Wednesday, August 10, 2022

संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्द जोड़ने पर जस्टिस पंकज मित्तल को आपत्ति

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पता नहीं संविधान को सर्वोपरि मानने वाले भारत के चीफ जस्टिस एनवी रमना ने यह नोटिस किया या नहीं कि देश के एक हाईकोर्ट के वर्तमान चीफ जस्टिस को संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्द होने पर आपत्ति है जबकि उन्होंने किसी हाईकोर्ट में जज की शपथ लेते समय और फिर किसी और राज्य में हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पद की शपथ लेते हुए भारत के संविधान की कसम खायी थी। जिस तरह से राजनीतिक पूर्वाग्रहों से ग्रस्त लोगों को कालेजियम जज और राज्यों का चीफ जस्टिस बनाया जा रहा है यदि वे संविधान के मूल चरित्र पर सवाल उठाते हैं तो उन्हें उनके पद से तत्काल बर्खास्त कर देने की व्यवस्था कानून में होनी चाहिए। केंद्र या राज्य में सरकार गठन के समय केवल संविधान की शपथ लेने का विकल्प होना चाहिए और संविधान विरुद्ध बयान और कार्य पर बर्खास्तगी का कानून होना चाहिए।     

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस पंकज मित्तल ने कहा है कि भारत अनंत काल से एक आध्यात्मिक देश रहा है और संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्द जोड़ने से देश की इस छवि को नुकसान पहुंचा है। उन्होंने कहा कि संविधान में अपने देश को आध्यात्मिक लोकतंत्र भारत कहा जाना चाहिए था।

हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने रविवार को धर्म और भारत का संविधान  विषय पर एक सम्मेलन में प्रमुख भाषण देते हुए कहा कि भारत के मूल संविधान में ही संप्रभु, लोकतांत्रिक, गणतंत्र का उल्लेख कर दिया गया था। ऐसे में 1976 के संशोधन में प्रस्तावना को बदलकर इसकी आध्यात्मिक छवि को चोट पहुंचाई गई।

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख अधिवक्ता परिषद की ओर से आयोजित कार्यक्रम में चीफ जस्टिस मित्तल ने कहा कि भारत अपने सभी नागरिकों की देखभाल करने में सक्षम है और इसमें समाजवादी प्रवृत्ति अंतर्निहित है। उन्होंने कहा कि पांडवों से लेकर मौर्यों, गुप्तों, मुगलों और अंग्रेजों तक ने शासन किया लेकिन भारत को कभी मुस्लिम, ईसाई या हिंदू राष्ट्र के रूप में नहीं देखा गया क्योंकि इसकी आध्यात्मिक देश की छवि सर्वमान्य थी।

उन्होंने कहा कि पंथनिरपेक्ष शब्द जोड़कर हमने खुद की आध्यात्मिक आभामंडल के विस्तार को संकुचित कर दिया। उन्होंने कहा कि इसे संकुचित दिमाग की सोच कहा जा सकता है। वरना, भारत तो युगों-युगों से आधात्यामिक देश रहा है और इसका नाम आध्यात्मिक लोकतंत्र भारत होना चाहिए था। ध्यान रहे कि 1976 में संविधान संशोधन के जरिए प्रस्तावना में समाजवादी और पंथनरिपेक्ष शब्द जोड़े गए थे। तब केंद्र में इंदिरा गांधी की सरकार थी।

संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़े जाने को लेकर उन्होंने कहा कि इसे एक संकीर्ण सोच कहा जा सकता है। संशोधनों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि संशोधनों का होना अच्छा है, क्योंकि ये काफी मददगार साबित होते हैं। लेकिन जो राष्ट्रीय हित में नहीं हैं, वे किसी काम के नहीं हैं। उन्होंने कहा कि कभी-कभी हम अपनी जिद के कारण संशोधन लाते हैं।

 अपनी बात को पुख्ता करने के लिए हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने 1976 में संविधान में किए गए दो संशोधनों का जिक्र किया। पहला संविधान के 14वें चैप्टर में मौलिक कर्तव्यों को जोड़ना और प्रस्तावना में समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्द को जोड़ना। उन्होंने कहा कि ये बहुत अच्छे शब्द हैं, लेकिन हमें यह देखना होगा कि क्या इन संशोधनों की आवश्यकता थी या इन्हें सही जगह पर जोड़ा गया है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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