Wednesday, August 17, 2022

सुप्रीम कोर्ट से तो हट गयीं लेकिन ट्रिब्यूनल की आधिकारिक वेबसाइटों पर अभी भी हैं पीएम मोदी की तस्वीरें

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उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) को आधिकारिक अदालत के मेल से पीएम मोदी की तस्वीरें और केंद्र सरकार के बैनर को हटाने का निर्देश जारी किया। कोर्ट के निर्देश के बाद एनआईसी ने अब आधिकारिक मेल के फुटर में उच्चतम न्यायालय की तस्वीर लगा दी है। ऐसा लगता है कि कई न्यायाधिकरणों और अर्ध-न्यायिक निकायों ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए संदेश का पालन नहीं किया है। केंद्र के लिए बधाई संदेशों के साथ प्रधानमंत्री की तस्वीरें अभी भी कई ट्रिब्यूनल की आधिकारिक वेबसाइटों में दिखाई दे रही हैं, जिससे यह आभास होता है कि पृथक्करण शक्तियों की रेखाएं धुंधली हैं।

लाइव लॉ ने अपने पोर्टल पर 25 सितंबर, 2021 को सुबह 11.39 बजे से 11.48 बजे के स्क्रीनशॉट डाल कर रिपोर्ट प्रकाशित की है कि राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर एक मूविंग बैनर है जिसमें सभी को मुफ्त टीके उपलब्ध कराने के लिए हिंदी और अंग्रेजी दोनों में “थैंक यू पीएम मोदी” लिखा है। आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (आईटीएटी) की आधिकारिक वेबसाइट ,केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण की आधिकारिक वेबसाइट, अपीलीय न्यायाधिकरण अपीलेट ट्रिब्यूनल फॉर इलेक्ट्रिसिटी की आधिकारिक वेबसाइट,भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग सीसीआई की आधिकारिक वेबसाइट ,नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल सीसीआई की आधिकारिक वेबसाइट में मोदी की तस्वीरें और केंद्र सरकार के बैनर अभी भी मौजूद हैं।

यह निश्चित रूप से न्यायिक स्वतंत्रता की धारणा को विचलित करता है। इन ट्रिब्यूनलों की आधिकारिक साइटों का रखरखाव एनआईसी द्वारा किया जाता है। इस संबंध में, यह नोट करना प्रासंगिक है कि उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में ट्रिब्यूनल के कामकाज पर गंभीरता से ध्यान दिया है, जो बढ़ते बकाया और खाली रिक्तियों से प्रभावित हैं। न्यायालय ट्रिब्यूनल की स्वतंत्रता को बढ़ाने के लिए अपने विभिन्न निर्देशों का पालन नहीं करने के लिए केंद्र सरकार के खिलाफ गंभीर आलोचनात्मक टिप्पणी कर रहा है। न्यायालय ने संबंधित मंत्रालयों के नियंत्रण से अधिकरणों को मुक्त करने के लिए एक राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन का निर्देश दिया है।

18 साल की उम्र तक अमान्य घोषित ना हो तो नाबालिग ‌का विवाह वैध

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि यदि किसी लड़की ने 18 वर्ष की उम्र से पहले शादी की है तो भी वह तलाक की डिक्री के जरिए अलग होने की मांग कर सकती है, यदि वयस्क होने तक उसके विवाह को हिंदू विवाह अधिनियम (एचएमए) के तहत शून्य घोषित नहीं किया गया था।

जस्टिस रितु बाहरी और जस्टिस अरुंग मोंगा की खंडपीठ ने कहा कि इस प्रकार के विवाह को एचएमए की धारा 13(2)(iv)के तहत अमान्य घोषित नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह प्रावधान उस लड़की पर लागू होता है, जिसकी शादी पन्द्रह वर्ष की उम्र से पहले हुई है।खंडपीठ ने कहा है कि यदि 18 साल से कम उम्र की लड़की या 21 साल से कम उम्र के लड़के का विवाह हुआ है तो यह शून्य विवाह नहीं होगा बल्कि शून्य करणीय विवाह होगा, जो इस प्रकार के “बच्चे”, बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 की धारा 2 (ए) के अर्थ के भीतर, की ओर से कोई कदम नहीं उठाए जाने पर वैध हो जाएगा।

खंडपीठ ने कहा कि धारा 13 (2) (iv) के तहत शून्यता के लिए एक याचिका दायर की जा सकती है, यदि पत्नी की शादी 15 साल की उम्र में हो गई थी और वह 18 साल की उम्र से पहले शादी के विघटन के लिए याचिका दायर कर सकती थी।

आईटी नियमों के तहत ट्विटर अधिकारियों की नियुक्ति

केंद्र ने दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि ट्विटर ने नए आईटी नियमों का अनुपालन करते हुए मुख्य अनुपालन अधिकारी, निवासी शिकायत अधिकारी और नोडल संपर्क व्यक्ति की नियुक्ति कर दी है। हाईकोर्ट अमेरिका स्थित माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर द्वारा आईटी नियमों का अनुपालन न किए जाने का आरोप लगाने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही है।

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने एक संक्षिप्त हलफनामे में कहा कि ट्विटर ने कहा है कि इन कर्मचारियों (सीसीओ, नोडल संपर्क अधिकारी और आरजीओ) की नियुक्ति कंपनी के कर्मचारियों के तौर पर की गई है, न कि ‘अस्थायी कर्मचारी’के तौर पर। ट्विटर ने उक्त नियुक्त किए गए कर्मचारियों और उनके पदों के नाम उपलब्ध कराए हैं। ट्विटर के हलफनामे में कहा गया है कि इनकी नौकरी चार अगस्त 2021 को शुरू हुई। ट्विटर ने ऐसी नियुक्तियों के सबूत के तौर पर हलफनामे के साथ उनके अनुबंधों को भी संलग्न किया है। अदालत ने 10 अगस्त को केंद्र को ट्विटर के हलफनामे के जवाब में एक संक्षिप्त हलफनामा दायर करने के निर्देश दिए थे।

स्टरलाइट संयंत्र के विरोध में प्रदर्शन करना मौलिक अधिकार

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ के जस्टिस एम दुरईस्वामी और जस्टिस के. मुरलीशंकर ने एक हालिया आदेश में कहा है कि एक शख्स सरकार के खिलाफ गतिविधियों में शामिल होने और एक शख्स सरकार की नीतियों का विरोध करने में बहुत बड़ा अंतर है। मदुरै पीठ ने तर्क दिया कि पर्यावरण के संरक्षण में राज्य का कर्तव्य मूल रूप से लोगों का अधिकार है। पीठ ने भाग IV-ए (मौलिक कर्तव्य) के अनुच्छेद 51-ए (जी) का हवाला दिया, जो जंगल, झील, नदी और वन्यजीव सहित पर्यावरण की रक्षा और उसमें सुधार से संबंधित है। पीठ ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि तूतुकुडी घटना के बाद दर्ज 88 एफआईआर के संबंध में सीबीआई द्वारा दायर चार्जशीट में याचिकाकर्ता आरोपी नहीं है।

अदालत ने एक लॉ ग्रेजुएट छात्र के. शिवा की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह बात कही। जब शिवा ने बार काउंसिल ऑफ तमिलनाडु और पॉन्डिचेरी के सदस्य के रूप में आवेदन करने की कोशिश की तो उन्हें बताया गया कि उन्हें अनुमति नहीं दी जाएगी।

शिवा के खिलाफ पुलिस की वेरिफिकेशन रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि उनके खिलाफ 2017 से 2019 के बीच 88 आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें से अधिकतर मामले 22 मई 2019 में तूतुकुडी में हुए प्रदर्शनों के बाद दर्ज हुए है, जिनमें वेदांता के स्टरलाइट कॉपर प्लांट को बंद करने की मांग की गई थी, क्योंकि इस संयंत्र की वजह से हवा और पानी दूषित हुआ है और यह लोगों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इन प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की फायरिंग में 13 लोगों की मौत हुई थी। इन प्रदर्शनों के बाद तमिलनाडु सरकार ने इस संयंत्र को बंद करने का आदेश दिया था।

कलकत्ता हाईकोर्ट का भवानीपुर उपचुनाव में तेजी लाने के लिए चुनाव आयोग से सवाल

कलकत्ता हाईकोर्ट ने शुक्रवार को भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र के उपचुनावों को प्राथमिकता देने के चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (पीआईएल) में भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) द्वारा दायर हलफनामे को रिकॉर्ड में लेने से इनकार कर दिया। भवानीपुर विधानसभा सीट पर 30 सितंबर को मतदान होना है, और इस सीट पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव लड़ रही हैं। इस संबंध में चुनाव आयोग ने छह सितंबर को एक अधिसूचना जारी की थी। इस अधिसूचना में कहा गया था कि 159-भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र के लिए उपचुनाव 30 सितंबर को आयोजित किया जाएगा। इसमें उपचुनाव कराने के लिए मुख्य सचिव, पश्चिम बंगाल सरकार से प्राप्त विशेष अनुरोध को रेखांकित किया गया था।

मुख्य सचिव ने चुनाव आयोग को संबोधित पत्र में उल्लेख किया था कि अगर भवानीपुर में उपचुनाव तत्काल आधार पर नहीं हुए तो एक ‘संवैधानिक संकट’ होगा। अदालत ने गुरुवार को चुनाव आयोग को याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए तर्कों के मद्देनजर छह सितंबर को जारी अधिसूचना की सामग्री के संबंध में एक हलफनामा दायर करने की अनुमति दी थी।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति राजर्षि भारद्वाज की खंडपीठ ने शुक्रवार को गलत प्रारूप में हलफनामा दाखिल करने के लिए चुनाव आयोग की जमकर खिंचाई की और यह भी कहा कि हलफनामे में उठाए गए मुद्दों से संबंधित कोई विशेष तथ्य नहीं थे। एसीजे बिंदल ने टिप्पणी की कि हलफनामे में कुछ भी उल्लेख नहीं किया गया है, इसे किसने दायर किया? हम इसे रिकॉर्ड में नहीं ले सकते।

खंडपीठ ने इस मुद्दे पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया कि क्या चुनाव आयोग किसी विशेष निर्वाचन क्षेत्र के उपचुनाव चुनावों में तेजी लाने के लिए मुख्य सचिव द्वारा दिए गए प्रतिनिधित्व पर कार्रवाई कर सकता है। हालांकि, खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि वह इस मामले को किसी अन्य तारीख पर सूचीबद्ध करेगी ताकि प्रस्तुतियां सुनने के लिए कि क्या किसी विशेष राजनीतिक नेता के जानबूझकर इस्तीफे के बाद उप-चुनाव कराने के लिए सार्वजनिक धन का उपयोग किया जा सकता है।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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