Tuesday, August 9, 2022

क्या वास्तव में भाजपा से खफा हैं यूपी के ब्राह्मण ?

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हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, विकास, सामाजिक न्याय और धर्म निरपेक्षता जैसे भारी भरकम और आसमानी मुद्दों के नीचे उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति एक बार फिर से जातियों की हकीकत पर आकर खड़ी हो गई है। इसलिए यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या उत्तर प्रदेश में 12 से 15 प्रतिशत आबादी वाली ब्राह्मण बिरादरी योगी आदित्यनाथ के पांच साल के शासन से खफा है, या फिर वह देश-प्रदेश की बदलती स्थितियों में अपने सम्मान और भविष्य को लेकर राह भटक गई है ? क्या वह केंद्रीय गृह मंत्री अजय मिश्रा टेनी को लखीमपुर जैसे कांड के बावजूद केंद्रीय मंत्रिमंडल में बनाए रखने और जितिन प्रसाद को कांग्रेस से तोड़कर राज्य में मंत्री बनाए जाने जैसे प्रतीकात्मक कदमों से संतुष्ट रहने वाला है, या उसे अपने वास्तविक मुद्दे बगावत करने के लिए बाध्य करेंगे?  क्या ब्राह्मण 2014, 2017 और 2019 की तरह भारतीय जनता पार्टी को जिताने के लिए अधिकतम यानी एकमुश्त वोट मोदी और कमल को देने जा रहा है या फिर उसका मत बिखराव का शिकार होगा ?

“ब्राह्मण भाजपा के विरोध में हैं। योगी सरकार पर 500 ब्राह्मणों के कत्ल का आरोप है। इसलिए पूरे अवध और पूर्वांचल में लोग कह रहे हैं कि अगर इस बार भाजपा को समर्थन दिया तो भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। मामला सिर्फ कानपुर के बिकरू वाले विकास दुबे का ही नहीं है। ऐसे बहुत सारे मामले हैं और उसके कारण प्रदेश के ब्राह्मणों में भारी गुस्सा है मौजूदा सरकार के प्रति। इस बार के चुनाव में ठाकुर बनाम ब्राह्मणों की प्रतिस्पर्धा जबरदस्त है। लेकिन ऐसा कहना ज्यादा ठीक होगा कि ब्राह्मण वोट बिखर रहा है। वह छितरा रहा है। उसने कुछ जगह पर भाजपा के ब्राह्मण उम्मीदवारों को वोट दिया है। लेकिन जहां दूसरी पार्टी के ब्राह्मण उम्मीदवार हैं वहां पर ब्राह्मण उसी को वोट दे रहे हैं। जैसे कि गोरखपुर में भाजपा के सिर्फ शलभमणि त्रिपाठी को ब्राह्मणों ने वोट देने का मन बनाया है लेकिन बाकी भाजपा के उम्मीदवारों के प्रति ज्यादा आकर्षित नहीं हैं। ऐसे ही दरियाबाद में भले ही मौजूदा विधायक ब्राह्मण हैं लेकिन दूसरे ब्राह्मण उम्मीदवार रामजी तिवारी भी हैं, और लगता है बिरादरी रामजी को वोट देगी।’’ यह कहना है इतिहासकार, फिल्म पटकथा लेखक और वामपंथी राजनीति से निकले क्रांतिकारी किसान पार्टी के अध्यक्ष अमरेश मिश्र का। वे मंगल पांडे सेना नामक संगठन भी चलाते हैं और उसके माध्यम से प्रदेश के ब्राह्मणों को एकजुट करते हैं।

हालांकि ब्राह्मणों को रिझाने में सभी पार्टियां बढ़चढ़ कर काम कर रही हैं और अपनी अपनी व्यावहारिक स्थितियों के अनुरूप सभी ने टिकट भी दिए हैं। भारतीय जनता पार्टी ने सबसे ज्यादा यानी 68 टिकट ब्राह्मणों को दिए हैं। जबकि ठाकुरों यानी राजपूतों को 71 टिकट दिए गये हैं। बात यहीं फंस गई। क्योंकि राज्य में राजपूतों की आबादी 7 से 8 प्रतिशत है और उन्हें इतनी बड़ी संख्या में टिकट दिया गया है। इससे टिकट वितरण में योगी का दबाव चलता हुआ दिखता है। इसके अलावा समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस सभी ने 50 से ज्यादा टिकट ब्राह्मणों को दिए हैं। हालांकि बाकी दो चरणों के टिकटों में परिवर्तन हो सकता है  और यह संख्या घट बढ़ सकती है। वैसे तो प्रदेश के 28 जिलों में सवर्णों की आबादी 25 प्रतिशत से ऊपर है लेकिन ब्राह्मण 115 सीटों पर असर रखते हैं। प्रदेश में अब तक छह ब्राह्मण मुख्यमंत्री हो चुके हैं और चार राजपूत मुख्यमंत्री रहे हैं। जहां तक आर्थिक संपन्नता का मामला है तो प्रदेश की 50 प्रतिशत जमीनों पर राजपूतों का कब्जा है। 47 प्रतिशत राजपूत प्रदेश के 20 प्रतिशत संपन्न तबके में शामिल हैं।

ऐसे में सवाल यह है कि सवर्णों के साथ एकजुट होकर भाजपा को मतदान करने वाले ब्राह्मण अब भाजपा से खफा क्यों हैं? आखिर ब्राह्मण चाहता क्या है? क्या वह परशुराम की बड़ी मूर्ति लगा दिए जाने से संतुष्ट हो जाएगा। या अयोध्या में भगवान राम का मंदिर बना दिया जाना उसका अभीष्ट है? समाजवादी पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष और अयोध्या से दो बार विधायक रह चुके जयशंकर पांडेय कहते हैं, “पूर्वांचल का ब्राह्मण सम्मान चाहता है। गरीबी की रेखा से नीचे रह कर ब्राह्मणों का पेट नहीं भरेगा। ब्राह्मणों के लड़के बेरोजगार हैं। जो ब्राह्मण कभी जमींदार थे उनकी संतानें आज रिक्शा चला रही हैं। मैं गोंडा के कई ब्राह्मणों को जानता हूं जो फैजाबाद में रिक्शा चलाते हैं। यह काम वे अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए कर रहे हैं। वह अपनी बात खुलकर कह नहीं पाता। मुलायम सिंह यादव ने विशिष्ट बीटीसी योजना के तहत तमाम ऐसे सवर्ण युवाओं को रोजगार दिया जो पीएचडी होते हुए भी बेरोजगार थे। शिक्षामित्र के नाम पर युवाओं को ठगा गया। मोदी योगी के लिए हिंदू और हिंदुत्व राष्ट्रवाद की मशीन है।’’

राम के नाम पर राजनीति करने वाली भाजपा के लिए जयशंकर पांडेय कहते हैं, “भाजपा के लोग वोट के लिए किसी स्तर तक जा सकते हैं। प्रभु राम में किसकी आस्था नहीं है। लेकिन इन्होंने राम का राजनीतिकरण किया है। राम के विराट स्वरूप पर धब्बा लगाया है। राम मंदिर का निर्माण सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हो रहा है। वह तो होगा ही।’’

ब्राह्मणों की नाराजगी पर सर्वेक्षण करने वाले ऋषिकेश के पत्रकार अनिल शर्मा कहते हैं, “कभी ब्राह्मणों का नेता पिछड़ी जाति के नेता को बना दिया जाता है, तो कभी विकास दुबे को। समूची राजनीतिक व्यवस्था ने ब्राह्मणों के प्रति द्वेष दिखाया है। ब्राह्मणों ने देश की एकता अखंडता के लिए बड़ी कुर्बानियां दी हैं। लेकिन सामाजिक न्याय और अधिकारिता की परिभाषा से ब्राह्मण आहत हैं। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को जो आरक्षण दिया गया है उससे ब्राह्मणों को लाभ नहीं हुआ है। ब्राह्मणों के प्रति जो अन्याय है उसे किसी ने रोका नहीं है। भाजपा से ब्राह्मण नाराज हैं। भाजपा आठ प्रतिशत ठाकुरों को 15 प्रतिशत ब्राह्मणों पर थोपना चाहती है। फिर ब्राह्मण अपराधियों से भेदभाव क्यों?  अगर विकास दुबे के साथ कड़ाई होती है तो लखीमपुर में गाड़ी चढ़ाने वालों के साथ नरमी क्यों?  इस बार ब्राह्मण खामोशी से भाजपा को सबक सिखाएगा।’’

ब्राह्मणों को क्या चाहिए, वह अपनी नाराजगी किस तरह व्यक्त करेगा?  इस पर उत्तर प्रदेश के चुनावी राजनीति और जातिगत आंकड़ों पर ‘आंकड़ों की सत्ता—उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022’ जैसी नई किताब लिखने वाले  लखनऊ के राजेंद्र द्विवेदी कहते हैं,  “ब्राह्मण को शिक्षा चाहिए और रोजगार चाहिए। राज्य में कोई रोजगार है नहीं। आबादी के कारण खेती बची नहीं है। वे मनरेगा में काम कर नहीं सकते। वे सम्मान बचाने के लिए लुधियाना में जाकर रिक्शा चलाते हैं। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती। पब्लिक स्कूल में फीस बहुत लगती है। ब्राह्मणों के लिए कोई कोचिंग है नहीं। बेरोजगारी और कुंठा में वे नशे की ओर जा रहे हैं, अपराध की ओर जाते हैं। राजनीतिक दल यही चाहते भी हैं। इससे उन्हें कार्यकर्ताओं की फौज मिलती है।’’

भाजपा के प्रति नाराजगी को वे भी स्वीकार करते हैं। लेकिन ब्राह्मण एकदम नाराज है और वह उसे छोड़ देगा, ऐसा वे नहीं मानते  “भाजपा से ब्राह्मण नाराज है लेकिन किसी पार्टी से खुश नहीं है। जहां ब्राह्मण उम्मीदवार ताकतवर है वह उसे वोट दे रहा है। अगर नहीं है तो भाजपा को वोट दे रहा है। जो अनपढ़ है वह भाजपा के पीछे घूम रहा है। जो पढ़ा-लिखा है वह भाजपा के खिलाफ है। ’’

पूर्वांचल के ब्राह्मणों पर निगाह रखने वाले और वर्धा विश्वविद्यालय के पूर्व प्रति-कुलपति और गोरखपुर विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर चितरंजन मिश्र का मानना है कि ब्राह्मण बिखराव का शिकार है। ब्राह्मण राजनीति में अपनी उपेक्षा से दुखी है। वह दो तरह के मानस में है। एक ओर वह उपेक्षा के कारण क्षोभ से भर गया है। तो दूसरी ओर धार्मिक उन्माद का शिकार है। दुखद यह है कि इतना प्रबुद्ध समझा जाने वाला समुदाय राजनीतिक रूप से भटक गया है। वे मानते हैं कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के शीर्ष पदों पर जो चितपावन ब्राह्मण हैं उनके भीतर एक तरह की मराठी अस्मिता भी है, जो उत्तर भारत के ब्राह्मणों में नहीं है। सही है कि ब्राह्मण भाजपा से नाराज है लेकिन वह नाराजगी व्यक्तिगत रूप से है, जातिगत रूप से नहीं है।

लेकिन बस्ती कांग्रेस कमेटी के सचिव देवी प्रसाद पांडेय कहते हैं, “ब्राह्मण एकदम नाराज है। उसे सताया गया है। इसलिए बस्ती जिले में बदलाव की आंधी चल रही है। जब कांग्रेस की सरकार थी तो कर्मचारियों को पेंशन मिलती थी, उसे एनडीए ने खत्म कर दिया। सरकारी क्षेत्र का निजीकरण कर दिया, नौकरियां खत्म हो रही हैं। वह नौकरी चाहता है। उसे न तो संविधान से शिकायत है और न ही वह हिंदू राष्ट्र के लिए लालायित है। वैसे इस देश में हिंदू तो बहुतायत हैं ही अगर नाम बदल दिया जाए तो क्या फर्क पड़ेगा। योगी जी ने तमाम नाम बदले उससे क्या हो गया?’’

बस्ती जिला कांग्रेस कमेटी के पूर्व महासचिव घनश्याम शुक्ल कहते हैं, “2017 के चुनाव में ब्राह्मणों को भाजपा से बड़ी उम्मीद थी इसलिए अच्छी तादाद में उसे वोट दिया था। उसे लगता था कि सम्मान मिलेगा, हर जगह तवज्जो दी जाएगी। लेकिन वैसा हुआ नहीं। ब्राह्मण नौकरी चाहता है। वह धंधा-व्यापार करने से कतराता है। इस बीच एनडीए सरकार ने जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए दस प्रतिशत आरक्षण दिया उसका भी लाभ नहीं मिला। वजह यह रही कि हर विभाग में दस-दस हजार पद खाली हैं लेकिन जब रिक्तियां निकलती थीं तो या तो परीक्षा रद्द हो जाती थी या परचा आउट हो जाता था। इस तरह से तमाम युवाओं की पांच साल में उम्र निकल गई। सरकार ने थोथा आश्वासन दिया लेकिन लोगों की उम्मीद पूरी नहीं हुई। ’’

बस्ती जिले के हर्रैया विधानसभा क्षेत्र के निवासी रामशंकर पांडेय बिजली विभाग में संविदा की नौकरी करते हैं। यह एक किस्म का अर्द्ध-रोजगार है। वे अपनी लंबी बेरोजगारी से आजिज आ चुके हैं। इसलिए वे इस बार भाजपा का साथ छोड़ किसी और पार्टी का दामन थामना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि जो युवा नेतृत्व नौकरियां देगा उसे ही चुना जाना चाहिए। वे छुट्टा जानवरों से भी तंग आ चुके हैं।

गोंडा जिले की गौरा चौकी क्षेत्र के किसान त्रिगुगी नारायण मिश्र सांड़ों और बहेतू जानवरों से तंग आ चुके हैं। वे बाड़ लगाते हैं और सांड़ उसे कूद कर खेत में पहुंच जाते हैं। उनका पांच बीघा गन्ना सांड़ चर चुके हैं। उनकी हार्दिक इच्छा इस बार भाजपा को सबक सिखाने की है। हालांकि उनके क्षेत्र में समाजवादी पार्टी ने कमजोर उम्मीदवार खड़ा किया है। लेकिन वे भाजपा को हराने के लिए वोट करेंगे।

ब्राह्मणों की 15 प्रतिशत आबादी वाले गौतमबुद्ध नगर जनपद यानी नोएडा के पत्रकार विनोद शर्मा का कहना है कि पूरे एनसीआर से सभी जातियों का राज्य या केंद्र सरकार में प्रतिनिधित्व है लेकिन ब्राह्मण नदारद हैं। एक महेश शर्मा थे पिछले कार्यकाल में मंत्री, लेकिन इस बार वे भी बाहर हैं। वे लक्ष्मी कांत वाजपेयी की छह साल से चल रही उपेक्षा से नाराज हैं। उनका यह भी कहना है कि मोदी सरकार ब्राह्मणों के प्रतिनिधित्व के नाम पर गुमराह करती रही है। गुजरात से एके शर्मा को ब्राह्मण प्रतिनिधि बताकर लखनऊ में बिठाया गया, लेकिन उन्हें किनारे लगा दिया गया। हालांकि वे भूमिहार बिरादरी के निकले। दिनेश शर्मा भले उपमुख्यमंत्री रहे लेकिन उनकी योगी के आगे कोई हैसियत नहीं रही। वे मानते हैं कि भाजपा ने ब्राह्मणों की नाराजगी पर विचार करने के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री शिव प्रताप शुक्ला के नेतृत्व में कमेटी बनाई थी। लेकिन उसका कोई असर दिखा नहीं।

सवाल यह है कि ब्राह्मण अपने वर्चस्व को कायम रखने की अनुचित लड़ाई को किस हद तक ले जा पाता है और दूसरी ओर अपनी रोजी-रोटी और समाज को बदलने व लोकतंत्र बचाने की वाजिब लड़ाई को कितनी दूर खींचता है। क्योंकि दोनों मिली-जुली भले दिखती हों लेकिन उनका महत्व और परिणाम अलग-अलग है। यह सही है कि ब्राह्मण नाराज है लेकिन वह वर्ण व्यवस्था के कमजोर पड़ने से नाराज है, अन्य जातियों को सम्मान और सामाजिक न्याय मिलने से नाराज है या फिर देश के एक नागरिक के रूप व्यक्ति की घटती हुई गरिमा से परेशान है?  इस सवाल पर उसे विचार करना होगा। शायद ही कोई पार्टी सिर्फ ब्राह्मणों को महत्व देकर राजनीति में सफल हो सकती है और सत्ता पा सकती है। वैसा होना भी नहीं चाहिए। इसलिए ब्राह्मण अपनी अनुचित महत्वाकांक्षा को आगे रखकर लंबे समय तक सौदेबाजी नहीं कर सकता। सामाजिक बदलाव समय की सच्चाई है इसलिए किसी भी जाति की लड़ाई तभी सार्थक कही जाएगी जब उससे सामाजिक, आर्थिक समता की लड़ाई आगे बढ़े।  

(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)  

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