Sunday, December 4, 2022

बॉम्बे HC ने माओवादी लिंक मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा को बरी किया

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दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा को बॉम्बे हाईकोर्ट ने माओवादियों से कनेक्शन रखने के कथित आरोपों से बरी कर दिया है । दोषसिद्धि और आजीवन कारावास के खिलाफ दायर उनकी याचिका स्वीकार करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने आज ये फैसला सुनाया है। जस्टिस रोहित देव और जस्टिस अनिल पानसरे की खंडपीठ ने उन्हें तत्काल रिहा करने का भी आदेश दिया है। शारीरिक रूप से 90 फीसदी दिव्यांग साईबाबा इस समय नागपुर जेल में आजीवन कैद की सजा काट रहे हैं ।

बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने शुक्रवार को दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा को कथित माओवादी लिंक मामले में बरी कर दिया और दोषसिद्धि और उम्रकैद के खिलाफ उनकी अपील को स्वीकार कर लिया। हाईकोर्ट ने उन्हें तुरंत जेल से रिहा करने का भी आदेश दिया। साईबाबा और अन्य को कड़े गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के विभिन्न प्रावधानों के तहत अदालत ने उन्‍हें दोषी करार दिया था।

जस्टिस रोहित देव और जस्टिस अनिल पानसरे की खंडपीठ ने साईबाबा द्वारा दाखिल उस अपील को स्वीकार कर लिया जिसमें उन्होंने निचली अदालत के 2017 के आदेश को चुनौती दी थी जिसने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

खंडपीठ ने मामले में पांच अन्य दोषियों की अपील को भी स्वीकार कर लिया और उन्हें बरी कर दिया। पांच में से एक की अपील की सुनवाई लंबित रहने तक मृत्यु हो गई। पीठ ने निर्देश दिया कि दोषियों को तत्काल जेल से रिहा किया जाए जब तक कि वे किसी अन्य मामले में आरोपी न हों।

उचित रूप से, बरी करना इस तथ्य पर आधारित है कि सत्र न्यायालय ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम की धारा 45 (1) के तहत केंद्र सरकार से मंजूरी के अभाव में साईबाबा के खिलाफ आरोप तय किए थे। खंडपीठ ने दर्ज किया कि आतंकवाद राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक अशुभ खतरा है और शस्त्रागार में हर वैध हथियार को इसके खिलाफ तैनात किया जाना चाहिए, एक नागरिक लोकतंत्र आरोपी को दिए गए प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का त्याग नहीं कर सकता है।

फैसले में कहा गया है उचित रूप से, बरी करना इस तथ्य पर आधारित था कि सत्र न्यायालय ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम की धारा 45 (1) के तहत केंद्र सरकार से मंजूरी के अभाव में साईबाबा के खिलाफ आरोप तय किए थे।

फैसले में कहा गया है कि हम यह मानने के इच्छुक हैं कि अभियुक्तों को कानूनी रूप से प्रदान किया गया हर सुरक्षा, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, उत्साहपूर्वक संरक्षित किया जाना चाहिए। इस तरह के सुरक्षा उपायों का कोई भी विचलन केवल प्रतिकूल होगा, अदालत ने आगे कहा, कानून की उचित प्रक्रिया से प्रस्थान एक पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देता है जिसमें आतंकवाद बढ़ता है।

अदालत ने अभियोजन पक्ष के अनुरोध पर ध्यान दिया कि यदि अपील का निर्णय गुणदोष के आधार पर नहीं किया गया था, और केवल मंजूरी के बिंदु पर, उन्हें उचित मंजूरी प्राप्त करने और अभियुक्त पर मुकदमा चलाने की स्वतंत्रता दी जा सकती है।

खंडपीठ ने कहा कि कानून की अच्छी तरह से स्थापित स्थिति के मद्देनजर, कि दोहरे खतरे के खिलाफ नियम का कोई आवेदन नहीं है यदि परीक्षण अमान्यता या मंजूरी के अभाव के कारण खराब हो जाता है, तो हमें उक्त सबमिशन पर और विस्तार करने का कोई कारण नहीं दिखता है। हम यह मानने के इच्छुक हैं कि अभियुक्तों को कानूनी रूप से प्रदान किया गया हर सुरक्षा, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, उत्साहपूर्वक संरक्षित किया जाना चाहिए।

साल 2017 में  महाराष्ट्र की गढ़चिरौली की अदालत ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ साईबाबा ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था ।शारीरिक रूप से 90 फीसदी दिव्यांग साईबाबा को 2014 में नक्सलियों को समर्थन देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। साईबाबा शुरू से ही आदिवासियों-जनजातियों के लिए आवाज उठाते रहे हैं।

गौरतलब है कि मार्च 2017 में, महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले की एक सत्र अदालत ने साईबाबा और एक पत्रकार और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्र सहित अन्य को कथित माओवादी लिंक और देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने की गतिविधियों में शामिल होने के लिए दोषी ठहराया था।

मई 2014 में साईबाबा के साथ जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र हेम मिश्रा और पूर्व पत्रकार प्रशांत राही समेत पांच लोग गिरफ्तार हुए थे। आंध्र प्रदेश के एक गरीब परिवार में पैदा हुए जी.एन. साईबाबा 90 प्रतिशत शारीरिक रूप से अक्षम हैं। 2003 में दिल्ली आने से पहले उनके पास ह्वीलचेयर खरीदने के भी पैसे नहीं थे। लेकिन पढ़ाई में हमेशा से वह काफी तेज थे। साईबाबा 9 मई, 2014 में गिरफ्तार होने से पहले राम लाल कॉलेज में अंग्रेजी के प्रोफेसर थे। उनकी लव मैरिज हुई थी। उनकी मुलाकात उनकी पत्नी वसंता से एक कोचिंग क्लास में हुई थी।

अखिल भारतीय पीपुल्स रेजिस्टेंस फोरम (एआईपीआरएफ) के एक कार्यकर्ता के रूप में, उन्होंने कश्मीर और उत्तर पूर्व में मुक्ति आंदोलनों के समर्थन में दलित और आदिवासी अधिकारों के लिए प्रचार करने के लिए 2 लाख किमी से अधिक की यात्रा की थी।

नागपुर में उन्हें उसी अंडा जेल में 14 महीने तक रखा गया था,जहां कसाब को कैद करके रखा गया था। इस जेल को देश की सबसे खतरनाक जेलों में से एक में गिना जाता है।

साईबाबा पर शहर में रहकर माओवादियों के लिए काम करने का आरोप है। क्रांतिकारी डेमोक्रेटिक फ्रंट माओवादियों का गुट है। इन पर इस गुट के सदस्य होने का आरोप था। हालांकि खुद उन्होंने हमेशा ही माओवादियों का साथ देने के आरोप को झूठा बताया है। साईबाबा की जमानत 14 महीने में 4 बार खारिज हुई थी।

साईबाबा हमेशा से आदिवासियों के हितों के पैरोकार रहे हैं। 1990 से वे आरक्षण के समर्थन में मुहिम चला रहे हैं। सितंबर 2009 में कांग्रेस सरकार के शुरू किए गए ऑपरेशन ग्रीन हंट में पकड़े गए थे। माओवादियों पर काबू पाने के लिए शुरू हुआ था ऑपरेशन ग्रीन हंट।

इससे पहले जेल में साईबाबा ने एक सीसीटीवी कैमरा लगाने के विरोध में अपनी जेल की कोठरी के अंदर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर जाने की धमकी दी थी, जो कथित तौर पर शौचालय और स्नान क्षेत्र के फुटेज को कैप्चर करता है। कार्यकर्ताओं, राजनेताओं और बुद्धिजीवियों ने व्हीलचेयर से चलने वाले प्रोफेसर जीएन साईबाबा की रिहाई की मांग की थी , जिन्हें कथित माओवादी लिंक के लिए दोषी ठहराया गया था और नागपुर सेंट्रल जेल में एकांत कारावास में रखा गया था । उन्होंने 90% विकलांग प्रोफेसर के लिए चिकित्सा ध्यान देने की भी मांग की, जिन्होंने 12 फरवरी को कोविद -19 के लिए सकारात्मक परीक्षण किया था।

लेखक अरुंधति रॉय, अधिवक्ता प्रशांत भूषण, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता डी राजा, फिल्म निर्माता संजय काक, और मुरलीधरन नेशनल प्लेटफॉर्म फॉर द राइट्स ऑफ द डिसेबल्ड (एनपीआरडी) के उन लोगों में शामिल थे, जिन्होंने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बात की थी।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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