नेपाल के एक छोटे-से राजनीतिक दल ने राजतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए प्रयास शुरू किया है। जिसका अर्थ है—ब्राह्मणों द्वारा विष्णु का अवतार घोषित क्षत्रिय राजा के शासन का लौटना। जैसे सन 1949 में भारतीय गणराज्य में विलय से पहले और उसके दशकों बाद तक टिहरी रियासत के राजा को ‘बोलांदा बदरीनाथ’ यानी साक्षात भगवान बदरीनाथ कहा जाता रहा।

भारत में आरएसएस ईरानी शिया नेता आयतुल्ला खोमैनी मुसावी की तरह अपने सरसंघचालक को हिंदुओं की धार्मिक आस्था और राजसत्ता का एकछत्र अधिष्ठाता देवता बनाने को प्रयासरत है। फासिस्ट वर्चस्ववादी संघ जिस तरह सधी हुई चालें चल रहा है उसे देखते हुए आने वाले समय में जल्दी ही भाजपा अत्यधिक शक्तिशाली हो सकती है। जिससे सरसंघचालक को राष्ट्रपति बनाकर संविधान समाप्त करना आसान हो जाएगा और फिर उसे ही पंडे-पुजारियों, भगवाधारियों और बड़े-बड़े दो-तीन पूंजीपतियों के गठजोड़ से भारत भाग्यविधाता घोषित कर दिया जायेगा। इसका संकेत अयोध्या में मंदिर निर्माण की शुरुआत करते समय देश की हिंदू परंपरा को किनारे रखकर किसी भी शंकराचार्य को आमंत्रित किये बिना ही मोहन भागवत ने स्वयं पूजा-अर्चना करके दे दिया है। राम मंदिर निर्माण के सम्मोहन से मंत्र-मुग्ध हिंदू जनमानस ने इस अपारंपरिक घटना का जरा भी नोटिस नहीं लिया। जबकि संघ की इस कुटिलता का हर हाल में विरोध होना चाहिए था। 

दुनिया आज विज्ञान, प्रौद्योगिकी और वाणिज्य के सहारे निरंतर उन्नति के पथ पर अग्रसर है परंतु हमें साम्प्रदायिक व जातीय घृणा तथा द्वेष का विषाक्त वातावरण बनाकर मनुस्मृति आधारित वर्ण-व्यवस्था और शासन प्रणाली की ओर धकेला जा रहा है। यह याद रखना चाहिए कि संघ-भाजपा की मजबूती का मतलब है संविधान और कानून के राज की समाप्ति और मनुस्मृति आधारित वर्ण-व्यवस्था का लागू होना।

इसके साथ ही यह भी विचारणीय है कि आज जिस तरह सत्ता प्रतिष्ठान पर काबिज़ लोग अपने चंद वित्त पोषकों और भगवा ब्रिगेड की मदद से झूठ-कपट और छल-प्रपंच का मायाजाल फैलाकर आमजन का जीवन दुखमय बनाने में जुटे हुए हैं, उससे जनक्रांति के फट पड़ने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। शायद इसका आभास शातिर दिमागों को हो गया है, इसीलिए तेवरों में बदलाव आता दिख रहा है। अन्यथा एक पत्रकार के सवाल का सीधा जवाब न देकर दोस्ती बनी रहे कहकर उठ खड़ा होने वाला नेता किसानों से खुलेआम माफी कदापि नहीं मांगता।

(श्याम सिंह रावत लेखक और टिप्पणीकार हैं।)

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