Wednesday, December 7, 2022

कानून मंत्री ने किया न्यायपालिका पर हमला, कॉलेजियम सिस्टम पर उठाये सवाल 

Follow us:

ज़रूर पढ़े

जस्टिस डी वाई चंद्रचूड के अगले चीफ जस्टिस बनाये जाने की घोषणा के साथ ही मोदी सरकार ने न्यायपालिका पर दबाव बनाने के लिए पेशबंदी के तहत हमला शुरू कर दिया है।केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा है कि न्यायपालिका की कार्यवाही पारदर्शी नहीं है। वहां बहुत राजनीति हो रही है। यह पॉलिटिक्स बाहर से दिखाई नहीं देती है, लेकिन यहां बहुत मतभेद हैं और कई बार गुटबाजी भी देखी जाती है। रिजिजू ने कहा कि अगर जज न्याय देने से हटकर एग्जीक्यूटिव का काम करेंगे तो हमें पूरी व्यवस्था का फिर से आकलन करना होगा।

किरेन रिजिजू ने 17 अक्टूबर को कहा कि देश के लोग कॉलेजियम सिस्टम से खुश नहीं हैं और भारत के संविधान की भावना के अनुसार जजों की नियुक्ति करना सरकार का काम है। उन्होंने कहा कि लोग नेताओं के बीच की राजनीति देख सकते हैं, लेकिन उन्हें नहीं पता कि जजों की नियुक्ति करते समय न्यायपालिका के अंदर चल रही राजनीति (कॉलेजियम की बैठकों के दौरान) गहन होती है। उन्होंने कहा कि प्रणाली पारदर्शी नहीं है। अब कौन कानून मंत्री को बताये कि कॉलेजियम सिस्टम में पिछले 6-7 साल से जितनी नियुक्तियां हुई हैं उनमें अधिकांश की पृष्ठभूमि देखी जाए तो वे संघ परिवार से ही जुड़े निकलेंगे। उदाहरण के लिए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में पिछले दिनों हुई जजों की 11 नियुक्तियों में कम से कम 7 संघ पृष्ठभूमि के हैं। यही हाल इलाहबाद हाईकोर्ट में हुई नियुक्तियों का है। बाकी हाईकोर्ट भी इससे अछूते नहीं हैं,जो चाहे सर्वे कराकर देख सकता है ।तत्कालीन चीफ जस्टिस रमना के समय बड़ी संख्या में संघ परिवार से ही जुड़े लोगों की नियुक्तियां विभिन्न हाईकोर्ट में हुई हैं।

दरअसल चीफ जस्टिस यूयू ललित के कार्यकाल में बाम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस दीपंकर दत्ता का नाम सुप्रीमकोर्ट के लिए कालेजियम ने प्रस्तावित किया था लेकिन सरकार ने अभी तक फाइल दबा रखी है। शेष चार रिक्तियों पर चार नामों को सर्कुलेशन द्वारा मंजूरी दिलाने का जस्टिस चन्द्रचूड और जस्टिस नजीर ने विरोध कर दिया इसलिए मामला लटक गया। अब जस्टिस चन्द्रचूड़ के चीफ जस्टिस के कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट में 18 नियुक्तियां होने वाली हैं। इसके अलावा हाईकोर्ट की नियुक्तियां भी हैं, तो विचारधारा विशेष लोगों का न्यायपालिका में प्रवेश थोड़ा मुश्किल नजर आ रहा है। इसलिए कानून मंत्री के निशाने पर न्यायपालिका आ गयी है।    

आरएसएस द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका ‘पांचजन्य’ द्वारा आयोजित ‘साबरमती संवाद’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय कानून मंत्री रिजिजू ने कहा कि उन्होंने देखा है कि आधा समय जज नियुक्तियों को तय करने में व्यस्त रहते हैं। इसके कारण उनका प्राथमिक काम है, जो न्याय दिलाना है वो प्रभावित होता है। उच्च न्यायपालिका में नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि साल 1993 तक, भारत में प्रत्येक न्यायाधीश को भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से कानून मंत्रालय द्वारा नियुक्त किया जाता था और इस प्रथा ने हमें बहुत कुछ दिया यानी कई प्रतिष्ठित जज दिए थे।

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने परामर्श [भारत के संविधान के अनुच्छेद 124 (2) में प्रदर्शित होने के रूप में] को सहमति के रूप में परिभाषित किया और आगे, 1998 में न्यायपालिका द्वारा कॉलेजियम प्रणाली का विस्तार किया गया। कानून मंत्री रिजिजू ने कहा कि मैं जानता हूं कि देश की जनता जजों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली से खुश नहीं है। अगर हम संविधान की भावना का पालन करते हैं, तो जजों की नियुक्ति सरकार का काम है। दूसरे, कहीं भी कोई ऐसी प्रथा नहीं है। भारत को छोड़कर दुनिया में न्यायाधीश स्वयं न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं। तीसरा, कानून मंत्री के रूप में, मैंने देखा है कि न्यायाधीशों का आधा समय यह तय करने में समाप्त होता है कि अगला न्यायाधीश कौन होगा। उनका प्राथमिक काम न्याय देना है।

केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने 17 अक्टूबर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की साप्ताहिक पत्रिका पांचजन्य द्वारा आयोजित ‘साबरमती संवाद’ कार्यक्रम में भाग लिया। इस दौरान उन्होंने सुप्रीम कोर्ट, कॉलेजियम सिस्टम, न्यायपालिका के कामकाज से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर बात की। सरकार के तीन अंगों, कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका को संविधान के अनुसार अपने पूर्व-निर्धारित डोमेन के भीतर काम करने की आवश्यकता पर बल देते हुए केंद्रीय कानून मंत्री रिजिजू ने कहा कि जब न्यायपालिका विचलित होती है तो पाठ्यक्रम सुधार के लिए कोई सिस्टम नहीं है और यह न्यायिक सक्रियता के बारे में चिंताओं को जन्म देता है।

उन्होंने सुझाव दिया कि न्यायपालिका को अपने स्वयं के इनर सिस्टम के साथ आना चाहिए, क्योंकि यह संसद (नैतिकता समिति) के लिए मौजूद है, ताकि व्यवहार से संबंधित मुद्दों और न्यायाधीशों के फैसले से निपट सके। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार जजों के व्यवहार को नियंत्रित करने वाले नियम-कायदे नहीं बनाना चाहती। उन्होंने कहा कि जब न्यायपालिका को अपनी सीमाओं के भीतर रखने के लिए कोई सिस्टम मौजूद नहीं है तो न्यायिक सक्रियता से संबंधित सवाल उठाए जाते हैं।

उन्होंने कहा कि पिछले 8 वर्षों में कार्यपालिका ने न्यायपालिका के कामकाज में किसी भी तरह से हस्तक्षेप नहीं किया, अन्यथा कार्यपालिका पर भी कार्यपालिका की सक्रियता का आरोप लगाया जा सकता है। हमने पिछले 8 वर्षों में न्यायपालिका को चुनौती नहीं दी। हम एनजेएसी [राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग] के साथ आए, जिसे सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चुनौती दी गई और इसे असंवैधानिक करार दिया गया। हम कुछ कदम उठा सकते हैं।

अदालत की सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों द्वारा की गई मौखिक टिप्पणियों के बारे में कानून मंत्री ने कहा कि उनका विचार है कि इस तरह की टिप्पणियां नहीं की जानी चाहिए और यदि न्यायाधीशों को अपनी सोच को रोशन करने के लिए ऐसी टिप्पणियां करनी हैं तो उन्हें उनके आदेश में ही शामिल करना होगा। उन्होंने कहा,कि कई न्यायाधीशों ने अवलोकन किया कि यह आदेश का हिस्सा नहीं है। जब भी मैं न्यायाधीशों के साथ बातचीत में शामिल होता हूं तो मैं उन्हें स्पष्ट रूप से बताता हूं कि अगर उन्हें कुछ कहना है तो उन्हें इसे उनके आदेश में लिखकर कहना चाहिए। यह मौखिक अवलोकन करने के बजाय बेहतर होगा।

कानून मंत्री ने कहा है कि न्यायपालिका की कार्यवाही पारदर्शी नहीं है। वहां बहुत राजनीति हो रही है। यह पॉलिटिक्स बाहर से दिखाई नहीं देती है, लेकिन यहां बहुत मतभेद हैं और कई बार गुटबाजी भी देखी जाती है। रिजिजू ने कहा कि अगर जज न्याय देने से हटकर एग्जीक्यूटिव का काम करेंगे तो हमें पूरी व्यवस्था का फिर से आकलन करना होगा।

इसी तरह रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सोमवार को कहा कि स्वतंत्र मीडिया, सोशल मीडिया, एनजीओ और न्यायपालिका का दुरुपयोग ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर खतरनाक और विभाजनकारी विचारों के प्रचार के लिए किया जा रहा हैं। गुजरात की राजधानी गांधीनगर में राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय (आरआरयू) में दूसरे दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए सिंह ने कहा कि यह देखना भी चुनौती है कि देश में अच्छी व्यवस्था को नष्ट करने के लिए क्या किया जा रहा है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

क्यों ज़रूरी है शाहीन बाग़ पर लिखी इस किताब को पढ़ना?

पत्रकार व लेखक भाषा सिंह की किताब ‘शाहीन बाग़: लोकतंत्र की नई करवट’, को पढ़ते हुए मेरे ज़हन में...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -