Friday, December 2, 2022

अजय मिश्रा टेनी को झटका! हत्या का मामले की सुनवाई  लखनऊ पीठ में ही होगी, ट्रांसफर से सुप्रीम इंकार

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केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा उर्फ टेनी को सुप्रीम कोर्ट से जोर का झटका लगा। दरअसल टेनी ने हत्या के मामले में उनको बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ दायर सरकार की अपील को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ से इलाहाबाद पीठ में ट्रांसफर करने की दरख्वास्त की थी। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अपील को खारिज करते हुए ऐसा करने से साफ इन्कार कर दिया। 

हालांकि चीफ जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने हाईकोर्ट से कहा कि वो 10 नवंबर को अजय मिश्रा टेनी के मामले की सुनवाई करे। हाईकोर्ट ने इसी तिथि को टेनी की अपील पर सुनवाई के लिए तारीख दी थी। दोनों तरफ के सीनियर वकीलों ने इलाहाबाद पीठ के फैसले पर सहमति जताई थी। हत्या का मामला 22 साल पुराना है। इसमें वो बरी हो चुके हैं।

टेनी ने पहले हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की पीठ के समक्ष गुहार लगाई थी कि उनको बरी करने के फैसले के खिलाफ दायर सरकारी अपील को इलाहाबाद पीठ में ट्रांसफर किया जाए। वहां से राहत न मिलने पर वो सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। उनका तर्क था कि उनकी पैरवी कर रहे वकील की उम्र काफी ज्यादा है और एडवोकेट के लिए प्रयागराज से लखनऊ जाना दिक्कत भरा है।

इस संबंध में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि वरिष्ठ वकील (मिश्रा का प्रतिनिधित्व करते हुए) लखनऊ आने में असमर्थ हैं, तो उक्त वकील को वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से प्रस्तुत करने की अनुमति देने के अनुरोध पर उच्च न्यायालय द्वारा विचार किया जा सकता है ।

गौरतलब है कि यह मामला साल 2000 का है जब एक उभरते हुए छात्र नेता प्रभात गुप्ता की उनके घर के पास गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में केंद्रीय मंत्री टेनी समेत 3 लोगों को आरोपी बनाया गया था। 2004 में, उन्हें निचली अदालत ने बरी कर दिया था। उस आदेश को चुनौती देते हुए, यूपी सरकार ने वर्ष 2004 में उच्च न्यायालय का रुख किया। उच्च न्यायालय की एक समन्वय पीठ ने अंततः अपील पर सुनवाई की और 12 मार्च, 2018 को अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। हालांकि, शिकायतकर्ता/आवेदक द्वारा दायर आवेदन पर इसे जारी कर दिया गया क्योंकि निर्णय छह महीने से अधिक के बाद नहीं दिया गया था और मामले को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का आदेश दिया गया था। 

इसके बाद, चार साल बीत गए लेकिन मामले की सुनवाई नहीं हो सकी, इसलिए इस साल की शुरुआत में अंतिम सुनवाई के लिए अपील को जल्द से जल्द सूचीबद्ध करने के लिए एक आवेदन दायर किया गया था। 7 अप्रैल को मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि मामले को 16 मई, 2022 को अंतिम सुनवाई के लिए उपयुक्त बेंच के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए। खंडपीठ के आदेश के बावजूद, मामले में फैसला नहीं दिया जा सका और मामले को 17 अक्टूबर तक कम से कम 8 बार स्थगित कर दिया गया।

राजस्व पुलिस प्रणाली’ को खत्म करने का फैसला 

सुप्रीम कोर्ट ने ‘राजस्व पुलिस प्रणाली’ को समाप्त करने के उत्तराखंड हाईकोर्ट के निर्देश को चुनौती देने वाली उत्तराखंड राज्य सरकार की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका को बंद कर दिया है। कोर्ट ने देखा कि राज्य मंत्रिमंडल ने उच्च न्यायालय के निर्णय को स्वीकार करने और उक्त निर्देशों को लागू करने के लिए उचित कदम उठाने का निर्णय लिया है। राज्य के पहाड़ी भागों में, राजस्व विभाग के सिविल अधिकारियों के पास पुलिस की शक्तियां और कार्य हैं। इस प्रकार राजस्व अधिकारी अपराधियों की गिरफ्तारी और जांच जैसे पुलिस के कार्य कर सकते थे। 

एक हत्या के मामले में एक आपराधिक अपील पर विचार करते हुए, उच्च न्यायालय ने कहा कि इस प्रणाली के परिणामस्वरूप अवैज्ञानिक जांच हो रही है जिससे सही से न्याय नहीं हो पा रहा है। जस्टिस राजीव शर्मा और जस्टिस आलोक सिंह की खंडपीठ ने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में भी, जांच केवल विधिवत प्रशिक्षित पुलिस अधिकारियों द्वारा की जानी आवश्यक है, जो जांच की आधुनिक तकनीकों से अच्छी तरह वाकिफ हैं। राजस्व पुलिस द्वारा गंभीर अपराधों की जांच से कानून और व्यवस्था की समस्या उत्पन्न होती है। जांच केवल नियमित पुलिस द्वारा की जानी चाहिए। पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों को नियमित पुलिस द्वारा सुरक्षा और सेवा प्रदान करने की आवश्यकता है। राजस्व पुलिस अधिकारियों द्वारा अपराध का पता लगाना और सुरक्षा दयनीय है।

मामला सीजेआई यूयू ललित और जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी की पीठ के सामने आया, तो उप महाधिवक्ता जतिंदर कुमार सेठी ने कैबिनेट के फैसले के बारे में बयान को शामिल करते हुए एक नोट प्रस्तुत किया। इसे रिकॉर्ड करते हुए अदालत ने कानून के सभी सवालों को खुला छोड़ते हुए एसएलपी का निपटारा कर दिया।

गोरखपुर अस्पताल त्रासदी 2017 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस महीने की शुरुआत में 2017 में बीआरडी मेडिकल कॉलेज (गोरखपुर जिले में) में हुई 63 बच्चों की मौत की न्यायिक जांच की मांग करने वाली जनहित याचिका (पीआईएल) खारिज की। 

चीफ जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस जेजे मुनीर की खंडपीठ ने जनहित याचिका को राज्य के वकील द्वारा दिए गए बयान को ध्यान में रखते हुए खारिज कर दिया कि मामले की जांच की गई, रिपोर्ट प्रस्तुत की गई और दोषी डॉक्टरों और कर्मचारियों को दंडित किया गया। साथ ही सभी अस्पतालों में उचित सुधारात्मक उपाय किए गए। 

वर्ष 2017 में गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में कथित तौर पर ऑक्सीजन की कमी के कारण लगभग 63 बच्चों की मौत हो गई। हालांकि, उत्तर प्रदेश सरकार ने इस दावे का खंडन किया कि मौतें ऑक्सीजन सिलेंडर की कमी के कारण हुईं। नवंबर, 2018 में केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने लोकसभा में कहा कि ऐसा कोई संकेत नहीं है कि 63 बच्चों की मौत लापरवाही का परिणाम थी। उल्लेखनीय है कि इस त्रासदी के बाद बाल रोग विशेषज्ञ डॉ कफील खान को उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के तहत निलंबित कर दिया था। आखिरकार उन्हें नवंबर, 2021 में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम

हाल ही में मिलावटी पनीर बेचने के मामले में बंगाल की एक मिठाई की दुकान के मालिक की सजा को इस आधार पर खारिज कर दिया कि शिकायत और सबूत में मेल नहीं था कि क्या केवल अपरिहार्य प्राकृतिक कारणों के लिए निर्धारित मानकों या संरचना से विचलन को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954 के तहत मिलावट के लिए सजा दिलाने के लिए, लोक विश्लेषक, जिसकी राय अभियोजन का आधार बनी, को यह जांचना था कि क्या धारा 2 (आईए)(एम) के तहत ‘मिलावट’ की परिभाषा आकर्षित होगी। इस परंतु ने ‘प्राथमिक भोजन’ के लिए एक अपवाद का चित्रण किया, क्योंकि जहां उनकी गुणवत्ता या शुद्धता निर्धारित मानकों से कम हो गई थी या जहां उनके घटक “केवल प्राकृतिक कारणों से” परिवर्तनशीलता की निर्धारित सीमा से अधिक मात्रा में मौजूद थे। ऐसे फूड को मिलावटी नहीं माना जाएगा।

मिठाई की दुकान की अपील को स्वीकार करते हुए जस्टिस एस. अब्दुल नजीर और जस्टिस वी. रामसुब्रमण्यम की पीठ ने कहा कि पब्लिक एनालिस्ट की रिपोर्ट में इस तरह के सवालों पर विचार नहीं किया गया कि क्या पनीर में नमी की मात्रा प्राकृतिक कारणों से बढ़ गई है या क्या दूध की गुणवत्ता के परिणामस्वरूप दूध में वसा की मात्रा असंतोषजनक थी। यही कारण है कि दुकान के खिलाफ धारा 16(1)(ए)(i) के तहत शिकायत को बरकरार नहीं रखा जा सकता है।कोर्ट ने कहा कि शिकायत या सबूत में मेल नहीं है। 

पति को ‘शराबी’, ‘चरित्रहीन’ के रूप में लेबल करना क्रूरता है

बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में माना कि पत्नी अपने पति के खिलाफ अदालत में बेबुनियाद आरोप लगा रही है और उसे ‘शराबी’ और ‘चरित्रहीन’ करार दे रही है। जस्टिस नितिन जामदार और जस्टिस शर्मिला यू देशमुख की खंडपीठ ने अपीलकर्ता/पत्नी द्वारा दायर अपील खारिज कर दी, जिसमें उसके पति को तलाक की डिक्री देने के फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई। 

खंडपीठ ने कहा कि हम पाते हैं कि याचिकाकर्ता ने मुकदमेबाजी के दोनों दौरों में बार-बार प्रतिवादी के चरित्र की हत्या के आरोप लगाए। याचिकाकर्ता द्वारा प्रतिवादी के चरित्र से संबंधित अनुचित, झूठे और आधारहीन आरोप लगाने के लिए उसे शराबी के रूप में लेबल करना जारी रखा है, जिसने समाज में उसकी प्रतिष्ठा कम कर दी। 

ऐसी परिस्थितियों में और समाज में प्रतिवादी की स्थिति को देखते हुए प्रतिवादी का स्टैंड कि वह याचिकाकर्ता के ऐसे आचरण के साथ समाज में उसे बदनाम नहीं कर सकता, जहां वह सामाजिक कार्य कर रहा है। इस तरह के आरोपों के बावजूद वह वैवाहिक संबंध जारी नहीं रख सकता है, इसे अनुचित नहीं कहा जा सकता।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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