Monday, December 5, 2022

कृषि कानूनों में काला क्या है-12:कृषि उपज मंडी और आवश्यक वस्तु कानूनों में कैसा संशोधन चाहती थी कांग्रेस?

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वैसे तो तीनों कृषि कानूनों को लेकर अगर कोई एक विपक्षी नेता सीना तान के खड़ा रहा तो उसका नाम है राहुल गांधी। पूरे आंदोलन के दौरान लेफ्ट के अलावा आर्थिक उदारीकरण की पैरवीकार कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी कृषि कानूनों के विरोध में न केवल डटकर खड़े रहे बल्कि उसका सक्रिय विरोध भी किया ।यह ठीक है कि किसान आंदोलन के नेता अपने मंच को राजनीतिक नहीं बनने देना चाहते थे और उन्होंने इसके लिए किसी भी राजनीतिक दल के नेता को अपने मंच पर चढ़ने नहीं दिया। एक योगेंद्र यादव थे जिन्हें किसान आंदोलन के दौरान किसान नेताओं ने मंच से बाहर कर दिया था।लेकिन यदि वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव के समय का कांग्रेस का घोषणा पत्र देखा जाए तो बड़ी चालाकी से कांग्रेस कृषि उपज मंडी समितियों के अधिनियम में संशोधन तथा आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन की बात खेती किसानी के चैप्टर में शामिल किया गया था।

इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि कांग्रेस आवश्यक वस्तु अधिनियम में किस तरह का परिवर्तन करना चाहती थी।राहुल गाँधी को बताना पड़ेगा कि वर्ष 2024 में यदि कांग्रेस सत्ता में आई तो तत्कालीन वित्तमंत्री डॉ मनमोहन सिंह द्वारा वर्ष 1994 में खेती-बाड़ी समझौते में किए गए दस्तखत के अनुरूप किसानों को सब्सिडी नहीं खत्म करेगी, मंडिया नहीं खत्म करेगी  और समय समय पर एमएसपी में संशोधन करती रहेगी।

घोषणा पत्र में किसानों के चैप्टर के पहले ही बिंदु में कहा गया है कि कांग्रेस कृषि उपज मंडी समितियों के अधिनियम में संशोधन करेगी, जिससे कि कृषि उपज के निर्यात और अंतर्राज्यीय व्यापार पर लगे सभी प्रतिबन्ध समाप्त हो जायें। 21वें बिन्दु में कहा गया है कि आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 को बदलकर आज की जरूरतों और संदर्भों के हिसाब से नया कानून बनायेंगे जो विशेष आपात परिस्थितियों में ही लागू किया जा सकेगा।अब यह कांग्रेस या दूसरे शब्दों में राहुल गाँधी को स्पष्ट करना चाहिए कि इनके आशय क्या हैं,क्या नरेंद्र मोदी के कृषि कानूनों से अलग ये कैसे हैं।आखिर कांग्रेस इनमें किस तरह का बदलाव करती यदि उसकी सरकार बनती?

घोषणा पत्र में कहा गया था कि हम बड़े गांवों और छोटे कस्बों में पर्याप्त बुनियादी ढांचे के साथ में किसान बाजार की स्थापना करेंगे, जहां पर किसान बिना किसी प्रतिबंध के अपनी उपज बेच सकें। 1कांग्रेस कृषि उत्पादों के आयात और निर्यात के लिए नीति बनाएगी, जो किसानों और किसान उत्पादक समूहों/कंपनियों को उनकी आय वृद्धि के लिए सहायता करेगी। कांग्रेस देश के प्रत्येक ब्लॉक में आधुनिक गोदाम, कोल्ड स्टोर और खाद्य प्रसंस्करण सुविधाएं उपलब्ध करवाने के लिए नीतियां बनायेगी। हम एग्रीकल्चर एक्सटेंशन सर्विसेज की पुरानी प्रथा को पुनर्जीवित करके और अधिक मजबूत और बेहतर बनाएंगे साथ ही कृषि क्षेत्र में सर्वोत्तम ज्ञान और कार्यप्रणाली को लागू करेंगे।

कांग्रेस ने पी.डी.एस, आई.सी.डी.एस. और मध्यान्ह भोजन योजना को बनाये रखने की बात कहते हुए कहा था कि  इनके लिए खरीदे जा सकने वाले, तथा स्थानीय स्तर पर उपजने वाले मोटे अनाजों और दालों को उगाने के लिए प्रोत्साहित करेगी। कांग्रेस कृषि विविधिकरण द्वारा किसानों की आय में वृद्धि करने के लिए बागवानी, मछलीपालन और रेशम कीटपालन के लिए एक बड़े कार्यक्रम को प्रोत्साहित करने का वायदा करती है। हम देश में डेयरी और पॉल्ट्री उत्पादों को दोगुना करने के लिए एक राष्ट्रीय परियोजना की शुरूआत करेंगे।

कांग्रेस जैविक खेती को बढ़ावा देगी, किसानों को मिश्रित उर्वरक और कीटनाशकों के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहन देगी और जैविक उत्पादों के सत्यापन में सहायता करके उचित मूल्य उपलब्ध करवाने का वायदा करती है।कांग्रेस कृषि सम्बन्धित अध्यापन, अनुसंधान और विकास, कृषि सम्बधी मौलिक विज्ञान, व प्रायोगिक विज्ञान और तकनीकी के लिए आवंटित धन को अगले पांच वर्षों में दोगुना करेगी, हम देश के प्रत्येक राजस्व प्रभाग में कृषि विद्यालय और पशु चिकित्सा विज्ञान महाविद्यालय की स्थापना करेंगे।

घोषणा पत्र में कहा गया था कि कृषि ऋण एक दीवानी (सिविल) मामला है, हम, किसी भी किसान, जो कृषि ऋण चुकाने में असमर्थ है के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही करने की अनुमति नहीं देंगे। कृषि क्षेत्र को विशेष महत्व देते हुए हम अलग से किसान बजट प्रस्तुत करेंगे। 5. कांग्रेस कृषि क्षेत्र के विकास की योजनाओं और कार्यक्रम को बनाने के लिए एक स्थाई राष्ट्रीय आयोग “कृषि विकास और योजना आयोग” की स्थापना करेगी, जिसमें किसान, कृषि वैज्ञानिक और कृषि अर्थशास्त्री सम्मलित होंगे, यह आयोग सरकार को सलाह देंगे कि कैसे कृषि को व्यवहार्य, प्रतिस्पर्धी और फायदेमंद बनाया जा सकता है। आयोग की सिफारिशें मानने के लिए सरकार बाध्य होगी। यह आयोग कृषि लागत और मूल्य आयोग का स्थान लेगा।

कांग्रेस “कृषि श्रमिकों और सीमान्त किसानों” के लिए बनने नीतियों और कार्यक्रम के लिए सलाह देने के लिए एक आयोग स्थापित करेगी, यह आयोग मज़दूरी दर में वृद्धि के साथ बागवानी, फूलों की खेती, डेयरी और मुर्गीपलान जैसे सहायक कृषि कार्यों के लिए नीतियां ओर कार्यक्रम बनाने में सलाह देगा और सहयोग करेगा। हम भाजपा सरकार की असफल कृषि बीमा योजना को पूरी तरह से बदल देंगे। जिसने किसानों की कीमत पर, बीमा कंपनियों की जेब भरी है तथा बीमा कंपनियों को निर्देशित करेंगे कि वो “न लाभ न हानि” के सिद्धान्त को अपनाते हुए फसल बीमा उपलब्ध करवाये और उसी के आधार पर किश्त लें।

कांग्रेस राज्य सरकारों के सहयोग से भूमि स्वामित्व और भूमि किराएदारी के रिकार्ड का डिजिटाइजेशन (अंकरूपण) करेगी, और विशेषकर महिला कृषकों के स्वामित्व और किरायेदारी के अधिकार को स्थापित करते हुए यह सुनिश्चत करेगी कि महिलाओं को कृषि संबंधित योजनाओं का लाभ मिले।

कृषि कार्यों हेतु तकनीकी निदेश और बाज़ार उपलब्ध करवाने के लिए कांग्रेस उत्पादक कंपनियों ओर किसान संगठनों के निर्माण के लिए किसानों को प्रोत्साहित करेगी। हम कृषि लागत की समीक्षा करेंगे और जहाँ आवश्यक हुआ वहां सब्सिडी देंगे इसके साथ ही हम कृषि कार्य के लिए मशीनरी किराये पर लेने की सुविधा स्थापित करेंगे।कांग्रेस वायदा करती है कि भूमि अधिग्रहण, पुर्नवास और पुनस्थापना अधिनियम-2013 और वनाधिकार अधिनियम – 2006 के क्रियान्वयन मैं आई विकृतियों को दूरकर, इन अधिनियमों के मूल उद्देश्यों से करेंगे।

 वर्ष 2019 में चुनाव घोषणा पत्र को जिस समय कांग्रेस अध्यक्ष ने जारी किया, उस समय वैश्वीकरण लागू कर बाज़ार खोलने वाले मनमोहन सिंह और पी. चिदंबरम भी मंचासीन थे। मनमोहन सिंह ने दो साल पहले 2017 में इंडियन समर स्कूल में बोलते हुए कहा था कि ‘वैश्वीकरण अस्तित्वमान रहेगा और जो लोग इसकी शुरुआत के दौरान आशंकित थे, वे आज ग़लत साबित हुए हैं।इसी तरह, पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा था कि पिछले पच्चीस साल में देश के हालात सुधरे हैं, लेकिन हमारी उम्मीदों से कम। इसका कारण यह नहीं है कि हमने अर्थव्यवस्था खोली, बल्कि यह है कि हमने अर्थव्यवस्था कम खोली।

लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि घोषणापत्र तैयार करने वालों में डॉ मनमोहन सिंह और पी चिदम्बरम शामिल थे, जो वैश्वीकरण लागू कर बाज़ार खोलने की नीतियों के सबसे बड़े पैरवीकार माने जाते हैं।इसलिए चुपके से उन्होंने उक्त प्रावधान डलवा दिए, जबकि कांग्रेस के समग्र चुनाव घोषणापत्र में कांग्रेस को ज़मीन पकड़ने के लिए उदारीकृत नीतियों से दूर हटाने का संकेत देना पड़ा। कांग्रेस के घोषणा पत्र में खुली और उदार अर्थव्यवस्था का ज़िक्र था अर्थात अपने तमाम संकेतों के साथ कांग्रेस उदारीकरण की विरासत को छोड़ना नहीं चाहती थी।

राहुल गाँधी उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष थे।उनके द्वारा जारी घोषणापत्र  वैश्वीकरण के अंत या वापसी का संकेत था।इसलिए अब बहुत जरुरी हो गया है कि राहुल गाँधी यह स्पष्ट करें कि कृषि उपज मंडी समितियों के अधिनियम में संशोधन और आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में बदलाव से कांग्रेस का क्या आशय था।   

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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