Thursday, July 7, 2022

आप की सरकार और चुनौतियों का अम्बार  

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पांचों राज्यों में विधानसभा चुनाव के परिणाम सामने आ गए हैं। मणिपुर, गोवा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में परिणाम भाजपा के पक्ष में गए हैं जबकि पंजाब में आम आदमी पार्टी का आह्वान ‘इक्क मौका आप नू’ काम कर गया है और रिवायती पार्टियों से बेहाल हुई जनता ने इस बार प्रचंड बहुमत से एक नयी पार्टी आम आदमी पार्टी को मौका दिया है।

इन पांचों राज्यों में से पंजाब का चुनावी माहौल और राजनीतिक घटनाक्रम सबसे दिलचस्प रहा है। यह राजनीतिक विज्ञान के छात्रों के लिए कई पहलुओं से सचमुच एक बहुत ही दिलचस्प अध्ययन का विषय साबित हो सकता है। पांच राज्यों में जब चुनाव आयोग ने चुनावों की घोषणा की थी तब पंजाब के लाखों किसान दिल्ली बॉर्डर से साल भर लंबा आंदोलन लड़कर और मोदी सरकार को तीनों काले कानून वापस लेने पर मजबूर कराकर लौटे थे। पंजाब के लोग चाहते थे कि किसान चुनावों में भाग लें और सत्ता अपने हाथ में लेने का प्रयास करें। बहुत से बुद्धिजीवी किसानों के चुनाव में हिस्सा लेने के पक्ष में नहीं थे। कम से कम किसान एकता की कीमत पर तो बिल्कुल नहीं।

अरविंद केजरीवाल लगातार पंजाब के दिग्गज किसान नेता बलवीर सिंह राजेवाल पर डोरे डाल रहे थे और चाहते थे कि उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करके पंजाब में चुनाव लड़ा जाए। राजेवाल किसानों के लिए ज्यादा सीटें चाहते थे और केजरीवाल चाहते थे कि सिर्फ राजेवाल ही आम आदमी पार्टी में शामिल हो। बात बनती न देख कर केजरीवाल ने बड़ी चतुराई के साथ इस बात को इतना लटकाया की राजेवाल अपनी पार्टी का रजिस्ट्रेशन भी नहीं करवा सके और केजरीवाल पूरे पंजाब में अपना टिकट बांटते चले गए। राजेवाल को जब तक यह खेल समझ में आता तब तक बाजी उनके हाथ से निकल चुकी थी। उधर किसान मोर्चा ने कह दिया था कि राजेवाल चुनाव मोर्चा के नाम पर न लड़ें।

पता नहीं किस गणित के तहत या भाजपा के इशारे पर चुनाव आयोग ने एक सप्ताह के लिए रजिस्ट्रेशन की तारीख बढ़ा दी। संयुक्त किसान समाज का रजिस्ट्रेशन बिल्कुल आखिरी तारीख को हुआ। बेशक लोगों की हमदर्दी किसानों के साथ थी लेकिन चुनाव की तारीख तक लोगों को यह नहीं पता था कि किसानों का चुनाव चिन्ह क्या है या कौन सा नेता कहां से खड़ा है। राजेवाल अरविंद केजरीवाल को कोसते रह गए और उन्होंने केजरीवाल पर कई गंभीर आरोप भी लगाए लेकिन इस बार पंजाब के लोग कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने कुमार विश्वास और उसके बाद विपक्ष द्वारा अरविन्द केजरीवाल को भी खालिस्तानी साबित करने के प्रयासों को हवा में उड़ा दिया।

पंजाब के लोग बहुत पहले से मन बना चुके थे कि इन परम्परागत पार्टियों को छोड़कर इस बार एक मौका ‘आप’ को दिया जाए। हालांकि आम आदमी पार्टी के प्रत्याशियों के बारे में भी किसी को कोई जानकारी नहीं थी लेकिन एक ऐसी लहर खड़ी हो चुकी थी कि लोगों ने मन बना लिया था कि प्रत्याशी कोई भी हो वोट आम आदमी पार्टी को ही डालना है।

भगवंत मान को छोड़कर आम आदमी पार्टी के किसी प्रत्याशी का नाम कोई नहीं जानता था लोग एक ही बात कहते नजर आ रहे थे इस बार वोट झाड़ू को डालना है। बहुत से आम आदमी पार्टी के प्रत्याशियों के पोस्टर भी बहुत ज्यादा कहीं नजर नहीं आ रहे थे। फिर भी आम आदमी पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला। अमरिंदर सिंह, नवजोत सिंह सिद्धू, चरणजीत चन्नी, प्रकाश सिंह बादल, सुखबीर सिंह बादल और तमाम दिग्गज विपक्षी नेता इस चुनाव में हार गए।

इस चुनाव में और भी बहुत से तमाशे हुए। प्रधानमंत्री मोदी का वह ‘जिन्दा वापस लौट आया’ वाले तमाशे को पंजाब के लोगों ने बहुत पसंद किया खूब खिल्ली उड़ाई। इस पूरे प्रकरण के दौरान आपातकाल के दिनों की याद आना स्वाभाविक था। उन दिनों पूरे देश में जो लहर और राजनीतिक चेतना पूरे देश में दिखाई देती थी उसकी झलक इन दिनों पंजाब में देखने को मिल रही है।    

इस चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी और उनके सिपहसालार शाह ने मिलकर काफी जोर लगाया था। दोनों निजी तौर पर जाकर कई मठों-डेरों के महंतों से मिले थे। सिरसा का बाबा राम रहीम जो बलात्कार के जुर्म में सजा भुगत रहा है उसे भी विशेष रूप से 21 दिन की फरलो दी गई क्योंकि राम रहीम के भी बहुत से अंधभक्त हैं जो कम से कम पंजाब की 51 सीटों पर अपना असर डालते हैं। इसलिए मोदी और शाह का पूरा जोर इसी बात पर रहा कि अगर यह बड़े-बड़े डेरे उनके पक्ष में वोट डालने के लिए अपने भक्तों को कह देते हैं तो त्रिशंकु विधानसभा बनने की संभावनाएं पैदा हो सकती हैं और राष्ट्रपति शासन के लिए रास्ता दुरुस्त हो सकता है।

परिणाम आने से एक दिन पहले भाजपा के केंद्रीय नेता अनुराग ठाकुर ने भी दावा किया था कि पंजाब में त्रिशंकु राज्यसभा बनने के पूरे आसार हैं। लेकिन किसान आन्दोलन के बाद एक नया राजनीतिक समाज उभर कर सामने आया है। यह पहली बार हुआ है कि पंजाब के लोग धर्म और जाति के सब बंधनों को तोड़कर, एक-जुट होकर पंजाब के लिए एक नया विकल्प खड़ा करने के लिए जो मन बनाया था उसमे सफल हो गए। पंजाब में अब तक चुनाव पर हावी रहने वाला डेरा फैक्टर बुरी तरह से फेल हो गया।

किसी पंडित के कहने पर अमरिंदर सिंह ने चुनावों में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए बछिया दान की। वह हार गए। चरणजीत चन्नी भी किसी तांत्रिक के कहने पर लाल बोतल में काली बकरी का दूध दूहते देखे गए लेकिन उनका भी टोटका काम नहीं आया। वह दो जगह से खड़े थे, दोनों जगह से हार गए। नवजोत सिंह सिद्धू जनसभाओं में मंच पर बैठे हुए तंत्र मंत्र का जाप करते हुए और अपनी अंगूठियों वाले हाथ से तरह-तरह की हरकतें करते पाए गए लेकिन उनका भी मंत्र किसी काम नहीं आया वह भी हार गए।

पंजाब के लोगों ने एक नया राजनीतिक विकल्प तलाश लिया है। यह भविष्य ही बताएगा कि यह विकल्प उनकी उम्मीदों पर कितना खरा उतरता है। क्योंकि आम आदमी पार्टी के लिए यह सफर बहुत ही चुनौती भरा रहेगा।

अर्थशास्त्रियों के कहने के मुताबिक पंजाब के ऊपर 2.82 लाख करोड़ रुपए का क़र्ज़ है। इसको सरल भाषा में कहा जाए तो हर पंजाबी के सिर पर एक लाख रुपये का क़र्ज़ है। हर दूसरे दिन क़र्ज़ से परेशान कोई ना कोई किसान यहां आत्महत्या कर लेता है। पंजाब वासियों को इस कर्ज से मुक्ति कैसे मिलेगी इसका कोई ब्लूप्रिंट अभी तक किसी भी पार्टी के पास तैयार नहीं है।

केजरीवाल को भी जब तक पूछा गया है वह कह देते हैं कि सरकार के पास पैसे की कमी नहीं है नियत की कमी है। पंजाब में करीब 50000 करोड़ रुपए विभिन्न योजनाओं के लिए चाहिए जिनमें से करीब 33000 करोड़ रुपए नयी योजनाओं के कारण पड़ने वाले बोझ के हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2020-21 में सरकार को कुल 68995 करोड़ रुपए का राजस्व हासिल हुआ था। दिलचस्प बात यह है कि 50 हजार करोड़ की राशि इस राजस्व का करीब 72% बनती है। इसके अलावा सरकार का करीब 20% खर्चा ऋण के ब्याज देने में ही जा रहा है। इन दो मुद्दों पर ही कुल राजस्व का 92% हिस्सा खर्च हो रहा है तो ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि बाकी की राशि कैसे खर्च की जाएगी और कहां से आएगी?

आम आदमी पार्टी ने पंजाब वासियों को कम से कम 300 यूनिट बिजली प्रतिमाह मुफ़्त देने का वायदा किया है। 300 यूनिट बिजली मुफ़्त देने का मतलब है राज्य पर 7800 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ। पंजाब में 70.61 लाख बिजली के उपभोक्ता हैं जो हर महीने 1500 करोड़ के करीब यूनिट खर्च कर रहे हैं बदले में यह उपभोक्ता करीब 9500 करोड़ रुपए बिल के तौर पर चुका रहे हैं। सब्सिडी के तौर पर पंजाब सरकार 14500 करोड़ रुपया पहले ही वहन कर रही है। यह भी आप का चुनावी जुमला साबित न हो जाये इसके लिए पंजाब में बिजली का ही करीब 22000 करोड़ रूपया बोझ बन जाएगा।

पंजाब के चुनाव के दौरान 18 वर्ष के ऊपर की महिलाओं को ₹1100 प्रतिमाह देने का एक वायदा किया गया है। एक आंकड़े के अनुसार पंजाब में एक करोड़ के करीब 18 वर्ष के ऊपर की युवतियां व महिलाएं हैं। इससे सरकार पर करीब 11000 करोड़ रुपए का नया बोझ पड़ेगा। इस बोझ को कैसे वहन करना है इस पर अभी कोई क्या योजना है यह तो अरविंद केजरीवाल ही बता सकते हैं मुझे नहीं लगता कि भगवंत मान को भी इसके बारे में कोई खबर होगी।

बुढ़ापा पेंशन का 4600 करोड़ रुपया पंजाब में सरकार की तरफ से पंद्रह सौ प्रति माह बुढ़ापा पेंशन के तौर पर दिया जा रहा है। अब की चुनाव में आम आदमी पार्टी ने करीब 3100 प्रतिमाह देने का वायदा किया है। इस हिसाब से बुढ़ापा पेंशन बढ़ाने के बाद करीब 4600 करोड़ रुपए का बोझ पंजाब के खजाने पर पड़ेगा। कहाँ से आएगा पता नहीं। मुफ्त सिलेंडर, लैपटॉप और पक्के मकान जैसी सुविधाओं पर भी लगभग 20000 करोड़ रुपए का खर्चा आएगा। कहाँ से आयेगा पता नहीं।  

भाजपा के पास तो आसान रास्ता है, वह तो कह सकते हैं कि यह चुनावी जुमला था लेकिन अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान को ऐसा कहना बहुत भारी पड़ेगा क्योंकि यह बात सभी राजनीतिक दल जानते हैं और आम आदमी पार्टी भी कि किसान आंदोलन का जोश अभी ठंडा नहीं हुआ है।

(देवेंद्र पाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल लुधियाना में रहते हैं।)

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