Monday, August 15, 2022

यूपी: छोटे दलों के सहारे अति पिछड़ा, गैरजाटव और सवर्ण वर्ग के कॉकटेल से भाजपा तैयार करेगी सत्ता का जाम

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परसों एक अधेड़वय पटेल मित्र से पूछा अबकी किसे वोट दे रहे, और उन्होंने बिना एक भी क्षण का समय लिये तपाक से कहा- “भाजपा को”। मुझे बिल्कुल भी अचरज़ नहीं हुआ कि उन्होंने ‘अपना दल’ क्यों नहीं कहा। भाजपा का यही चरित्र है। जिसको अपना सहारा बनाती है उसका अस्तित्व ही खत्म कर देती है। ‘अपना दल’ का पूरा का पूरा कुर्मी वोट बैंक भाजपाई हो चुका है। बीजेपी ने यूपी में पार्टी की कमान कुर्मी समुदाय से आने वाले स्वतंत्र देव को दे रखा है तो सहयोगी के तौर पर कुर्मी समाज से आने वाली अनुप्रिया पटेल के अपना दल (एस) के साथ गठबंधन कर रखा है।

भारतीय जनता पार्टी ने 2017 विधान सभा चुनाव में अपना दल (एस) और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के साथ गठबंधन किया था। और इसका फायदा भाजपा को प्रदेश में 7.5 प्रतिशत पटेल और लगभग 3 प्रतिशत राजभर वोटबैंक के रूप में मिला था। उत्‍तर प्रदेश में पिछड़े वर्ग में प्रभावी कुर्मी समाज से आने वाली सांसद अनुप्रिया पटेल इस दल की अध्‍यक्ष हैं। जबकि अति पिछड़े राजभर समाज के नेता ओमप्रकाश राजभर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का नेतृत्‍व करते हैं।

आगामी विधानसभा चुनाव में तमाम राजनीतिक दलों की तैयारियों की बात करें तो सत्ताधारी भाजपा सबसे आगे नज़र आती है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी राष्ट्रीय लोकदल जैसे प्रमुख दल जहाँ ‘एकला चलो’ का राग अलापे हुये हैं वहीं भाजपा तमाम छोटी पार्टियों को अपने साथ जोड़ने की डील में जुटी हुयी है। जुलाई महीने में अपना दल नेता अनुप्रिया पटेल को केंद्रीय मंत्री बनाने के साथ इसकी शुरुआत कर चुकी है।

जबकि पिछले सप्ताह 7 सितंबर को निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद ने केंद्रीय गृहमंत्री भाजपा अध्यक्ष नड्डा से मुलाकात कर 2022 का विधानसभा चुनाव साथ लड़ने का ऐलान किया है। निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. संजय निषाद ने दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा तथा भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) बीएल संतोष से मुलाकात में राज्य की निषाद बाहुल्य 160 विधानसभा सीटों की सूची सौंपी थी। इस सूची के साथ 70 सीटों की एक अन्य सूची भी दी है, जिन्हें निषाद पार्टी अपनी मजबूत सीटें मानती है। इन सीटों पर पार्टी का संगठन सक्रिय होकर काम कर रहा है। डा. संजय निषाद ने बताया है कि भाजपा नेतृत्व द्वारा निषाद बाहुल्य सीटों की सूची मांगी गई थी।

इससे पहले 3 अगस्त को सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने भाजपा यूपी अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह से मुलाकात करके गठबंधन के लिये 5 शर्तें रखी थी। और पूरी संभावना है वो चुनाव से पहले एक बार फिर एनडीए का हिस्सा हो जायेंगे। बता दें कि प्रदेश में राजभर जातियां अति पिछड़ा वर्ग में आती हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में दबदबा रखने वाली पिछड़ी जातियों में राजभर समाज की आबादी क़रीब चार फीसद है।

वहीं 403 विधानसभा सीटों में सौ से अधिक सीटों पर राजभर समाज का ठीक-ठाक वोट है। खासतौर से पूर्वांचल के वाराणसी, जौनपुर, चंदौली, गाजीपुर, आजमगढ़, देवरिया, बलिया, मऊ जिलों की सीटों पर 18-20 % राजभर समुदाय का वोट है। जबकि अयोध्या, अंबेडकरनगर, गोरखपुर, संतकबीरनगर, महराजगंज, कुशीनगर, बस्ती, बहराइच, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर और श्रावस्ती में भी 10% तक राजभर समाज के वोटर हैं।

यही कारण है कि किसी भी कीमत पर भाजपा ओम प्रकाश राजभर को अपने साथ लाना चाहती है। इसके लिए वे लगातार बारगेनिंग भी कर रही है। जबकि भाजपा गठबंधन से अलग होने के बाद ओमप्रकाश राजभर बिहार के विधानसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा की राष्‍ट्रीय लोक समता पार्टी के गठबंधन में शामिल हुए थे। जिसमें बहुजन समाज पार्टी भी शामिल थी। ओमप्रकाश राजभर ने ‘संकल्‍प मोर्चा’ बनाया है जिसमें दर्जन भर से ज्‍यादा दल शामिल हैं। राजभर के मुताबिक पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा की जनाधिकार पार्टी, कृष्‍णा पटेल की अपना दल कमेरावादी, बाबू राम पाल की राष्‍ट्र उदय पार्टी, राम करन कश्‍यप की वंचित समाज पार्टी, राम सागर बिंद की भारत माता पार्टी और अनिल चौहान की जनता क्रांति पार्टी जैसे दलों को लेकर एक मजबूत मोर्चा तैयार किया गया है। भागीदारी संकल्‍प मोर्चा के संयोजक राजभर का दावा है कि ‘हमारे मोर्चे का विकल्‍प खुला है। हम जिसके साथ जाएंगे उत्‍तर प्रदेश में उसी की सरकार बनेगी। हमने अभी सपा-बसपा से बातचीत का कोई प्रयास नहीं किया है’।

इनके अलावा यूपी में बीजेपी को समर्थन देने वाले दलों में एकलव्य समाज पार्टी के अध्यक्ष जेआर निषाद, भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष नारायण राजभर, नवभारत समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष कुलदीप सिंह यादव, अहिंसा पार्टी के अध्यक्ष राजकुमार लोधी राजपूत व एक्शन पार्टी के अध्यक्ष रवीन्द्र कुमार मिश्र शामिल हैं। इन दलों ने लोकसभा चुनावों में पीएम मोदी को अपना समर्थन दिया था।

बता दें कि उत्तर प्रदेश में कुर्मी मतदाता 7.5%, लोध मतदाता 4.9%, गड़रिया/पाल 4.4%, निषाद/मल्लाह 4.3%, तेली/शाहू 4%, जाट 3.6%, कुम्हार/प्रजापति 3.4%, कहार/कश्यप 3.3%, कुशवाहा/शाक्य 3.2%, नाई 3%, राजभर 2.4%, गुर्जर मतदाता 2.12% हैं।

अन्य पिछड़ा वर्ग की छोटी पार्टियों से गठबंधन के अलावा भाजपा ने दूसरे दलों से अन्य पिछड़ा वर्ग के कई नेताओं का आयात भी किया है। बसपा के महत्वपूर्ण नेता रहे स्वामी प्रसाद मौर्या ऐन चुनाव से पहले 2017 में भाजपा में शामिल हो गये थे। मौर्य और कुशवाहा मतदाताओं पर उनकी अच्छी पकड़ है। और वो योगी सरकार में श्रम व सेवायोजन मंत्री हैं। समाजवादी पार्टी में अहम स्थान रखने वाले नरेश अग्रवाल ने भाजपा का दामन थाम लिया था। अग्रवाल मतदाताओं में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। इसी तरह 9 जून 2021 को कांग्रेस से ब्राह्मण चेहरा जितिन प्रसाद को भाजपा ने अपने पाले में लाकर बड़ा तीर मारने का दावा किया था। हालांकि भाजपा में ब्राह्मण नेताओं की कमी नहीं है। उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा, मंत्री महेंद्र नाथ पांडे, श्रीकांत शर्मा, ब्रजेश पाठक और रीता बहुगुणा जोशी ब्राह्मण समुदाय से हैं और इन्हें अहम जिम्मेदारियां मिली हुई हैं। इनके अलावा राम नरेश अग्निहोत्री, नीलकंठ तिवारी, सतीश चंद्र द्विवेदी, चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय और आनंद स्वरूप शुक्ला योगी कैबिनेट में मंत्री हैं। राज्य में भाजपा के 50 से ज्यादा विधायक इसी समुदाय से हैं।

चुनाव पूर्व सत्ता में भागीदारी देकर जाति विशेष के मतदाताओं को लुभाने की कोशिश ठीक चुनाव से पहले सत्ता में भागीदारी (मंत्रिमंडल में जगह) देकर जाति विशेष के मतदाताओं को लुभाने का नया चलन शुरू हुआ है। पिछले महीने केंद्रीय मंत्रिमंडल में ‘अपना दल’ अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल को मोदी सरकार ने जगह देकर आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कुर्मी समुदाय के 7.5% मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की है। इसी तरह की राजनीतिक चाल राज्य की योगी सरकार भी कर सकती है। चर्चा है कि जल्द ही योगी सरकार अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करके जितिन प्रसाद (ब्राहम्ण चेहरा), संजय निषाद (निषाद समुदाय), संगीता बलवंत विंद (निषाद समुदाय), सोमेंद्र गुर्जर (गुर्जर समुदाय), तेजपाल नागर (गुर्जर समुदाय), एमपी सेंथवार (पटेल समाज), आशीष पटेल (पटेल समाज), संजय गोंड (गोंड समुदाय), राहुल कौल (अनुसूचित जनजाति), मंजू सिवाच (जाट समुदाय), सहेंद्र रमाला (जाट समुदाय) के नाम प्रमुख हैं।

बता दें कि फिलहाल योगी मंत्रिमंडल में 23 कैबिनेट मंत्री, 9 स्वतंत्र प्रभार मंत्री और 22 राज्यमंत्री समेत कुल मंत्रियों की संख्या कुल 54 है। नियमों के मुताबिक, अभी 6 मंत्री पद खाली हैं।

हाल में भाजपा की सफलता में उसके ट्रेडिशनल वोट बैंक के साथ ओबीसी वोटरों का जुड़ना काफी फायदेमंद साबित हुआ है। भाजपा धीरे-धीरे इस वोट बैंक को अपने पाले में खींच रही है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में समुदाय के 27 मंत्रियों को शामिल करना भी उसके इसी मास्‍टर प्‍लान का हिस्‍सा है। भाजपा ने 2 सितंबर से आउटरीच कार्यक्रम शुरू किया है। इसकी कमान बीजेपी ओबीसी मोर्चा को दी गई है।

बसपा के ब्राह्मण सम्मेलन ने बढ़ाई टेंशन, सभी 403 विधानसभाओं में भाजपा का प्रबुद्ध सम्मेलन यूँ तो पूरा सवर्ण (ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया) समुदाय ही भाजपा का कोर वोटर रहा है। लेकिन उत्तर प्रदेश में ठाकुर जाति के योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद सूबे में ठाकुर बनाम ब्राह्मण का नया नैरेटिव तैयार हुआ है। बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी द्वारा प्रबुद्धजन (ब्राह्मण) सम्मेलन कराने के बाद भाजपा का टेंशन और बढ़ गया है। 12 प्रतिशत ब्राह्मण मतदाता उसे हाथ से फिसलता दिख रहा है।

यही कारण है कि भाजपा प्रदेश में 5-20 सितंबर तक सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में प्रबुद्ध (ब्राह्मण) वर्ग सम्मेलन कर रही है। सुब्रत पाठक को प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन अभियान का प्रभारी बनाया गया है। 5 सितंबर को एक साथ 17 महानगरों में प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन आयोजित किया गया। जिसमें राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र और केंद्रीय मंत्री महेंद्र नाथ पांडेय, अजय मिश्र टेनी समेत बीजेपी के अन्य नेता रविवार को लखनऊ में ब्राह्मण सम्मेलन कार्यक्रम शामिल हुये। खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वाराणसी के प्रबुद्ध सम्मेलन में शामिल हुये जबकि डिप्टी सीएम केशव मौर्या कानपुर के प्रबुद्ध सम्मेलन में शामिल रहे।

बता दें कि उत्तर प्रदेश में क़रीब 23 प्रतिशत सवर्ण मतदाता हैं जिसमें 12% ब्राह्मण, 7% क्षत्रिय, 2.25% कायस्थ और अन्य अगड़ी जातियां 2.75 % हैं।

AIMIM व चंद्रशेखर आजाद के आने से भाजपा को होगा फायदा

उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव मौर्या के इस्तीफे के बाद खाली हुयी फूलपुर संसदीय सीट पर हुये उपचुनाव में सपा प्रत्यासी का वोट काटने के लिये भाजपा ने बाहुबली अतीक अहमद को निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर उतारा था। हालांकि इसके बावजूद सपा प्रत्याशी नागेंद्र सिंह ने भाजपा प्रत्याशी कौशलेंद्र पटेल को 59,513 मतों से हरा दिया था। दरअसल, भाजपा का फोकस अपने प्रत्याशी को जिताने के साथ ही मुख्य विपक्षी प्रत्याशी का वोट काटने पर भी रहती है। बिहार और असम में अपनी सरकार के ख़िलाफ़ घोर असंतोष के बावजूद भाजपा इसी फॉर्मूले के बूते सत्ता में वापस लौटी। बिहार में चिराग पासवान की लोक जन शक्ति पार्टी, पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी ने वोट कटवा की भूमिका निभाई। जिससे महागठबंधन को हार का मुंह देखना पड़ा। वहीं असम में ये काम अखिल गोगोई की ‘रायजर पार्टी’ ने किया।

बिहार विधानसभा परिणामों से उत्साहित असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्‍तेहादुल मुसलमीन ने भी उत्‍तर प्रदेश में एक अलग गठबंधन बननाकर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। AIMIM ने साल 2017 में 38 उम्‍मीदवार उतारे थे लेकिन उन्‍हें एक भी सीट पर कामयाबी नहीं मिली। ओवैसी के एआईएमआईएम के अलग चुनाव लड़ने से बिहार की ही तरह यूपी में भी भाजपा को प्रत्यक्ष फायदा होगा।

वहीं इस बार पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश के उभरते दलित नेता चंद्रशेखर आजाद ने अपनी भीम आर्मी के राजनीतिक फ्रंट आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के बैनर तले चुनावी ताल ठोकी है। अगर वो अकेले चुनावी मैदान में उतरते हैं तो दलित वोटों के बँटने से भाजपा को फायदा होगा।

(इलाहाबाद से जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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