Monday, December 5, 2022

ईडी निदेशक एसके मिश्रा के कार्यकाल का तीसरी बार विस्तार, जस्टिस कौल सुनवाई से अलग हुए  

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सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस संजय किशन कौल ने शुक्रवार को केंद्र सरकार द्वारा 17 नवंबर, 2021 को ईडी निदेशक संजय कुमार मिश्रा के कार्यकाल को एक साल और बढ़ाने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। याचिकाओं को उस पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया, जिसमें जस्टिस एसके कौल सदस्य नहीं हैं। जस्टिस कौल ने कहा, “मैं इस मामले को नहीं सुन सकता। याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने यह कहते हुए शीघ्र सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया कि केंद्र सरकार ने एसके मिश्रा को एक और वर्ष का विस्तार देने की एक और अधिसूचना जारी की, जो याचिकाओं के उद्देश्य को विफल कर देगा।

दरअसल केंद्र सरकार ने गुरुवार को जांच एजेंसी ईडी के प्रमुख संजय कुमार मिश्रा का कार्यकाल एक बार फिर बढ़ा दिया है। मिश्रा के कार्यकाल को तीसरी बार विस्तार दिया गया है और अब वह इस पद पर 18 नवंबर 2023 तक रहेंगे और तब वह ईडी प्रमुख के पद पर अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा कर लेंगे। केंद्रीय कैबिनेट की एक कमेटी ने इसे मंजूरी दी है। संजय कुमार मिश्रा को मई 2020 में रिटायर होना था।

जस्टिस कौल ने हालांकि कहा कि वह जल्द लिस्टिंग के लिए निर्देश नहीं दे सकते। पीठ ने आदेश में दर्ज किया, चूंकि वकील ने कुछ आग्रह व्यक्त किया है, इसलिए मामले को आवश्यक आदेशों के लिए सीजेआई के समक्ष रखा जाए।जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एएस ओका की पीठ कांग्रेस नेता डॉ. जया ठाकुर, आरएस सुरजेवाला, तृणमूल कांग्रेस के नेता महुआ मोइत्रा, साकेत गोखले, विनीत नारायण और एमएल शर्मा द्वारा दायर याचिकाओं पर विचार कर रही थी। याचिकाएं केंद्रीय सतर्कता आयोग (संशोधन) अधिनियम 2021 को भी चुनौती देती हैं, जो प्रवर्तन निदेशालय के निदेशक के कार्यकाल को 5 साल तक बढ़ाने की अनुमति देता है।

सुप्रीम कोर्ट ने 8 सितंबर, 2021 को कॉमन कॉज़ द्वारा दायर मामले में निर्देश दिया था कि एसके मिश्रा को और विस्तार नहीं दिया जाना चाहिए, जिनका ईडी निदेशक के रूप में कार्यकाल 16 नवंबर, 2021 को समाप्त होना था।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के विपरीत केंद्र सरकार ने 17 नवंबर, 2021 से उनके कार्यकाल को एक साल और बढ़ा दिया है। यह ईडी निदेशक की अवधि के लिए 5 साल तक के विस्तार की अनुमति देने के लिए केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम में संशोधन करने के लिए अध्यादेश की घोषणा के माध्यम से किया गया। अध्यादेश को अधिनियम के साथ बदल दिया गया, जिसे दिसंबर, 2021 में पारित किया गया।

याचिका में तर्क दिया गया कि एसके मिश्रा को लाभ देने के इरादे से ही लाया गया। यह कहा गया कि मिश्रा अन्यथा मई, 2020 में 60 वर्ष की आयु प्राप्त करने के बाद सेवानिवृत्ति प्राप्त कर चुके हैं। शुरुआत में उन्हें नवंबर, 2018 में दो साल की अवधि के लिए ईडी निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया। उनकी सेवानिवृत्ति के बावजूद, नवंबर, 2020 में केंद्र ने उनकी प्रारंभिक नियुक्ति को 3 साल के रूप में पूर्वव्यापी रूप से संशोधित करने का आदेश पारित किया। इस कार्रवाई को कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में चुनौती दी गई।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मिश्रा को दिया गया विस्तार सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का घोर उल्लंघन है। सितंबर में केंद्र सरकार ने इस मामले में एक जवाबी हलफनामा दायर किया, याचिकाओं को “राजनीति से प्रेरित” बताते हुए विरोध किया और कहा कि ईडी निदेशक के लिए लंबा कार्यकाल जनहित में आवश्यक है। यह दावा करते हुए कि याचिकाकर्ताओं की गलत समझ है कि यह केंद्र सरकार है, जो अपने विवेक से एजेंसियों के प्रमुखों की शर्तों के विस्तार पर निर्णय लेती है।हलफनामे में बताया गया कि उच्चाधिकार प्राप्त समितियाँ इस पहलू पर निर्णय लेती हैं।

वर्ष 2020 में संजय कुमार मिश्रा ऐसे पहले शख्स थे, ईडी प्रमुख रहते हुए जिनके कार्यकाल को विस्तार दिया गया था। साल 2021 में उन्हें दूसरा कार्यकाल विस्तार देने से पहले केंद्र सरकार ने जांच एजेंसियों के प्रमुखों के कार्यकाल को बढ़ाने के संबंध में नियमों में संशोधन कर शासनादेश जारी किया था। इससे पहले केंद्रीय एजेंसियों के प्रमुखों का कार्यकाल 2 साल का होता था लेकिन इस संशोधन के बाद वह अपने पद पर 5 साल तक बने रह सकते हैं।

केंद्र सरकार के द्वारा किए गए इस संशोधन का कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस सहित कई अन्य दलों ने विरोध किया था। 13 नवंबर 2020 को जब पहली बार संजय कुमार मिश्रा का कार्यकाल बढ़ाया गया था तो इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसमें किसी तरह का दखल देने से इंकार कर दिया था।

वर्ष 2021 में दूसरी बार कार्यकाल बढ़ाए जाने के बाद एक एनजीओ कॉमन कॉज ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर केंद्र सरकार के इस फैसले को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने तब कहा था कि सरकार ईडी के प्रमुख का कार्यकाल इस एजेंसी द्वारा देखे जा रहे सभी अहम मामलों की जांच के पूरा होने तक नहीं बढ़ा सकती है।

याचिकाकर्ताओं ने अपनी दलील में कहा था कि मनी लॉन्ड्रिग के मामलों में ईडी के द्वारा छापे मारी मोदी सरकार में 26 गुना बढ़ गई है जबकि इसमें अपराध साबित होने की दर कम है। वित्त मंत्रालय ने राज्य सभा में बताया था कि पिछले 8 सालों में मनी लॉन्ड्रिग के मामलों में 3010 बार छापे मारी की गई है और इसमें सिर्फ 23 अभियुक्त दोषी पाए गए हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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