Wednesday, August 10, 2022

राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर चार धाम प्रोजेक्ट को सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी

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उच्चतम न्यायालय ने बहुचर्चित चार धाम प्रॉजेक्ट के तहत सड़कों को चौड़ा करने की मंजूरी देते हुए देश की रक्षा चिंताओं और पर्यावरण चिंताओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। लेकिन यह सुनिश्चित नहीं किया है कि उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में इस परियोजना को आस्था से जोड़कर भुनाने की कोशिश भाजपा न करे जैसा कि अयोध्या विवाद में वह कर रही है। यह सर्व विदित है कि उच्चतम न्यायालय के आदेश से अयोध्या में राम मन्दिर बन रहा है पर इसका श्रेय भाजपा ले रही है। चार धाम प्रॉजेक्ट मूलतः गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ को सड़क मार्ग से जोड़ने की योजना है, जिसका मकसद इन तीर्थों तक ऑलवेदर कनेक्टिविटी सुनिश्चित करना है।

उच्चतम न्यायालय में उत्तराखंड में चारधाम प्रोजेक्ट को मंजूरी दिलाने में एक बार फिर राष्ट्रवादी कार्ड चल गया है और उच्चतम न्यायालय ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हाईवे की चौड़ाई बढ़ाने की इजाजत दे दी है। अब तीन हाईवे को डबल-लेन बनाने का रास्ता साफ हो गया है। उच्चतम न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि अदालत सेना के सुरक्षा संसाधनों को तय नहीं कर सकती। हाल में बॉर्डर पर सुरक्षा के लिहाज से गंभीर चुनौतियां सामने आई हैं। लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी इस तरह के निर्णयों को नागरिकों के सेंटिमेंट से जोड़ कर वोट में बदलने का प्रयास करती है जैसा रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को पूरे देश विशेषकर उत्तर प्रदेश में अमृत महोत्सव के नाम पर किया जा रहा है और श्रेय लेने की बेशर्म कोशिश हो रही है। उत्तर प्रदेश में इसके लिए गेरुआ ब्रिगेड उतर दिया गया है जिसमें श्री लेने के साथ विस्फोटक और भडकाऊ भाषण दिए जा रहे हैं। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है चारधाम प्रोजेक्ट तो उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को यह मुद्दा राष्ट्रवादी मोड में उच्चतम न्यायालय ने दे दिया है।    

उच्चतम न्यायालय ने सुरक्षा चिंताओं के मद्देनजर चार धाम सड़क परियोजना के तहत बन रही सड़कों को ‘डबल लेन’ तक चौड़ा करने की अनुमति दे दी है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने मंगलवार को यह फैसला सुनाते हुए चारधाम परियोजना के बारे में सीधे जानकारी प्राप्त करने के लिए पूर्व जज जस्टिस एके सीकरी की अध्यक्षता में एक निरीक्षण समिति का भी गठन किया है। पीठ ने कहा कि समिति को रक्षा मंत्रालय, सड़क परिवहन मंत्रालय, उत्तराखंड सरकार और सभी जिलाधिकारियों का पूरा सहयोग प्राप्त होगा।

अब कहा जा रहा है कि इस फैसले के बाद चीन बॉर्डर पर रक्षा तैयारियों को मजबूत किया जा सकेगा। पीठ ने रक्षा मंत्रालय को अनुमति दे दी है कि ऋषिकेश से गंगोत्री तक सड़क को 10 मीटर तक चौड़ा किया जा सकता है। चीन के साथ बढ़ते तनाव को देखते हुए रक्षा मंत्रालय ने उच्चतम न्यायालय से सितंबर 2020 आदेश को संशोधित करने का आग्रह किया था। तब सड़क की चौड़ाई को 5.5 मीटर तक ही सीमित रखने का आदेश दिया गया था और इसकी वजह पर्यावरण संबंधी चिंताएं थीं।

इस पर रक्षा मंत्रालय ने तर्क दिया था कि देश की सुरक्षा सर्वोपरि है। सरकार का तर्क है कि सड़क को इतना चौड़ा किए जाने की जरूरत है जिससे टैंक जैसे भारी भरकम हथियारों को आसानी से बॉर्डर के करीब ले जाया जा सके। 12 हजार करोड़ रुपये की लागत वाली करीब 900 किमी वाली चारधाम परियोजना पर्यावरण एवं अन्य कारणों से अदालत में लंबित थी। इस मामले में रक्षा मंत्रालय ने हलफनामा भी दायर किया था। ऑल वेदर चारधाम परियोजना के एक हिस्से पर सड़क की चौड़ाई के बारे में उच्चतम न्यायालय में मामला था, जिसके कारण ये आगे नहीं बढ़ पा रही थी।

पीठ ने कहा कि सामरिक महत्व के राजमार्गों के साथ अन्य पहाड़ी इलाकों के समान व्यवहार नहीं किया जा सकता है। वे राष्ट्र की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। पर्यावरणीय मुद्दों के रखरखाव के लिए निरंतर निगरानी की भी आवश्यकता है। जस्टिस सीकरी की अध्यक्षता में गठित निरीक्षण समिति का उद्देश्य नई सिफारिशों के साथ आना नहीं है बल्कि उच्चाधिकार प्राप्त समिति की मौजूदा सिफारिशों का कार्यान्वयन सुनिश्चित करना है। समिति हर 4 महीने में परियोजना की प्रगति पर उच्चतम न्यायालय को रिपोर्ट करेगी। अब सड़क की चौड़ाई 10 मीटर करने की इजाजत दे दी गई है।

पीठ ने कहा कि अदालत यहां सरकार की नीतिगत पसंद पर सवाल नहीं उठा सकती है और इसकी अनुमति नहीं है। राजमार्ग जो सशस्त्र बलों के लिए रणनीतिक सड़कें हैं, उनकी तुलना ऐसी अन्य पहाड़ी सड़कों से नहीं की जा सकती है। हमने पाया कि रक्षा मंत्रालय द्वारा दायर एमए में कोई दुर्भावना नहीं है। एमओडी सशस्त्र बलों की परिचालन आवश्यकता को डिजाइन करने के लिए अधिकृत है। सुरक्षा समिति की बैठक में उठाई गई सुरक्षा चिंताओं से रक्षा मंत्रालय की प्रामाणिकता स्पष्ट है। सशस्त्र बलों को मीडिया को दिए गए बयान के लिए पत्थर में लिखे गए बयान के रूप में नहीं लिया जा सकता है। न्यायिक समीक्षा के अभ्यास में यह अदालत सेना की आवश्यकताओं का दूसरा अनुमान नहीं लगा सकती है।

गौरतलब है कि 11 नवंबर को चारधाम परियोजना में सड़क की चौड़ाई बढ़ाने के मामले में उच्चतम न्यायालय ने विस्तार से सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रखा था। केंद्र और याचिकाकर्ता की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित था। उच्चतम न्यायालय ने दोनों पक्षों से दो दिनों में लिखित सुझाव देने को कहा था। उच्चतम न्यायालय को तय करना था कि करीब 900 किलोमीटर की चार धाम ऑल वेदर राजमार्ग परियोजना में सड़क की चौड़ाई बढ़ाई जा सकती है या नहीं। केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय से सितंबर 2020 के आदेश में संशोधन की मांग की है जिसमें चारधाम सड़कों की चौड़ाई को 5.5 मीटर तक सीमित करने का आदेश दिया था। केंद्र का कहना था कि ये भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा की ओर जाने वाली सीमा सड़कों के लिए फीडर सड़कें हैं, उन्हें 10 मीटर तक चौड़ा करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

याचिकाकर्ता की ओर से कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा था कि हिमालय के पर्यावरण की स्थिति खतरे में है। अभी तक आधी परियोजना पूरी हुई है। हादसा दुनिया ने देखा है, अब आपको पूरा करना है तो जरूर करें, लेकिन बर्बादी के लिए तैयार रहें। नुकसान कम करने के उपाय करने की बजाय उसे बढ़ाया जा रहा है। सड़कों को चौड़ा करने के उपाय तकनीकी और पर्यावरण उपायों के साथ होने चाहिए। डिजाइन, ढलान, हरियाली, जंगल कटान, विस्फोट से पहाड़ काटने आदि को ध्यान में रखते हुए संबद्ध विशेषज्ञों की राय से करना चाहिए।

गोंजाल्विस ने यह भी तर्क दिया था कि ऋषिकेश से माना इलाके में विकास के नाम पर जंगलों की अंधाधुंध कटाई पहाड़ों को विस्फोट से तोड़ने के कार्यों से भू स्खलन की घटनाएं बढ़ी हैं। प्राकृतिक आपदाएं जैसे बाढ़ और बादल फटने की भी घटनाएं बढ़ी हैं। इस बाबत गठित उच्चाधिकार समिति यानी एचपीसी की भी रिपोर्ट्स ने कई गंभीर मुद्दों की ओर इशारा किया है। हिमालय के उच्च इलाकों में पचास किलोमीटर के दायरे में कई हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट चल रहे हैं। चारधाम क्षेत्र में भी विकास के नाम पर अंधाधुंध निर्माण जारी है, फौरन इनको रोकने की जरूरत है। रिफ्लेक्टर लगाए जाएं जिनसे पहाड़ों की छाया वाले इलाकों में भी रोशनी जाए। हरियाली बढ़े। कई दर्रों में तो जहां सूरज की रोशनी नहीं आती वहां वनस्पति भी नहीं होती। इस उपाय से हरियाली बढ़ेगी। इन उपायों का आने वाली पीढ़ियों पर असर पड़ेगा क्योंकि पर्यावरण, गंगा यमुना जैसी नदियों के प्रवाह और संरक्षण पर असर पड़ेगा। भगवान चार धाम में नहीं बल्कि प्रकृति में हैं।

केंद्र ने कहा कि उत्तराखंड में भूस्खलन की चपेट में आने वाले क्षेत्रों के बारे में अध्ययन चल रहा है, जहां भारत-चीन सीमा की ओर जाने वाली सड़कों का निर्माण किया जाना है। जनवरी 2021 में भारतीय भौगोलिक सर्वेक्षण, रक्षा भूवैज्ञानिक अनुसंधान संगठन और टिहरी हाइड्रोइलेक्ट्रिक कॉरपोरेशन के साथ संवेदनशील स्थानों पर अध्ययन, नदियों/घाटियों में डंपिंग को रोकने के लिए कदम और अन्य मुद्दों के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं। उच्चतम न्यायालय ने केंद्र से पूछा था कि क्या पहाड़ी कटाव के प्रभाव को कम करने और भूस्खलन को रोकने के लिए कोई अध्ययन किया गया है। केंद्र ने कहा कि स्थल का दौरा किया जा रहा है। रिपोर्ट्स का इंतजार है।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि राष्ट्र की सुरक्षा को प्राथमिकता है। सुरक्षा को अपग्रेड करने की जरूरत है। विशेष रूप से हाल के दिनों में सीमा की घटनाओं को देखते हुए रक्षा से जुड़ी चिंताओं को छोड़ा नहीं जा सकता। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि हम नहीं चाहते कि भारतीय सैनिक 1962 के हालात में हों लेकिन रक्षा और पर्यावरण दोनों की जरूरतें संतुलित होनी चाहिए। वहीं केंद्र ने सड़क चौड़ी करने की मांग करते हुए कहा था कि चीन द्वारा दूसरी तरफ जबरदस्त निर्माण किया है। चीन दूसरी तरफ हेलीपैड और इमारतें बना रहा है। टैंक, रॉकेट लांचर और तोप ले जाने वाले ट्रकों को इन सड़कों से गुजरना पड़ सकता है। इसलिए रक्षा की दृष्टि से सड़क की चौड़ाई दस मीटर की जानी चाहिए।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।) 

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