Thursday, October 6, 2022

मुफ्त उपहार में केंद्र सरकार के टैक्स हॉलीडे, बैड लोन की छूट पर भी विचार किया जाना चाहिए : डीएमके ने सुप्रीम कोर्ट में कहा

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द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके)ने उच्चतम न्यायालय से अनुरोध किया है कि वह केंद्र सरकार द्वारा विदेशी कंपनियों को टैक्स छूट देना, प्रभावशाली उद्योगपतियों के डूबे कर्ज की माफी, पसंदीदा समूहों को महत्वपूर्ण ठेके देना आदि मुफ्त उपहार है या नहीं इस भी विचार करे क्योंकि इसे अछूता नहीं छोड़ा जा सकता। उच्चतम न्यायालय में आम आदमी पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बाद द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) उस जनहित याचिका (पीआईएल) पर एक हस्तक्षेप आवेदन दायर किया है, जिसमें मुफ्त उपहारों को विनियमित करने के निर्देश देने की मांग की गई है।

हस्तक्षेप आवेदन में डीएमके ने मुफ्त उपहारों के मुद्दे पर कहा है कि सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए कल्याणकारी योजनाओं को मुफ्त उपहार नहीं कहा जा सकता। ‘इलेक्शन फ्रीबीज’ मुद्दे पर भाजपा नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने एक जनहित याचिका (पीआईएल) याचिका दायर की है, जिसमें चुनाव आयोग को यह निर्देश देने की मांग की गई है कि राजनीतिक दलों को चुनाव से पहले सार्वजनिक निधि से तर्कहीन मुफ्त उपहारों का वादा करने या वितरित करने की अनुमति न दी जाए और यदि कोई पार्टी ऐसा करती है तो उसका रजिस्ट्रेशन रद्द करें या ऐसी पार्टियों का चुनाव चिन्ह जब्त करें।

उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका में पर डीएमके द्वारा दायर आवेदन में कहा गया है कि आय, स्थिति, सुविधाओं और अवसरों में असमानताओं को कम करने के लिए अनुच्छेद 38 के तहत एक सामाजिक व्यवस्था और आर्थिक न्याय को सुरक्षित करने के इरादे से एक मुफ्त सेवा प्रदान करने वाली कल्याणकारी योजना शुरू की गई है। किसी भी कल्पनीय वास्तविकता में यह नहीं हो सकता कि इन्हें “फ्रीबी” के रूप में माना जाए। ऐसी योजनाएं बुनियादी आवश्यकताएं प्रदान करने के लिए शुरू की गई हैं, जिनका लाभ गरीब परिवार उठाते हैं। इन्हें विलासिता नहीं कहा जा सकता।

एक उदाहरण के रूप में तमिलनाडु राज्य को नियंत्रित करने वाली पार्टी ने मुफ्त बिजली का हवाला दिया जिसका “बहु-आयामी प्रभाव” हो सकता है। आवेदन में कहा गया कि “बिजली प्रकाश, ताप और शीतलन प्रदान कर सकती है जिसके परिणामस्वरूप जीवन स्तर बेहतर हो सकता है। यह एक बच्चे को उसकी शिक्षा और पढ़ाई में सुविधा प्रदान कर सकती है, इसलिए एक कल्याणकारी योजना की व्यापक पहुंच और इसके परिचय के पीछे कई इरादे हो सकते हैं और इससे उत्पन्न होने वाले व्यापक प्रभाव हो सकते हैं। इसे एक प्रतिबंधात्मक अर्थ में एक फ्रीबी के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता”।

आवेदन में यह भी सवाल किया कि याचिकाकर्ता ने केवल केंद्र सरकार और भारत के चुनाव आयोग को इस मामले में प्रतिवादी के रूप में क्यों जोड़ा है जब राज्य सरकारों की नीतियां जांच के दायरे में हैं। आवेदन में कहा गया कि “यह सम्मानपूर्वक प्रस्तुत किया जाता है कि भारत संघ वर्तमान कार्यवाही में हितधारक नहीं है, इस तथ्य के बावजूद कि रिट याचिका उन राजनीतिक दलों को कटघरे में लाती हैं जो राज्य विधानमंडल में सत्ता के लिए चुने गए हैं, इसलिए याचिकाकर्ता के लिए यह अनिवार्य था कि इस तरह की पार्टियों को प्रतिवादी के रूप में शामिल करते। इस माननीय न्यायालय को विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले सभी हितधारकों के हितों पर विचार करना होगा।

डीएमके ने यह भी कहा कि केवल राज्य सरकार द्वारा शुरू की गई कल्याणकारी योजना को फ्रीबी के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता। केंद्र  में सत्तारूढ़ सरकार द्वारा विदेशी कंपनियों को टैक्स छूट देना, प्रभावशाली उद्योगपतियों के डूबे कर्ज की माफी, पसंदीदा समूहों को महत्वपूर्ण ठेके देना आदि पर भी विचार किया जाना चाहिए और इसे अछूता नहीं छोड़ा जा सकता।

आवेदन में कहा गया कि इस न्यायालय के पास सूक्ष्म और वृहद स्तर पर परिणामों और सामाजिक कल्याण की भयावहता पर विचार किए बिना केंद्र / राज्य विधानमंडल द्वारा किसी भी योजना या अधिनियम को “फ्रीबी” के रूप में वर्गीकृत करने के लिए प्रतिबंधात्मक दृष्टिकोण नहीं हो सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने 3 अगस्त को उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था कि नीति आयोग, वित्त आयोग, विधि आयोग, भारतीय रिजर्व बैंक, सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के सदस्य जैसे विभिन्न हितधारकों से युक्त एक विशेषज्ञ निकाय होगा जो चुनाव प्रचार के दौरान मुफ्त उपहार देने के वादे के मुद्दे को हल करने के लिए अपने के सुझाव पेश करेगा । न्यायालय को इस तरह के एक निकाय के गठन के लिए एक आदेश पारित करने में सक्षम बनाने के लिए पीठ ने याचिकाकर्ता, केंद्र सरकार और भारत के चुनाव आयोग को सुझाव देने का निर्देश दिया था। हालांकि, भारत के चुनाव आयोग ने इसका हिस्सा बनने से इनकार कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने 11 अगस्त को राज्य के कल्याण और सरकारी खजाने पर आर्थिक दबाव के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया था। सीजेआई ने कहा था कि अर्थव्यवस्था में पैसा गंवाना और लोगों का कल्याण, दोनों को संतुलित करना होगा। इसलिए यह बहस और विचार रखने के लिए कोई होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में एक और हस्तक्षेप आवेदन दायर किया गया है, जिसमें मुफ्त उपहारों को विनियमित करने के निर्देश देने की मांग की गई है। मध्य प्रदेश की एक डॉक्टर और एम.पी. महिला कांग्रेस महासचिव ने उक्त हस्तक्षेप आवेदन दायर करते हुए सुप्रीम कोर्ट में पेश किया कि राजनीतिक दल (सही तरीके से) हमारे नागरिक को सब्सिडी और रियायत दे रहे हैं क्योंकि अंततः वे अपने संवैधानिक जनादेश का निर्वहन कर रहे हैं, जो हमारे देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट में यह दलील डॉ. जया ठाकुर ने एडवोकेट वरुण ठाकुर के माध्यम से ‘इलेक्शन फ्रीबीज’ मुद्दे पर भाजपा नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर एक जनहित याचिका (पीआईएल) याचिका में एक हस्तक्षेप आवेदन में दी।

कांग्रेस नेता ने अपने आवेदन में कहा कि लोकतंत्र में उनकी गहरी आस्था है और हमारे संविधान के सिद्धांत के अनुसार सत्ताधारी दल कमजोर वर्ग के कल्याण और उत्थान के लिए नीतियां बनाने के लिए बाध्य हैं, इसलिए वे सब्सिडी देकर सही कर रहे हैं और इसे मुफ्त नहीं कहा जा सकता।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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