Friday, August 12, 2022

संयुक्त किसान मोर्चे का अखिल भारतीय सम्मेलन सिंघु बॉर्डर पर शुरू

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नई दिल्ली। संयुक्त किसान मोर्चा का पहला अखिल भारतीय सम्मेलन आज सिंघु बॉर्डर पर शुरू हुआ। यह सम्मेलन किसान आंदोलन के विस्तार और मजबूत बनाने पर केंद्रित है। ऐतिहासिक सम्मेलन में शामिल होने के लिए 22 राज्यों के प्रतिनिधि पहुंचे। आज सम्मेलन के  दूसरे सत्र में श्रमिकों पर थोपे गए 4 लेबर कोड रद्द करने एवं अन्य समस्याओं को लेकर  देश के अनेक श्रमिक संगठनों के नेताओं ने सम्मेलन को संबोधित किया। सम्मेलन में 2500 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस ऐतिहासिक सम्मेलन में 300 से अधिक किसान और कृषि श्रमिक संगठनों, 18 अखिल भारतीय ट्रेड यूनियनों, 9 महिला संगठनों और 17 छात्र और युवा संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं। बलबीर सिंह राजेवाल, डॉ दर्शन पाल, गुरनाम सिंह चढूनी, हन्नान मोल्ला, जगजीत सिंह डल्लेवाल, जोगिंदर सिंह उगराहां, शिवकुमार शर्मा (कक्का जी), युद्धवीर सिंह, योगेंद्र यादव आदि शामिल हुये। 

सम्मेलन का उद्घाटन भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) नेता राकेश टिकैत ने किया। उन्होंने सभी प्रतिनिधियों का स्वागत किया और सभी मांगों को पूरा होने तक शांतिपूर्ण विरोध जारी रखने के किसानों के संकल्प की पुष्टि की। इसके बाद किसान आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए शोक प्रस्ताव रखा गया। 

सम्मेलन की आयोजन समिति के संयोजक डॉ. आशीष मित्तल ने प्रतिनिधियों के सामने प्रस्तावों का मसौदा रखा, जिसमें लोगों से देश भर में चल रहे संघर्ष को तेज करने और विस्तार करने का आह्वान किया गया ताकि मोदी सरकार को 3 कृषि विरोधी कानूनों को निरस्त करने के लिए मजबूर किया जा सके, और  एमएसपी की कानूनी गारंटी दे। आज के अधिवेशन में 3 सत्र थे – पहला सीधे तौर पर 3 काले कानूनों से संबंधित, दूसरा औद्योगिक श्रमिकों को समर्पित और तीसरा कृषि श्रमिकों, ग्रामीण गरीबों और आदिवासी मुद्दों से संबंधित था। 

सभी तीन सत्रों में वक्ताओं ने किसानों, मजदूरों, महिला किसानों, कृषि श्रमिकों, आदिवासियों और आम लोगों को शामिल करते हुए, आंदोलन को व्यापक और विस्तारित करने के लिए जोरदार ढंग से अपने सुझाव दिए, जिससे किसान आंदोलन का दायरा बढ़े ताकि यह एक अखिल भारतीय आंदोलन बन सके। प्रत्येक सत्र में 15 वक्ताओं ने विचार-विमर्श किया और योगदान दिया, कन्वेंशन में रखे गए संकल्प को समृद्ध किया। वक्ताओं ने किसानों के आंदोलन से कृषक समुदायों में आए गहरे परिवर्तनों और लंबे विरोध के कारण अनुभव किए जा रहे कई सकारात्मक परिणामों पर जोर दिया। नेताओं ने किसान तीन कॉर्पोरेट-समर्थक, किसान-विरोधी केंद्रीय कानूनों को पूरी तरह से निरस्त करने पर क्यों जोर दे रहे हैं, और  संशोधनों के साथ छेड़छाड़ करने से क्यों काम नहीं चलेगा उसका तर्क विस्तार से बताया दो दिवसीय सम्मेलन की कार्यवाही कल भी जारी रहेगी।

केंद्र सरकार द्वारा घोषित गन्ना के मूल्य में वृद्धि किसानों का अपमान है केंद्र सरकार ने कल गन्ने के लिए “अब तक का सबसे अधिक” ‘उचित और लाभकारी मूल्य’ (FRP) की घोषणा की। चीनी सीजन 2021-22 के लिए चीनी मिलों द्वारा अनिवार्य रूप से ₹290 प्रति क्विंटल है। यह उल्लेखनीय है कि वास्तविक वृद्धि मात्र पांच रुपये प्रति क्विंटल है, और जब तक कोई सरकार वास्तव में एक सीजन से दूसरे सीजन में कीमत कम नहीं करती है, तब तक यह हमेशा “अब तक का सबसे अधिक” ही होगा! 

संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा, “यह बढ़ोत्तरी स्पष्ट रूप से देश के गन्ना किसानों का अपमान है”। एक ओर, सीएसीपी और केंद्र सरकार सलाह देती है कि गन्ने के एसएपी (राज्य सलाह मूल्य/SAP) को राज्यों में अलग-अलग तरीके से नहीं बढ़ाया जाना चाहिए, और दूसरी ओर, मोदी सरकार द्वारा एफआरपी को उचित तरीके से तय नहीं किया जाता है। पंजाब के किसानों के हालिया ऐतिहासिक संघर्ष के बाद, जिसमें उन्होंने गन्ने के मूल्य में 50 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोत्तरी हासिल की, यह एक बार फिर स्पष्ट है कि उत्पादन लागत के आंकड़ों को दबाया जा रहा है, और किसानों की कड़ी मेहनत का शोषण किया जा रहा है। गन्ने की रिकॉर्ड उच्च खरीद (केवल धान की ख़रीद के बाद) के बारे में अपनी प्रेस विज्ञप्ति में भारत सरकार का प्रचार भी एक विडंबना है जहाँ चीनी मिलों द्वारा घोषित मूल्य पर खरीद अनिवार्य रूप से की जाती है। विरोध करने वाले किसान सभी कृषि उत्पादों के लिए कानूनी रूप से गारंटीकृत C2+50% लाभकारी मूल्य की मांग कर रहे हैं, और यह वर्तमान किसान आंदोलन की प्रमुख मांगों में से एक है।

संयुक्त किसान मोर्चा ने आगे कहा कि मोदी सरकार का अहंकार और अज्ञानता पूरी दुनिया देख रही है, वहीं देश के किसान लोकतांत्रिक आंदोलनों के लिए प्रेरणा बन गए हैं। 

जैसे-जैसे राज्य में किसानों का आंदोलन तेज होता जा रहा है और चुनाव नजदीक आ रहे हैं, उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार की घबराहट साफ दिखाई दे रही है। गन्ने के सैप (SAP) में मामूली बढ़ोत्तरी और मुख्यमंत्री का 2010 से पेराई सत्र से पहले बकाया भुगतान पूरा करने का वादा इसी घबराहट का परिचायक है। कल यूपी के सीएम द्वारा प्रचारतंत्र के लिए सावधानीपूर्वक सुनियोजित और संकलित ड्रामा के माध्यम से किसान आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश  की।एसकेएम ने कहा हालांकि, एसकेएम की मिशन यूपी योजना जल्द ही भाजपा सरकार के इन प्रयासों को समाप्त कर देगी।

विभिन्न राज्यों में भाजपा नेताओं और सहयोगी दलों के नेताओं के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन जारी है। जालंधर में कल उस समय भारी गतिरोध पैदा हो गया था जब किसान भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अश्विनी शर्मा के ख़िलाफ़ किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। हरियाणा के जींद में, जजपा नेताओं  को किसानों के विरोध के डर से अपना सभा स्थल बदलना पड़ा।

(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित रिपोर्ट।)

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