Tuesday, January 31, 2023

सिख इतिहास का एक गौरवशाली पन्ना मलेरकोटला के मुस्लिम नवाब शेर मोहम्मद खान

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पंजाब के फतेहगढ़ साहिब जिले में स्थापित विशाल गुरुद्वारे में दिसंबर महीने के इन दिनों देश-विदेश से बड़ी तादाद में श्रद्धालु सिख और अन्य समुदाय से वाबस्ता लोग आते हैं। रपट की शुरुआत करते हैं, गुरुद्वारे के मुख्य द्वार पर लगी तस्वीरों में से एक तस्वीर से। यह तस्वीर एक ‘मुसलमान’ की है, जी हां! उस मुसलमान की जिसे सिख समुदाय और इतिहास में बेहद आदर हासिल है। इस तस्वीर में नजर आने वाला चेहरा मलेरकोटला के 1704 ईस्वी में नवाब रहे शेर मोहम्मद खान का है। आने वाले लोग इस तस्वीर के आगे भी नतमस्तक होते हैं और अपने-अपने ढंग से शुकराना अदा करते हैं।

शेर मोहम्मद खान की बदौलत मलेरकोटला का नाम दुनिया भर में सिख इतिहास पर लिखी गई बेशुमार भाषाओं की किताबों में बाकायदा पूरे तथ्यों के साथ शुमार है। 1947 में भारत-पाक विभाजन हुआ तो दोनों तरफ के पंजाब में हुए नरसंहार में 10 लाख से ज्यादा हिंदू/सिख–मुस्लिम मारे गए और इससे दुगुनी संख्या में पलायन हुआ। भारतीय पंजाब भी पूरी तरह से खून-खराबे की जद में रहा। सिवाय मलेरकोटला के- पूरे सूबे में जबरदस्त मारकाट और हिजरत हुई। इतिहास के इस काले पन्ने की क्रूरतम कहानियां  रुला देने वाली हैं। लेकिन ऐतिहासिक अपवाद है कि मलेरकोटला में रत्तीभर भी हिंसा नहीं हुई और इस पूरी तरह से मुस्लिम बाहुल्य इलाके से एक भी परिवार ने पलायन नहीं किया।

खुद सिखों और हिंदुओं ने शहर की चौतरफा घेराबंदी करके इसकी हिफाजत की। यह क्यों और कैसे संभव हुआ? इसके पीछे की कहानी इन दिनों सिखों के चल रहे ‘शोक सप्ताह’ से जुड़ी हुई है। मलेरकोटला के नवाब शेर मोहम्मद खान इसके महानायक हैं। जिन्हें व्यक्तिगत तौर पर दशम गुरु गोविंद सिंह का आशीर्वाद और सराहना हासिल हुई। गुरु गोविंद सिंह के अंतिम दिनों के काल से चली आ रही, नवाब को शहीदी हफ्ते में अतिरिक्त मान–सम्मान देने की रिवायत आज भी विधिवत कायम है।   

दशम गुरु गोविंद सिंह का पूरा परिवार कुर्बानियों की जिंदा मिसाल है। हिंदुओं की हिफाजत के लिए दशम गुरु के पिता गुरु तेग बहादुर साहिब ने अपना शीश कटवा कर बेमिसाल कुर्बानी दी। उन्हीं के जज्बे का असर गुरु गोविंद सिंह जी पर और आगे उनके परिवार पर पड़ा। यह जज्बा था, हर किस्म की जुल्मत के खिलाफ खड़े होना और लड़ना! इसी सिलसिले में गुरु गोविंद सिंह जी अतिवादी मुगल शासकों से टकराए। मुगलिया जुल्मत के खिलाफ  तार्किक होकर अस्त्र-शस्त्र उठाए।             

1704 ईस्वी में गुरु गोविंद सिंह जी ने मुगलों के खिलाफ एक क़िस्म का निर्णायक युद्ध लड़ा। इस युद्ध में उनका पूरा परिवार कुर्बान हो गया। उस पूरी गौरव गाथा पर बेहिसाब किताबें और लफ्ज़ लिखे जा सकते हैं, लिखे गए हैं। यहां मुख्तसर कहानी प्रस्तुत करना मुनासिब और प्रसांगिक रहेगा।                                 

गुरु गोविंद सिंह और उनकी फौज से लड़ाई के बीच सरहिंद के सूबेदार वजीर खान ने गुरुजी के दो छोटे साहिबजादों जोरावर सिंह और फतेह सिंह को गिरफ्तार कर लिया। उस वक्त की निजाम व्यवस्था के तहत उन पर त्वरित मुकदमा चलाया गया। रोज कचहरी इस बाबत लगती थी। सूबेदार ने साहबजादे जोरावर सिंह और फतेह सिंह को हुक्म दिया कि अगर वे इस्लाम कुबूल कर लें तो उनकी रिहाई संभव है। वरना उन्हें बर्बर तरीके से सजा-ए-मौत दी जाएगी। खचाखच भरी कचहरी में जब यह फरमान सूबेदार की ओर से बार-बार दोहराया गया तो गुरु गोविंद सिंह जी के साहबजादों ने लगातार ऐसा करने से साफ इनकार किया और अपने दादा गुरु तेग बहादुर साहिब के रास्ते को अख्तियार करने की बात कही। धर्म परिवर्तन की बजाए उन्हें मौत मंजूर थी।

जिस कचहरी में यह फैसला सरहिंद के सूबेदार वजीर खान ने सुनाया, उसमें मलेरकोटला के तत्कालीन नवाब शेर मोहम्मद खान भी हाजिर थे। उन्होंने जोरदार तरीके से इसके खिलाफ आवाज बुलंद की और कहा कि गुरु के साहिबजादों के साथ ऐसा सुलूक कतई नहीं किया जाना चाहिए। यह सरासर इस्लाम और मानवविरोधी है। नवाब ने जब ये दलीले दीं तो अन्य लोग हतप्रभ थे। इसलिए भी कि सूबेदार के खिलाफ बोलने की हिम्मत, साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह के अलावा किसी में नहीं थी। लेकिन पूरी प्रतिबद्धता के साथ मलेरकोटला नवाब शेर मोहम्मद खान ने खिलाफत की आवाज बुलंद की। सिख इसे “हा दा नारा” कहते हैं। यानी अन्याय के खिलाफ और न्याय के पक्ष में खड़े होना।

नवाब से गुस्साए सूबेदार ने शेर मोहम्मद खान को आक्रमक भाषा में याद दिलाया कि कैसे सिख फौज के साथ हुई जंग में नवाब का सगा भाई मारा गया था। नवाब ने जवाबी तर्क रखा कि वह दो सेनाओं की लड़ाई थी। सैनिक जब लड़ने के लिए आमने-सामने होते हैं तो दोनों तरफ के लोग मारे जाते हैं। उसका भाई भी ऐसे ही लड़ते हुए मारा गया लेकिन इसमें इन बाल-मासूम बच्चों का क्या कुसूर है?

मलेरकोटला के नवाब मोहम्मद शेर खान ने सूबेदार वजीर खान से कहा कि मैं जंग का बदला मैदान-ए-जंग में लूंगा। इन नन्हें बच्चों को बेरहमी के साथ मारकर हरगिज नहीं! यह सरासर इस्लाम के खिलाफ उठाया गया खुदाविरोधी कदम है, मैं इसकी खिलाफत करता हूं। यह इकलौती आवाज थी जो गुरु के साहिबजादों को दी गई सजा-ए-मौत के खिलाफ बेहद बेबाकी के साथ उठी। बेशक नवाब मोहम्मद शेर खान इसके अंजाम से बखूबी वाकिफ थे। (यह इतिहासकारों अथवा जानकारों का मत है)। नवाब की एक न सुनते हुए सूबेदार वजीर खान ने सजा बरकरार रखी और फैसले में कहा कि दोनों साहिबजादों को दीवारों में जिंदा चिनवा दिया जाए। अंतिम फैसला सुनकर मलेरकोटला के नवाब “हा दा नारा” लगाते हुए तथा सूबेदार की कचहरी का बहिष्कार करते हुए वहां से चले गए। प्रसंगवश, उन्होंने इसके विरोध में मुगल बादशाह औरंगजेब को ऐतराज़ भरा लंबा खत भी लिखा था। इसमें उन्होंने जोर देकर लिखा कि छोटे साहिबजादे बेकसूर हैं और उन को दी गई सजा कुरान की शिक्षाओं और इस्लाम के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।                           

नवाब शेर मोहम्मद खान का “हा दा नारा” सिख कौम के लिए एक अमर नारा बन गया। उधर, पूरे घटनाक्रम में शेर मोहम्मद खान की मानवीय सरोकारों और अपने मजहब के असली मूल आधारों के पक्ष में खड़े होने की हिम्मत की जानकारी दशम गुरु गोविंद सिंह जी को हुई तो उन्होंने खत लिखकर मलेरकोटला के नवाब शेर मोहम्मद खान के प्रति आभार व्यक्त किया। कतिपय सिख विद्वानों का कहना है कि दशम गुरु ने लिखित में नवाब को आश्वस्त किया कि अब के बाद कभी भी  सिख फौज मलेरकोटला की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखेगी। बल्कि जरूरत पड़ने पर हिफाजत करेगी।

खत लिखने का वक्त वह था, जब इतिहास की सबसे क्रूरतम घटना को जालिमों ने अंजाम दिया। साहिबजादों जोरावर सिंह और फतेह सिंह को जिंदा दीवारों में (जल्लादों के हाथों) चिनवा दिया गया। दुनिया भर में ऐसी कोई दूसरी मिसाल नहीं। यह खबर सुनकर गुरु गोविंद सिंह की माता गुजरी देवी (जिन्हें बाद में गुजर कौर का नाम दिया गया) ने भी प्राण त्याग दिए। इस वाकये से सख्त से सख्त रूहें भी कांप गईं लेकिन जुल्म के खिलाफ जंग लड़ रहे गुरु गोविंद सिंह जी अटल रहे। जंग-ए-मैदान में डटे रहे।                                         

उनके फरमान का सदैव पालन किया गया कि मलेरकोटला कभी आंच नहीं आनी चाहिए। सन् 1783 ईस्वी में सरदार जस्सा सिंह अहलूवालिया और सरदार बघेल सिंह की अगुवाई में सिख साम्राज्य का विस्तार दिल्ली से लेकर कैथल, करनाल, दर्रा खेबर तक हुआ लेकिन मलेरकोटला आजाद रहा। यह श्रेय नवाब मोहम्मद शेर अली खान को हासिल है। सिख समुदाय आज भी नवाब के अहसान को सजदा करता है।    यही वजह है कि 1947 में, बंटवारे के वक्त एक भी मुसलमान परिवार मलेरकोटला से हिजरत करके पाकिस्तान नहीं गया और इस शहर को सिख और हिंदुओं ने भारी नाकेबंदी करके महफूज रखा।

मलेरकोटला के नवाब शेर मोहम्मद खान की यादगार और “हा दे नारे” को सदा के लिए अमर बनाए रखने के लिए सिख कौम ने साहिबजादों के शहीदी स्थल पर बने गुरुद्वारा फतेहगढ़ साहिब के मुख्य द्वार का नाम नवाब शेर मोहम्मद खान पर है। यह सिख-हिंदू-मुसलमान एकता की विश्वस्तरीय मिसाल है। जाहिरन एक निराली और अद्भुत मिसाल! सिख इतिहास में जहां भी दशम पिता के परिवार की बेमिसाल कुर्बानियों का जिक्र आता है, वहां मलेरकोटला के नवाब शेर मोहम्मद खान को भी अपरिहार्य तौर पर पूरे एहतराम के साथ याद किया जाता है। विदेशों में भी नवाब की यादगारें कायम हैं।                             

स्वतंत्रता के पहले मलेरकोटला तहसील मुख्यालय था और बाद में पूर्ववर्ती कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार ने 7 जून 2021 को इसे जिला बना दिया। तत्कालीन पंजाब सरकार के इस फैसले का भाजपा ने विरोध किया था (बाद में कैप्टन अमरिंदर सिंह जिसका हिस्सा हो गए)। मलेरकोटला जिस दिन जिला बनाया गया, उस दिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बाकायदा ट्वीट करके आलोचना की थी और इसे कांग्रेस का ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ कहा था। गौरतलब है कि मलेरकोटला का नाम और इस रियासत की नींव 1454 ईस्वी में सूफी शेख सदरूद्दीन सदर-ए-जहां ने रखी थी। शेख सदरूद्दीन का सबसे लोकप्रिय नाम हैदर शेख है और समूचे पंजाब में उनके नाम पर दरगाहें बनी हुईं हैं। पाकिस्तान में भी मुसलमानों के साथ-साथ हिंदू और सिख भी उनमें श्रद्धा रखते हैं। हैदर शेख अफगानिस्तान के दरबन इलाके के रहने वाले शेरवानी अफगान थे।                       

मलेरकोटला में कुल 22 शासकों की नवाबी रही है। तमाम के तमाम धर्मनिरपेक्षता के लिए भी जाने जाते थे। मलेरकोटला की एक और बड़ी उपलब्धि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उसकी सक्रिय व अहम भूमिका की भी है। यही वह जगह है यहां 66 नामधारी सिखों को अंग्रेज हुक्मरानों ने तोपों से उड़ा दिया था। इनमें 12 साल का एक बच्चा भी था जो गुरु गोविंद सिंह जी के शहीद साहिबजादों की कुर्बानी से प्रेरित एवं प्रभावित था।                                 

गौरतलब है कि मलेरकोटला की आबादी का 60 फ़ीसदी हिस्सा मुस्लिम है। शेष हिंदू और सिख हैं। मलेरकोटला के मुसलमानों ने दिल्ली में चले किसान संघर्ष में बड़ी तादाद में शिरकत की थी। मुसलमानों, सिखों हिंदुओं को एक साथ हैदर शेख का मेला, रमजान का उपवास, दिवाली-दशहरा, गुरु पर्व, ईद और बकरीद एकसाथ-एकजुट होकर मनाते देखना हो तो मलेरकोटला आइए। यहां की मिट्टी में आपको अमन तथा सद्भाव के साथ-साथ नवाब शेर मोहम्मद खान के “हा दा नारा” वाले किस्से भी मिलेंगे! सच्चे किस्से!! जिन्हें लोकगीतों में भी गाया जाता है। सिख ढाडी तो वीर रस की वारों में इन्हें गाते ही हैं। वीर रस की पंजाबी कविता में भी नवाब शेर मोहम्मद खान को अहम मुकाम हासिल है।

(अमरीक वरिष्ठ पत्रकार हैं पंजाब के जालंधर में रहते हैं।)  

                                 

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