Wednesday, December 7, 2022

जस्टिस चंद्रचूड़ 50वें चीफ जस्टिस होंगे; 9नवम्बर को शपथ लेंगे, न्यायपालिका को नारंगीकरण से बचाना सबसे बड़ी चुनौती

Follow us:

ज़रूर पढ़े

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बेबाक फैसलों के लिए चर्चित जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ को भारत के चीफ जस्टिस के रूप में 9 नवंबर से नियुक्त किया है। वह देश के 50वें मुख्य न्यायाधीश यानि सीजेआई होंगे। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ वर्तमान सीजेआई यूयू ललित की सेवानिवृत्ति के बाद कार्यभार संभालेंगे। जस्टिस चन्द्रचूड़ के नये चीफ जस्टिस बनने को बड़ी उम्मीद के साथ देखा जा रहा है क्योंकि जस्टिस चन्द्रचूड़ को नागरिकों के मौलिक अधिकारों, संविधान और कानून के शासन के प्रति दृढ़ता से खड़े होने के लिए जाना जाता है। उनके कार्यकाल में 18 जजों की नियुक्तियां उच्चतम न्यायालय में और अनेक नियुक्तियां उच्च न्यायालयों में होंगी जिसमें न्यायपालिका के नारंगीकरण को रोकने और बार एवं बेंच से योग्य लोगों को जज बनाने की चुनौती होगी।   

भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार किए गए पांच कार्यकर्ताओं के अधिकारों को बरकरार रखने के लिए जस्टिस चंद्रचूड़ एकमात्र असहमतिपूर्ण राय थी। उन्होंने न्यायपालिका को याद दिलाया कि अनुमानों की वेदी पर असहमति की बलि नहीं दी जा सकती। जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपनी अल्पसंख्यक राय में लिखा, “विरोध एक जीवंत लोकतंत्र का प्रतीक है। अलोकप्रिय कारणों को उठाने वालों को सताकर विपक्ष की आवाज को दबाया नहीं जा सकता।”

इससे पहले भारत के चीफ जस्टिस यूयू ललित ने उनके उत्तराधिकारी के रूप में न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़ की सिफारिश की थी। सीजेआई यूयू ललित इस साल 8 नवंबर को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। जस्टिस चंद्रचूड़ कई संविधान पीठों और ऐतिहासिक फ़ैसलों का हिस्सा रहे हैं। क़ानून मंत्री किरन रिजिजू ने जस्टिस चंद्रचूड़ के सीजेआई नियुक्त किए जाने की जानकारी दी है।

जस्टिस चंद्रचूड़ का कार्यकाल 2 साल का होगा और वह नवंबर, 2024 में रिटायर होंगे। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ का पूरा नाम धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ है। दिल्ली के सेंट कोलंबिया स्कूल से अपनी शुरुआती पढ़ाई करने के बाद जस्टिस चंद्रचूड़ ने दिल्ली के सेंट स्टीफन कॉलेज से इकनॉमिक्स और मैथमेटिक्स में ऑनर्स किया है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से एलएलबी करने के बाद हावर्ड यूनिवर्सिटी से एलएलबी की डिग्री ली है।

जस्टिस चंद्रचूड़ 1998 से लेकर 2000 तक भारत सरकार के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल रहे हैं। वह जून, 1998 से मार्च 2000 तक मुंबई हाई कोर्ट में सीनियर एडवोकेट रहे हैं। मार्च 2000 से अक्टूबर 2013 तक वह बॉम्बे हाईकोर्ट में जज रहे और अक्टूबर 2013 से मई 2016 तक इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस रहे। मई 2016 में वह सुप्रीम कोर्ट में जज बने। जस्टिस चंद्रचूड़ ने वकालत के अपने करियर में एडवोकेट के तौर पर सुप्रीम कोर्ट से लेकर गुजरात, कोलकाता, इलाहाबाद, मध्य प्रदेश और दिल्ली में प्रैक्टिस की है।

जस्टिस चंद्रचूड़ के पिता यशवंत विष्णु चंद्रचूड़ देश के 16वें चीफ जस्टिस थे। उनका कार्यकाल 22 फरवरी, 1978 से 11 जुलाई, 1985 तक यानी करीब 7 साल तक रहा। पिता के रिटायर होने के 37 साल बाद उसी पद पर बैठेंगे। जस्टिस चंद्रचूड़ पिता के 2 बड़े फैसलों को उच्चतम न्यायालय में पलट भी चुके हैं। वह बेबाक फैसलों के लिए चर्चित हैं।

अपने बेबाक फैसलों के लिये चर्चित जस्टिस चंद्रचूड़ दस नवंबर 2024 तक अपने पद पर बने रहेंगे। उनकी चर्चा इसलिए भी है कि उन्होंने पिता यशवंत विष्णु चंद्रचूड़ के एडल्टरी लॉ व शिवकांत शुक्ला बनाम एडीएम जबलपुर मामले में दिये गये फैसलों को बदला था। दरअसल, वाई.वी. चंद्रचूड़ की पीठ ने पुरुष समलैंगिकता को खारिज किया था। वहीं जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ वाली पीठ ने यौन स्वायत्तता को महत्व दिया। एडीएम जबलपुर वाले मामले में तब अदालत ने निजता को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता नहीं दी थी। वहीं जस्टिस डी.वाई.चंद्रचूड़ ने 2017 में अपने फैसले में व्यक्ति की निजता को उसके मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी। उन्होंने माना कि व्यक्ति का जीवन व व्यक्तिगत आजादी सरकार द्वारा खारिज नहीं की जा सकती है।

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कई विशिष्ट फैसले जस्टिस चंद्रचूड़ को हमेशा सुर्खियों में रखते रहे हैं। केरल हाईकोर्ट द्वारा अशोकन यानी हादिया के शफीन नामक मुस्लिम युवक की शादी को नकारे जाने के बाद मामला जब उच्चतम न्यायालय में पहुंचा तो जस्टिस चंद्रचूड़ की पीठ ने विवाह को वैध ठहराया। जस्टिस चंद्रचूड़ ने तब धर्म के मामले में निर्णय लेने को वयस्कों का अधिकार बताया।

हाल में एक महत्वपूर्ण फैसले में जस्टिस चंद्रचूड़ वाली पीठ ने एक अविवाहित महिला को 24वें हफ्ते में गर्भपात का अधिकार दिया। उनका मानना था कि एक अविवाहित महिला को सुरक्षित गर्भपात की अनुमति न मिलना उसकी अस्मिता व आजादी का अतिक्रमण होगा। उन्होंने बच्चे को जन्म देने व न देने के फैसले को संविधान प्रदत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का ही हिस्सा बताया। अनुमति न देना कानून के मकसद के विरुद्ध होगा। इसे मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट का विस्तार बताया गया।

कई मामलों में जस्टिस चंद्रचूड़ ने निजता को संवैधानिक अधिकार की संज्ञा दी,जो कि अनुच्छेद 21 की भावना के ही अनुरूप है। यही वजह है कि जस्टिस चंद्रचूड़ के दिये फैसले अकसर सुर्खियों में रहते हैं। अब चाहे ये अभिव्यक्ति की आजादी का मसला हो, एलजीबीटीक्यूआई वर्ग के अधिकारों का मसला हो या अन्य संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मामले- जस्टिस चंद्रचूड़ ने नजीर के फैसले दिये हैं। ऐसा ही मामला समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटाने वाली पीठ में भागीदारी का रहा, जिसे उन्होंने औपनिवेशिक सोच का कानून बताया था।

आधार को अधिकांश सुविधाओं के लिये जरूरी बनाने के फैसले पर उन्होंने कहा कि सत्ता पक्ष को निजता के अधिकार के अतिक्रमण का अधिकार नहीं है। इसी तरह सबरीमाला मंदिर में एक आयु विशेष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को खारिज करते हुए उन्होंने इसे छुआछूत की मानसिकता के साथ संवैधानिक नैतिकता का अतिक्रमण करने वाली सोच बताया। वहीं दिल्ली सरकार व केंद्र के बीच अधिकारों के टकराव में कार्यपालिका का अधिकार राज्यपाल के बजाय चुनी सरकार को दिया। एक गिरफ्तारी के मामले में उन्होंने कहा कि जब तक पर्याप्त प्रमाण न हो, व्यक्ति को हिरासत में नहीं रखा जा सकता। बहरहाल, मौजूदा माहौल में नागरिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी तथा सत्ता के निरंकुश व्यवहार पर अंकुश को लेकर उनसे बड़ी उम्मीदें हैं।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने 2017-18 में पिता के दिए दो फैसले एडल्टरी लॉ और शिवकांत शुक्ला वर्सेज एडीएम जबलपुर के फैसले को पलटा था। साल 1985 में तत्कालीन चीफ जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ की बेंच ने सौमित्र विष्णु मामले में आईपीसी की धारा 497 को बरकरार रखा था। उस वक्त बेंच ने अपने फैसले में लिखा था- सामान्य तौर पर यह स्वीकार किया गया है कि संबंध बनाने के लिए फुसलाने वाला आदमी ही है न कि महिला। 2018 में इस फैसले को पलटते हुए जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने कहा- एडल्टरी लॉ पितृसत्ता का संहिताबद्ध नियम है। उन्होंने कहा कि यौन स्वायत्तता को महत्व दिया जाना चाहिए।

इसी तरह साल 1976 में शिवकांत शुक्ला बनाम एडीएम जबलपुर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निजता को मौलिक अधिकार नहीं माना था। उस बेंच में पूर्व चीफ जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ भी थे। 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने निजता को मौलिक अधिकार माना। इस बेंच में चंद्रचूड़ भी शामिल थे। चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में लिखा- एडीएम जबलपुर मामले में बहुमत के फैसले में गंभीर खामियां थीं। संविधान को स्वीकार करके भारत के लोगों ने अपना जीवन और निजी आजादी सरकार के समक्ष आत्मसमर्पित नहीं कर दी है।

नोएडा ट्विन टावर गिराने का फैसला जस्टिस चन्द्रचूड़ की पीठ ने ही दिया था। नोएडा में सुपरटेक के दोनों टावर 28 अगस्त को गिराया गया। 31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने टावरों को तोड़ने का आदेश दिया था। ट्विन टावर के निर्माण में नेशनल बिल्डिंग कोड के नियमों का उल्लंघन किया गया।

टीवी पत्रकार अर्नब गोस्वामी की जमानत पर सुनवाई करते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ के कमेंट की काफी चर्चा हुई थी। उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा था कि उनकी जो भी विचारधारा हो, मैं तो उनका चैनल नहीं देखता, लेकिन अगर कोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा तो हम बर्बादी की ओर बढ़ रहे होंगे। अर्नब गोस्वामी पर 2018 में एक इंटीरियर डिजाइनर और उसकी मां को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगा था। जिसके बाद उन्हें जेल जाना पड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने अर्नब को रिहा करने का आदेश देते हुए हाईकोर्ट पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि उनकी जमानत की अर्जी ठुकराना गलत था। अर्नब ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें कोर्ट ने अंतरिम जमानत देने से इनकार किया था।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने माना था कि मुख्य न्यायाधीश और अदालत के न्यायाधीश संवैधानिक पद हैं न कि पदानुक्रम।जस्टिस चंद्रचूड़, जो असहमति को “लोकतंत्र के सुरक्षा वाल्व” के रूप में देखते हैं, अपने गहन निर्णयों और असहमतिपूर्ण विचारों के लिए जाने जाते हैं, जो शक्तिशाली लोगों की अंतरात्मा को चुभते हैं और क्षमता, कर्तव्यनिष्ठा और न्याय की उच्च भावना को प्रदर्शित करते हुए प्रतिगामी को चुनौती देते हैं।उन्होंने देश भर की जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों की बढ़ती आबादी की दुर्दशा के बारे में लिखा कि एक दिन के लिए भी स्वतंत्रता से वंचित करना एक दिन बहुत अधिक है।

जस्टिस चन्द्रचूड़ ने स्थायी कमीशन के लिए योग्य महिला सेना और नौसेना शॉर्ट सर्विस अधिकारियों को खोजने के लिए सरकार की अनिच्छा की आलोचना की थी। उन्होंने इस विचार को खारिज कर दिया कि महिलाएं “सेक्स स्टीरियोटाइप” के रूप में पुरुषों की तुलना में शारीरिक रूप से कमजोर थीं।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

क्यों ज़रूरी है शाहीन बाग़ पर लिखी इस किताब को पढ़ना?

पत्रकार व लेखक भाषा सिंह की किताब ‘शाहीन बाग़: लोकतंत्र की नई करवट’, को पढ़ते हुए मेरे ज़हन में...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -