Monday, October 3, 2022

5जी नीलामी में 4.3 लाख करोड़ की बेस प्राइस पर मिला महज डेढ़ लाख करोड़

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5जी स्पेक्ट्रम की नीलामी की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है इससे सरकार को डेढ़ लाख करोड़ का राजस्व मिला है। अब सोशल मीडिया पर यह बस तेज हो गई है कि अगर कैग की रिपोर्ट के अनुसार 2008 में 2जी के लिए सरकार को कम से कम 176000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त राजस्व मिल सकता था तो 2022 में 5जी की नीलामी से इतना कम राजस्व कैसे मिला? अगर 12 साल पहले 2जी स्पेक्ट्रम की नीलामी से सरकार को 1 लाख 76 हजार करोड़ की अतिरिक्त आमदनी हो सकती थी तो अब 5जी स्पेक्ट्रम की नीलामी से मिलने वाला अनुमानित राजस्व कम से कम 5 लाख करोड़ होना चाहिए था।

देश में अब तक की सबसे बड़ी स्पेक्ट्रम नीलामी सोमवार को खत्म हो गई। इसमें कुल 1,50,173 करोड़ रुपये के स्पेक्ट्रम की बिक्री हुई। इसी नीलामी को लेकर अब कांग्रेस नेता श्रीनिवास ने निशाना साधा है। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा- ‘कैग के विनोद राय कहां हैं? जिन्होंने 2008 में कहा था कि 2जी की नीलामी हुई, तो 1.76 लाख करोड़ का सरकार को घाटा हुआ था। और अब 2022 में 5जी स्पेक्ट्रम 1.50 लाख करोड़ में नीलाम हुआ तो सरकार को फायदा हुआ है। उन्होंने लिखा अब विनोद राय कहां हैं’?

श्रीनिवास ने एक अन्य ट्वीट में अरविंद केजरीवाल की फोटो के साथ लिखा-‘साफ है सब मिले हुए थे जी!

दरअसल 2जी स्पेक्ट्रम को लेकर पूर्व कैग विनोद राय की रिपोर्ट पर बीजेपी समेत, अन्ना आंदोलन के जरिए अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, बाबा रामदेव, वीके सिंह जैसी शख्सियतों ने तत्कालीन केंद्र की मनमोहन सरकार पर गंभीर सवाल खड़े किए थे और घोटाले के आरोप लगाए थे।

यही नहीं जब 2जी स्पेक्ट्रम केस मामले में 22 दिसंबर, साल 2017 में विशेष अदालत ने पूर्व केंद्रीय मंत्री ए राजा और द्रमुक नेता कनिमोझी सहित सभी आरोपियों को बरी कर दिया था, तब अरविंद केजरीवाल ने इस पर आश्चर्य जताया था। केजरीवाल ने तब ट्वीट करते हुए लिखा था कि 2जी घोटाला देश के सबसे बड़े घोटालों में से एक है। यह यूपीए के पतन की वजह था और इसने देश को हिला दिया था। आज इसके सभी आरोपी बरी हो गए हैं। क्या सीबीआई ने जानबूझकर जांच में गड़बड़ी की है? जनता जवाब जानना चाहती है।अब 5जी 2022 में 5जी स्पेक्ट्रम 1.50 लाख करोड़ में नीलाम हुआ तो इनकी अभी तक चूं भी नहीं निकली है।

2010 में आई एक सीएजी(कैग) रिपोर्ट में 2008 में बांटे गए स्पेक्ट्रम पर सवाल उठाए गए थे। इसमें बताया गया था कि स्पेक्ट्रम की नीलामी के बजाए पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर इसे बांटा गया था। इससे सरकार को एक लाख 76 हजार करोड़ रुपए का घाटा हुआ था। इसमें इस बात का जिक्र था कि नीलामी के आधार पर लाइसेंस बांटे जाते तो यह रकम सरकार के खजाने में जाती।

गौरतलब है कि भारत में 5जी स्पेक्ट्रम की नीलामी में सरकार ने 4.3 लाख करोड़ रुपये स्पेक्ट्रम की बेस प्राइस रखी थी। नीलामी से उसको महज 1.5 लाख करोड़ रुपये मिले हैं। 2010 में जब स्पेक्ट्रम बेचा गया था तो कैग विनोद राय ने अनुमान लगाया कि अंतरराष्ट्रीय कीमत के हिसाब से 1.76 लाख करोड़ रुपये मिलने चाहिए थे। न्यायालय में मामला गया। तत्कालीन संचार मंत्री ए राजा को घोटाले के आरोप में जेल भेज दिया गया।

कोर्ट से लेकर कैग तक बारह तेरह साल पहले उसे नीलामी करके 1.76 लाख करोड़ रुपये में बेच रहे थे। अब 5जी की नीलामी हुई है। सरकार ने अनुमान लगाया कि कम से कम 4.3 लाख करोड़ रुपये मिलेंगे मगर वास्तव में मिलने जा रहे हैं 1.5 लाख करोड़ रुपये।

लाख टके का सवाल है कि क्या किसी अखबार, जांच एजेंसी, कैग, सुप्रीम कोर्ट में यह क्षमता है कि वह सरकार को बताए कि 5जी स्पेक्ट्रम की अंतरराष्ट्रीय कीमत के हिसाब से कितना मूल्य था और बोली लगाने वाली 3 कम्पनियों से कार्टलाइजेशन कराकर उसे सरकार ने औने पौने भाव बेचकर कितने लाख करोड़ रुपये की कमाई की है?

फेसबुक पर गिरीश मालवीय ने लिखा है कि बहुत से लोग कहते हैं कि मोदी सरकार में भ्रष्टाचार नहीं हुआ, लेकिन क्या आपने पिछ्ले 7-8 सालों में मोदी सरकार के कामकाज के बारे में (कै) ग की रिपोर्ट की कोई भी ख़बर पढ़ी ?भारत का नियंत्रक और महालेखापरीक्षक कैग संभवतः भारत के संविधान का सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकारी है। कैग एक ऐसी संस्था है जो देखती है कि संसद द्वारा अनुमन्य खर्चों की सीमा से अधिक धन खर्च न होने पाए या संसद द्वारा विनियोग अधिनियम में निर्धारित मदों पर ही धन खर्च किया जाए। ये डॉ. भीम राव अम्बेडकर का कथन है।

कैग के माध्यम से ही संसद की अन्य सार्वजनिक प्राधिकरणों की, जो सार्वजनिक धन खर्च करते हैं उनकी जवाबदेही सुनिश्चित की जाती है और यह जानकारी प्रतिवर्ष जनता के सामने रखना जरूरी होता है।

2015 से पहले हर साल संसद में कैग की रिपोर्ट पर हंगामा होता था, घोटाला हुआ या नहीं हुआ बात दीगर है लेकिन 2जी नीलामी, कोयला ब्लॉक नीलामी, आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाला और 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे अनेक प्रकरण उस वक्त कैग रिपोर्ट के द्वारा ही सार्वजनिक जानकारी में आए थे।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि मोदी सरकार में कैग का किस तरह से गला घोंटा गया है। इंडियन एक्सप्रेस द्वारा दायर आरटीआई आवेदन के जवाब में दी गई जानकारी से पता चला कि केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों से संबंधित सीएजी रिपोर्ट 2015 में 55 से घटकर 2020 में केवल 14 रह गई। यानि मोदी जी के रहते संसद में यूपीए सरकार से लगभग 75% कम रिपोर्ट कैग की पेश हुई है, और जो पेश हुई हैं उनमें भी लीपापोती करने की कोशिश साफ़ नजर आती है।

गिरीश मालवीय लिखते हैं कि भ्रष्टाचार का ताजा उदाहरण आपके सामने है केंद्रीय कोयला मंत्री प्रहलाद जोशी द्वारा कुछ ही दिन पहले 25 जुलाई को सदन में दिए गए एक लिखित उत्तर में बताया गया कि देश में कोयले की कोई कमी नहीं है भारत में कोयले का उत्पादन 31% बढ़ा है, तो फिर आप ही बताइए कि एनटीपीसी पर और देश के विभिन्न राज्यों पर, विदेशों से बेहद महंगे कोयले के आयात का दबाव क्यों बनाया जा रहा है ?देश की कोल इंडिया लिमिटेड मात्र तीन हजार रुपये प्रति टन की दर से कोयला राज्यों को दे रही है। जबकि अडानी से कोयला खरीदने के लिये जो टेंडर डाले गए उसमें अडानी ने 30 से 40 हजार रुपये प्रति टन की दर से कोयला आयात के रेट दिए हैं। और अभी खबरें आ रही हैं कि दस गुना रेट पर कोयला आयात करने के टेंडर पास भी हो गए हैं इस तरह से जबरन 10 गुना महंगा विदेशी कोयला खरीदेंगे तो देश के करोड़ों उपभोक्ताओं को महंगी बिजली खरीदनी पड़ेगी।

ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (एआईपीईएफ) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया कि वे बिजली मंत्रालय को राज्यों और उसकी बिजली उत्पादन कंपनियों को कोयले के आयात के लिए अपने जबरदस्ती दिए गए निर्देश को वापस लेने के लिए कहें, जिनकी उन्हें आवश्यकता नहीं है। फेडेरेशन ने कहा कि 25 जुलाई को संसद में कोयला मंत्रालय के जवाब को देखते हुए महंगा विदेशी कोयला आयात जरूरी ही नहीं है।

इतनी बड़ी लूट खुले आम चल रही है लेकिन न कोई कुछ समझने को तैयार हैं न कुछ करने को ? कैग जेसी संस्था को किनारे लगा दिया गया है तो भ्रष्टाचार की रिपोर्ट देगा ही कौन , लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला मीडिया तो पहले ही बिक चुका है !

5जी स्पेक्ट्रम की नीलामी सात दिनों तक चली, जिसमें चार कंपनियों ने भाग लिया था- रिलायंस जियो, भारतीय एयरटेल, वोडाफोन आइडिया और अडानी ग्रुप की अडानी डाटा नेटव‌र्क लिमिटेड। इसमें 1.5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा मूल्य के 5जी टेलिकॉम स्पेक्ट्रम की रिकॉर्ड बिक्री हुई। नीलामी में मुकेश अंबानी की कंपनी जियो ने सबसे अधिक बोली लगाई।

अनंतिम आंकड़ों के मुताबिक 1,50,173 करोड़ रुपये की बोलियां लगाई गईं। अत्यधिक उच्च गति के मोबाइल इंटरनेट संपर्क की पेशकश करने में सक्षम 5जी स्पेक्ट्रम की नीलामी की यह राशि पिछले साल बेचे गए 77,815 करोड़ रुपये के 4जी स्पेक्ट्रम से लगभग दोगुना है। यह राशि 2010 में 3जी नीलामी से मिले 50,968.37 करोड़ रुपये के मुकाबले तीन गुना है। रिलायंस जियो ने 4जी की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक तेज गति से संपर्क की पेशकश करने वाले रेडियो तरंगों के लिए सबसे अधिक बोली लगाई।

इसके बाद भारती एयरटेल और वोडाफोन आइडिया लिमिटेड का स्थान रहा। बताया जाता है कि अडानी समूह ने निजी दूरसंचार नेटवर्क स्थापित करने के लिए 26 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम खरीदा है। सूत्रों ने कहा कि किस कंपनी ने कितना स्पेक्ट्रम खरीदा, इसका ब्योरा नीलामी के आंकड़ों के पूरी तरह आने के बाद ही पता चलेगा।

सरकार ने 10 बैंड में स्पेक्ट्रम की पेशकश की थी, लेकिन 600 मेगाहर्ट्ज, 800 मेगाहर्ट्ज और 2300 मेगाहर्ट्ज बैंड में स्पेक्ट्रम के लिए कोई बोली नहीं मिली। लगभग दो-तिहाई बोलियां 5जी बैंड (3300 मेगाहर्ट्ज और 26 गीगाहर्ट्ज) के लिए थीं, जबकि एक-चौथाई से अधिक मांग 700 मेगाहर्ट्ज बैंड में आई। यह बैंड पिछली दो नीलामियों (2016 और 2021) में बिना बिके रह गया था।

पिछले साल हुई नीलामी में रिलायंस जियो ने 57,122.65 करोड़ रुपये का स्पेक्ट्रम लिया था। भारती एयरटेल ने लगभग 18,699 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी और वोडाफोन आइडिया ने 1,993.40 करोड़ रुपये का स्पेक्ट्रम खरीदा था। इस साल कम से कम 4.3 लाख करोड़ रुपये के कुल 72 गीगाहर्ट्ज रेडियो तरंगों को बोली के लिए रखा गया था।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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