Sunday, August 14, 2022

दिवाली गिफ्ट नहीं चुनावी नतीजों का असर है पेट्रोल-डीजल के दामों में कटौती

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मोदी सरकार का दिवाली गिफ्ट। यह हेडलाइंस चल रही है आज सभी गोदी मीडिया में। मानो सरकार को अपना कलेजा काटकर देश की जनता को उपहार देना पड़ रहा है। लेकिन इस सत्ता के दलालों को यह बताने में जीभ के गलने का अहसास होता है कि पेट्रोल-डीजल में इतने सालों से बढ़ोत्तरी कौन कर रहा था? पेट्रोल पर 5 और डीजल पर 10 रूपये घटा दिए गए हैं। देश भर के पेट्रोल पंपों पर मीडिया के भांड जा-जाकर इसे मोदी जी की तरफ से दिवाली का गिफ्ट बता रहे हैं।

सरकार के इस फैसले के साथ ही उसकी ओर से जैसे ही राज्य सरकारों को पेट्रोल और डीजल पर वैट की कमी का अनुरोध किया गया, यूपी को तो जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गई। योगी आदित्यनाथ ने तो जैसे इसे अपने लिए चुनावी जीत की पक्की गारंटी समझ ली, और वैट पर एकमुश्त 12 रूपये की कमी कर डाली। तो क्या पिछले 7 वर्षों से ये भाजपा शासित सरकारें केंद्र सरकार के तानशाही को हंसते-हंसते खुद भी झेल रही थीं, और अपने प्रदेश की जनता के मुंह में डंडा डालकर जबरन वसूल रही थीं?

एक-एक कर देश के सभी भाजपा शासित प्रदेशों में वैट पर कमी करने की खबरें आ रही हैं। आपको बता दें कि डीजल-पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी और वैट का हिस्सा 60% के आस-पास बैठता है। अर्थात खाड़ी देशों और अमेरिका से आने वाले तेल पर सरकार पिछले कई वर्षों से जमकर टैक्स वसूल रही थी, लेकिन अभी तक देश को यही समझाया जा रहा था कि यह सब यूपीए सरकारों के आयल बांड, दुनिया में महंगे तेल के कारण हो रहा है। कई भाजपा नेताओं और मंत्रियों तक ने तो यहाँ तक कह दिया था कि पेट्रोल-डीजल की खपत तो मात्र 5% भारत के लोग ही करते हैं, इसका देश के आम लोगों पर कोई असर नहीं होता है।

लेकिन कयास लगाये जा रहे हैं कि हिमाचल प्रदेश में जिस तरह से भाजपा का सूपड़ा साफ़ हुआ है, उसने मोदी सरकार को आने वाले दिनों की भयावहता का साफ़ संदेश दे दिया है। बता दें कि हिमाचल प्रदेश में एक लोकसभा और तीन विधानसभा की सभी सीटों पर भाजपा का सफाया हो गया है। शेष राज्यों में कमोबेश मौजूदा राज्य सरकारों को ही जीत हासिल हुई है। लेकिन ये राज्य वे हैं जहाँ पर हाल ही में चुनाव हो चुके हैं और आमतौर पर लोगों का मूड वर्तमान राज्य सरकार के साथ ही रहता है।

लेकिन हिमाचल, यूपी, गुजरात, उत्तराखंड जैसे राज्यों में अगले एक साल में चुनाव होने जा रहे हैं, और वहां की जनता पिछले चार-पांच वर्षों के शासनकाल और केंद्र की नीतियों पर अपना वोट देने जा रही है। ऐसे में डीजल-पेट्रोल पर रोज-रोज की बढ़ोत्तरी ने पिछले कुछ हफ़्तों से आम लोगों के बीच में महंगाई को ही एकमात्र मुद्दा बना डाला है। यह सब इस सबके बावजूद हो रहा है कि देश की तथाकथित मीडिया शाहरुख़ खान के पुत्र आर्यन खान की गिरफ्तारी को ही इस साल का सबसे बड़ा मुद्दा बनाने पर आमादा थी।

वैसे अभी भी पेट्रोल पर 32.90 रूपये और डीजल पर 31.80 रूपये का बोझ सरकार की ओर से जनता पर डालना जारी रखा गया है। 2014 में जब मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार सत्ता में थी तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दाम 110 डॉलर थे और भारत में पेट्रोल की कीमत 77 रूपये प्रति लीटर थी। आज जबकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दाम अभी भी 80-82 डॉलर प्रति बैरल चल रहे हैं, पेट्रोल के दाम 110 रूपये से घटकर 105 रूपये ही हो पाए हैं, अर्थात यदि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दाम कल 110 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचे तो इस दर पर भारत के उपभोक्ताओं को 145 रूपये प्रति लीटर तो चुकाने ही पड़ेंगे।

145 की तुलना में यूपीए का 77 रुपया प्रति लीटर शायद अधिक देशभक्ति लगता है देश के कुछ हिस्से के मिडिल क्लास को। लेकिन एक दिन यह भी देखना पड़ सकता है जो शायद अगले छह महीनों नजर आने लगे, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन का कहना है कि वे पेट्रोल की कीमत घटने पर उस पर निर्भर कामगारों के हालात पर बेहद चिंतित हैं। उन्होंने ये नहीं बताया कि शेल आयल के उत्पादक कॉर्पोरेट मित्रों की अथाह कमाई पर वे कितने निर्भर हैं। इसलिए अमेरिका सहित सऊदी अरब के द्वारा डीजल-पेट्रोल का कम उत्पादन कर अधिक से अधिक कमाई करने का सिलसिला रुकने वाला नहीं है।

जब चीन को कोयले की कमी के कारण लगातार महंगे दरों पर कोयला बेचने से चीन सहित दुनिया में ऊर्जा संकट से इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा तो भला डीजल पेट्रोल जैसे पेट्रो डॉलर के उपभोग के बढ़ने पर कमाई के सुनहरे अवसर से ये क्यों चूकेंगे। भारत में तो पिछले साल के मुकाबले कोयले का 15% अधिक उत्पादन हुआ था, इसके बावजूद यहां पर भारी किल्लत बताकर एक केंद्रीय मंत्री के जरिये कुछ दिनों में ही गैस बेचने वाले कॉर्पोरेट की संपत्ति में अथाह दौलत जमा करवा दी गई। आने वाले संसद सत्र में कोयले की किल्लत को बताकर कॉर्पोरेट के हितों के लिए जरुरी संशोधनों को भी पारित कराने के लिए आवश्यक शोर शराबे को पहले से ही तैयार कर लिया गया है।
दरअसल, भारत की जनता कितनी भोली-भाली है और उसे कितनी बार मूर्ख बनाया जा सकता है, इसकी आजमाइश इस एक्साइज ड्यूटी की कमी से तय किया जाना है। यदि जनता भाव-विभोर होकर, जैसा कि गोदी मीडिया ने दिखाना शुरू भी कर दिया है उसका नशा दीवाली पर लोगों के सर चिढ़कर बोलता है तो तय है कि आखिरी बाजी उनके हाथ तो नहीं लगने वाली है। उन्हें आगे लगातार पेट्रोल-डीजल और महंगाई के झटके मिलने वाले हैं।

कई नेता तो फ्री में कोरोना की वैक्सीन की बात कर रहे थे। सोचिये वे कहेंगे कि देखिये मोदी सरकार ने तो डीजल पेट्रोल पर एक्साइज भी कम कर दिया, लेकिन फिर भी फ्री में वैक्सीन लगाये जा रहे हैं। झोली भर के वोट देना पड़ेगा, वरना समझा जाएगा कि जनता गद्दार है। ऐसे तमाम जुमले आने वाले समय में आने के लिए तैयार हैं, बस दिमाग की बत्ती धीरे धीरे जलेगी।

फिलहाल ‘देश के गद्दारों को, गोली…….को’नारे वाले सांसद और केंद्रीय मंत्री के राज्य में भाजपा का सफाया किसी आघात से कम नहीं है। पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में भी केदारनाथ में भूतपूर्व मुख्यमंत्री को जिस तरह नारों और धक्कों से धकियाने का काम मन्दिर के पंडों-पुरोहितों ने किया है, उसने किसी सदमे की आहट सुना दी है।

वहीं उत्तर प्रदेश में योगी सरकार लगभग 4 लाख प्राथमिक विद्यालयों की भोजन माताओं और सहायिकाओं को पिछले 8 महीने से उनका मानदेय तक दे पाने की स्थिति में नहीं है। देश को पता होना चाहिए कि इन मिड-डे मील को तैयार करने, वितरित करने और उसके बाद बर्तनों को धोने और परिसर की साफ़ सफाई करने वाली इन महिलाओं को एक महीने में कितनी पगार मिलती है। मात्र 1500 रूपये, अर्थात एक दिन की दिहाड़ी 50 रूपये। उसे भी योगी सरकार दे पाने में असमर्थ है पिछले होली के बाद से। सोचिये 12 रूपये वैट में कम करके वह कैसे ठाठ बाट के साथ अयोध्या और अन्य धार्मिक नगरियों में जलसे कर सकेगी, अपने सरकारी और ठेके पर कार्यरत लाखों लोगों की तनख्वाह और नगरों, सड़कों के सौंदर्यीकरण की तो बात ही छोड़ दीजिये।

ऐसे में डीजल पर 10 रूपये और पेट्रोल पर 5 रूपये की कमी से यदि आप बहुत खुश और उत्साहित हैं तो रुकिए जनाब, यह तो दो कदम आगे और एक कदम पीछे वाली शतरंज की बिसात है। ‘अच्छे दिन’तो आपको आपके वोट यूपी, उत्तराखंड, पंजाब सहित पांच राज्यों में डालने के बाद ही मिलने वाले हैं। इतने दयालु बनने और तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया के झांसे में आने का मतलब है, चूहे की तरह रोटी के लालच में चूहेदानी में फंसना। अगर समझ में नहीं आ रहा हो तो दूरबीन निकालकर देख लीजिये, यूपी में दूर-दूर तक लड़कियां कितनी सुरक्षित लग सकती हैं, यदि कोई आपको अपने हाथों से दूरबीन बनाकर दिखाता है।

(रविंद्र सिंह पटवाल टिप्पणीकार हैं और जनचौक से जुड़े हैं।)

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