Monday, August 15, 2022

दक्षिण अफ्रीका में कोरोना का नया वेरिएंट आया सामने, वैज्ञानिकों ने कहा-डेल्टा के साथ मिलकर भारत में मचा सकता है तबाही

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दक्षिण अफ्रीका सहित तीन देशों में कोरोना वायरस का नया स्वरूप (वेरिएंट) आने के बाद भारतीय वैज्ञानिकों की चिंता तेजी से बढ़ गई है। जीनोम सीक्वेसिंग की निगरानी करने वाले इन्साकॉग का मानना है कि यह नया वेरिएंट बी.1.1.529 अगर डेल्टा से मिश्रित होता है, तो गंभीर संकट के हालात पैदा हो सकते हैं। 

नई दिल्ली स्थित काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) के इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (आईजीआईबी) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. विनोद स्कारिया का कहना है कि पहली बार वायरस में 32 बार म्यूटेशन हुआ है। वायरस की स्पाइक संरचना में ही सबसे अधिक बदलाव हुए हैं और उन्हीं की वजह से ब्रेक थ्रू इन्फेक्शन (वैक्सीन लेने या दोबारा संक्रमित होना) के मामले दर्ज़ किए जाते हैं

डॉ. स्कारिया का कहना है कि अब वेट एंड वॉच का समय जा चुका है। इस समय एक्ट (कार्य) का वक्त है। हमें सावधान रहने की ज़रूरत है। वैक्सीन और जन स्वास्थ्य से जुड़े उपायों को तत्काल पूरी सतर्कता के साथ शुरू करना जरूरी है। हालांकि इस वेरिएंट के बारे में और अधिक जानकारी के लिए कुछ दिन का इंतजार करना होगा। दक्षिण अफ्रीका सहित अन्य देशों के वैज्ञानिक भी इसके अध्ययन में जुटे हैं।

सीएसआईआर-इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (आईजीआईबी) के वैज्ञानिक विनोद स्कारिया ने कहा है कि भारत के पास दो साल पहले की तुलना में अब बेहतर उपकरण हैं। उन्होंने कहा कि हालांकि, देश को अपने टीकाकरण अभियान, सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों, स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे और जीनोमिक निगरानी को बेहतर ढंग से तैयार करने के लिए सुधार करना होगा।

समय मूल्यवान था और हम इसे खोने का जोखिम नहीं उठा सकते, उन्होंने समझाया कि भारत के पास मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग और वेंटिलेशन, वैक्सीन और सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय सबसे अच्छे उपकरण थे। दुर्भाग्य से, टीकों की वैश्विक असमानता थी। 

डॉ स्कारिया ने आगे कहा कि “हमें अपने कीमती समय का उपयोग सभी पात्र लोगों को वैक्सीन की दोनों खुराक देने में करना है। 45+ आयु वर्ग में गैर-टीकाकरण और दूसरी खुराक में अंतर को कम करने से COVID-19 मौतों को कम करने का एक अनूठा अवसर मिल सकता है।

डॉ. स्कारिया ने कहा कि बूस्टर डोज मदद नहीं करेंगे जब दुनिया के एक बड़े हिस्से को एक भी खुराक़ नहीं मिली है।

विशेषज्ञों के अनुसार, दक्षिण अफ्रीका का नया संस्करण महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें बड़ी संख्या में उत्परिवर्तन हुये हैं, जिसमें स्पाइक प्रोटीन में लगभग 32 म्युटेशन हुये हैं, जिनमें से कुछ स्वतंत्र रूप से प्रतिरक्षा से बचने के साथ-साथ बढ़ी हुई संप्रेषणीयता से जुड़े हैं।

उन्होंने आगे कहा कि हालांकि इस तरह के उत्परिवर्तन के योगात्मक व्यवहार की सटीक भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है, यह केंद्रित जांच को दिशा दे सकता है।

उन्होंने कहा कि नया वेरियंट विशेष रूप से भारत जैसे देश के लिए चिंता का विषय है, जो कि घनी आबादी वाला है, अतिसंवेदनशील आबादी के बीच संचरण अधिक गति से हो सकता है।

यशोदा हॉस्पिटल्स, हैदराबाद के कंसल्टेंट, इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजी एंड स्लीप मेडिसिन, विश्वेश्वरन बालासुब्रमण्यम ने कहा, हालांकि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों को तीसरी लहर की संभावना का सामना करने के लिए तैयारी किया गया है, लेकिन उच्च ट्रांसमिसिबिलिटी वाले वायरल वेरिएंट भारत में जनसंख्या के बरक्श मौजूदा हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी दबाव डाल सकते हैं। 

उन्होंने आगे कहा कि “इसके अलावा, बच्चों का अभी भी टीकाकरण नहीं हुआ है और कई वयस्कों को अभी तक टीका की दूसरी खुराक प्राप्त नहीं हुई है, इस समय एक उत्परिवर्ती संस्करण इन अतिसंवेदनशील आबादी में तेजी से संचरण और बीमारी की गंभीरता में वृद्धि कर सकता है। 

डॉक्टर यह भी समझाते हैं कि उत्परिवर्तन अपरिहार्य होने के साथ, लंबी अवधि की तैयारी और COVID-19 महामारी के साथ जीने के लिए रणनीतिक योजना आवश्यक है।

डॉ बालासुब्रमण्यम ने आगे कहा कि -“व्यक्तिगत स्तर पर, सामाजिक समारोहों से बचने या सीमित करने, सार्वजनिक स्थानों पर मास्क पहनने और यहां तक कि अतिसंवेदनशील आबादी वाले घरों में घर के अंदर और हाथ सेनिटेशन तकनीकों का पालन करने जैसे महामारी के मानदंडों का पालन किया जाना चाहिए।

एचसीएमसीटी मणिपाल अस्पताल के संक्रामक रोग विभाग की अंकिता वैद्य ने कहा है कि – “भारत 100 करोड़ से अधिक टीकाकरण की खुराक देने में सफल रहा है, जो कि विशाल आबादी के मामले में एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन ज्यादातर ये एकल खुराक हैं न कि टीकाकरण की पूरी दो खुराकें। जो नए स्ट्रेन से लड़ने में प्रभावी हो सकती हैं, यदि यह भारत में नये स्ट्रेन का संक्रमण फैलता है तो। 

डॉ. वैद्य ने कहा कि वायरस उत्परिवर्तित होते हैं और इससे निपटने और इलाज के लिए स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और तैयार रहने का एकमात्र तरीका यह है कि – “हमें अपनी जीवन शैली के हिस्से के रूप में संक्रमण नियंत्रण दिशानिर्देशों और COVID-19 उपयुक्त व्यवहार का सख्ती से पालन करना चाहिए।

नई दिल्ली स्थित भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. ललित कुमार का मानना है कि भारत में पहले से ही 69 फीसदी से अधिक गंभीर वेरिएंट की मौजूदगी है। इसमें सबसे अधिक डेल्टा ही हैं। ऐसे में अगर यह नया वेरिएंट भारत में प्रवेश करता है तो डेल्टा के साथ इसका मिश्रण कैसा होगा। यह विज्ञान भी अब तक नहीं जान पाया है।

इन्साकॉग के अनुसार, भारत में अब तक 1.15 लाख सैंपल की जीनोम सीक्वेंसिंग पूरी हो चुकी है। इनमें से 45394 सैंपल में गंभीर वेरिएंट मिले हैं। डेल्टा के 28880 मामले मिल चुके हैं। डेल्टा वेरिएंट में ही 25 बार म्यूटेशन हो चुका है और इन म्यूटेशन की पहचान अब तक 6611 सैंपल में सामने आए हैं।

नए वेरिएंट को लेकर कल शुक्रवार को हुई वैज्ञानिकों की उच्च स्तरीय बैठक के बाद एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने कहा कि अभी होम क्वारंटीन पर सबसे अधिक जोर दिया जा रहा है लेकिन इन तीन देश के अलावा संदिग्ध मरीजों को हवाईअड्डे पर ही क्वारंटीन सेवा मिलनी चाहिए, ताकि नए वेरिएंट के प्रवेश को लेकर किसी भी तरह की आशंका नहीं रह सके। उन्होंने कहा कि बीते 20 महीने का अनुभव देश को मिल चुका है और संदिग्ध मरीजों को क्वारंटीन के लिए सख्ती बरतना जरूरी है। ताकि संक्रमण का स्रोत लापता न हो सके।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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