Thursday, October 6, 2022

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, देशद्रोह कानून पर लगायी रोक

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उच्चतम न्यायालय में आज पूर्ववर्ती चार चीफ जस्टिसों जे एस खेहर ,दीपक मिश्रा,रंजन गोगोई और एसए बोबडे के कार्यकाल से इतर वर्तमान चीफ जस्टिस एनवी रमना की अगुआई वाली पीठ ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा है कि राजद्रोह कानून पर पुनर्विचार तक इसका इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही कोर्ट ने ये भी कहा कि केंद्र हो या राज्य सरकार, 124ए के तहत कोई एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी। साथ ही कोर्ट ने कहा है कि जिनके खिलाफ राजद्रोह के आरोप में मुकदमे चल रहे हैं और वो इसी आरोप में जेल में बंद हैं वो जमानत के लिए समुचित अदालतों में अर्जी दाखिल कर सकते हैं। अब इस मामले की सुनवाई जुलाई के तीसरे हफ्ते में होगी। तब तक केंद्र सरकार को इस कानून को पुनर्विचार करने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि इस दौरान केंद्र सरकार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को दिशानिर्देश दे सकती है।

चीफ जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ ने कहा कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा जरूरी है। चीफ जस्टिस ने पूछा कि कितने याचिकाकर्ता जेल में हैं। इस पर कपिल सिब्बल ने कहा कि 13 हजार लोग जेल में हैं। चीफ जस्टिस रमना ने कहा कि हमने इस मामले पर काफी विचार किया है। हम इस मामले में आदेश दे रहे हैं। चीफ जस्टिस ने आदेश पढ़ते हुए कहा कि पुनर्विचार होने तक यह उचित नहीं होगा कि राजद्रोह कानून का इस्तेमाल किया जाए। हम आशा और विश्वास करते हैं कि केंद्र और राज्य आईपीसी की धारा 124ए के तहत कोई भी प्राथमिकी दर्ज करने से परहेज करेंगे।

दरअसल उच्चतम न्यायालय में केंद्र ने कहा है कि इस कानून पर दोबारा विचार करने का सरकार ने फैसला किया है, ऐसे में सुनवाई टाली जानी चाहिए। इस पर पीठ ने कहा कि हम सुनवाई टाल सकते हैं, लेकिन हमारी चिंता है कि कानून का लगातार दुरुपयोग हो रहा है और अटॉर्नी जनरल ने भी यह बात कही है। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि केस राज्यों द्वारा दर्ज किया जा रहा है इसमें केंद्र का रोल नहीं है। इसके बाद पीठ ने कहा कि आप राज्यों को क्यों नहीं कहते हैं कि जब तक केंद्र सरकार कानून का दोबारा परीक्षण कर रही है तब तक मामले में केस दर्ज न किया जाए।

राजद्रोह कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने के मामले पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि हमने राज्य सरकारों को जारी किए जाने वाले निर्देश का मसौदा तैयार किया है। उसके मुताबिक राज्य सरकारों को स्पष्ट निर्देश होगा कि बिना जिला पुलिस कप्तान यानी एसपी या उससे ऊंचे स्तर के अधिकारी की मंजूरी के राजद्रोह की धाराओं में एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी।इस दलील के साथ सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट से कहा कि फिलहाल इस कानून पर रोक न लगाई जाए।सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट को ये भी बताया कि पुलिस अधिकारी राजद्रोह के प्रावधानों के तहत एफआईआर दर्ज करने के समर्थन में पर्याप्त कारण भी बताएंगे। उन्होंने कहा कि कानून पर पुनर्विचार तक वैकल्पिक उपाय संभव है।

आंकड़ों की बात पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि ये तो जमानती धारा है, अब सभी लंबित मामले की गंभीरता का विश्लेषण या आकलन कर पाना तो मुश्किल है।लिहाजा ऐसे में कोर्ट अपराध की परिभाषा पर रोक कैसे लगा सकती है? यह उचित नहीं होगा।

याचिकाकर्ताओं की तरफ से दलील रखते हुए वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट से मांग रखी थी कि राजद्रोह कानून पर तत्काल रोक लगाने की जरूरत है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि इस कानून का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। अटॉर्नी जनरल ने भी ये बातें कही थी कि हनुमान चालीसा केस में देशद्रोह की धाराएं लगाई गई थीं। ऐसे में जब तक इसकी समीक्षा नहीं की जाती है, इस धारा के तहत केस दर्ज करना उचित नहीं होगा।

इस मामले में केंद्र ने उच्चतम न्यायालय में हलफनामा दाखिल कर कहा था कि सरकार ने राजद्रोह कानून पर पुनर्विचार और उसकी पुन: जांच कराने का निर्णय लिया है। केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया है कि वो राजद्रोह कानून की धारा 124 ए की वैधता पर फिर से विचार करेगी। लिहाजा, इसकी वैधता की समीक्षा किए जाने तक इस मामले पर सुनवाई न करे। लेकिन कोर्ट ने केंद्र के इस पक्ष को नहीं माना है और कानून पर रोक लगा दी है।

सुनवाई के दौरा चीफ जस्टिसने कहा कि सॉलिसिटर जनरल यह बताएं कि केंद्र इस पर दोबारा विचार करने में कितना वक्त लेगी। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि इस बात का मेरे पास फिलहाल जवाब नहीं है। हमारी मंशा को देखना चाहिए। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि हमारी समझ से हम अतार्किक नहीं हो सकते हैं और कितना वक्त दिया जाएगा हम तय करेंगे।तब सिब्बल ने कहा कि लेकिन इस दौरान लोग गिरफ्तार होते रहेंगे।

चीफ जस्टिस रमना ने कहा कि हलफनामा में कहा गया है कि लोगों की लिबर्टी और मानवाधिकार मामले से पीएम अवगत हैं। हमारी चिंता है कि कई पेंडिंग केस हैं और कानून का दुरुपयोग हो रहा है। अटॉर्नी जनरल ने कहा कि हनुमान चलीसा के मामले में राजद्रोह का केस हुआ। ऐसे मामलों को कैसे प्रोटेक्ट किया जाए। सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा कि एफआईआर और छानबीन राज्य सरकार कर रही है। केंद्र का लेना देना नहीं है। जो भी कानून का दुरुपयोग हो रहा है उसमें लोगों के पास कानूनी उपचार मौजूद है।

चीफ जस्टिस ने कहा कि हम लोगों को नहीं कह सकते हैं कि आप हर बार कोर्ट जाएं। सरकार अगर खुद कह रही है कि कानून का दुरुपयोग हो रहा है तो ये चिंता का विषय है। आप लोगों को कैसे प्रोटेक्ट करेंगे। कई केस पेंडिंग हैं और लोगों पर राजद्रोह का केस बनाया जा रहा है इस पर आपका स्टैंड क्या है।जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि आपने कहा कि उचित फोरम कानून पर दोबारा विचार करेगा। आप अपनी मिनिस्ट्री के जरिये ऐसा क्यों नहीं करते कि राज्यों को निर्देश जारी करें कि 124 ए को कानून पर विचार होने तक स्थगित रखा जाए। मेहता ने कहा कि देश में ऐसा नहीं हुआ होगा कि कानून पर रोक लगा दी जाए।

चीफ जस्टिस रमना ने कहा कि हम सभी अपराध की बात नहीं कर रहे हैं हम सिर्फ आईपीसी की धारा-124 ए यानी राजद्रोह की बात कर रहे हैं। जस्टिस हिमा कोहली ने कहा कि हमारे ब्रदर जज कहना चाहते हैं कि आप राज्यों को निर्देश क्यों नहीं देते कि जब तक राजद्रोह कानून पर दोबारा विचार चल रहा है तक तक इस कानून के तहत कार्रवाई न की जाए।

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने केदारनाथ केस में राजद्रोह के प्रावधान को हल्का कर दिया फिर भी जमीनी स्तर पर फर्क नहीं है और पुलिस लगातार केस दर्ज कर रही है। अन्यथा आप निर्देश जारी करते हैं कि जब तक हम (केंद्र) कानून पर दोबारा परीक्षण कर रहे हैं तब तक 124 ए में केस दर्ज न किया जाए।

कपिल सिब्बल ने कहा कि पूर्व पीएम नेहरू ने कहा था कि जहां तक मेरा सवाल है तो मैं मानता हूं कि 124 ए (राजद्रोह) बेहद आपत्तिजनक है। ये इतिहास के मद्देनजर और व्यवहारिक तौर पर जगह पाने का हकदार नहीं है। बाद में इससे छुटकारा मिलेगा तो बेहतर है। महात्मा गांधी ने राज्य और सरकार में फर्क बताया था।

उच्चतम न्यायालय में रिटायर मेजर जनरल की ओर से याचिका दाखिल कर कहा गया है कि आईपीसी की धारा-124 ए (राजद्रोह) कानून में जो प्रावधान और परिभाषा दी गई है वह स्पष्ट नहीं है। इसके प्रावधान संविधान के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। सभी नागरिकों को मौलिक अधिकार मिले हुए हैं। इसके तहत अनुच्छेद-19 (1)(ए) में विचार अभिव्यक्ति की आजादी मिली हुई है। साथ ही अनुच्छेद-19 (2) में वाजिब रोक की बात है। लेकिन राजद्रोह में जो प्रावधान है वह संविधान के प्रावधानों के विपरीत है।

दरअसल 1962 में दिए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हर नागरिक को सरकार के क्रिया कलाप यानी कामकाज पर कमेंट करने और आलोचना करने का अधिकार है। आलोचना का दायरा तय है और उस दायरे में आलोचना करना राजद्रोह नहीं है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ये भी साफ किया था कि आलोचना ऐसा हो जिसमें पब्लिक आर्डर खराब करने या हिंसा फैलाने की कोशिश न हो। अगर कोई ऐसा बयान देता है जिसमें हिंसा फैलाने और पब्लिक आर्डर खराब करने की प्रवृत्ति या कोशिश हो तो फिर राजद्रोह का मामला बनेगा।

केंद्र सरकार ने भी उच्चतम न्यायालय में दो हलफनामे दाखिल किये पहले हलफनामे में केंद्र सरकार ने राजद्रोह से संबंधित औपनिवेशिक युग के दंडात्मक कानून का बचाव करने और उच्चतम न्यायालय में इसे चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज करने के लिए कहा था ।लेकिन दो दिन बाद सोमवार को दूसरा हलफनामा दाखिल करके सरकार ने कहा कि उसने कानून के प्रावधानों की फिर से जांच और पुनर्विचार करने का फैसला किया है। नए हलफनामे में केंद्र ने कहा कि आजादी का अमृत महोत्सव (स्वतंत्रता के 75 वर्ष) की भावना और पीएम नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण में भारत सरकार ने धारा 124ए (देशद्रोह कानून)  प्रावधानों की फिर से जांच और पुनर्विचार करने का निर्णय लिया है। केंद्र ने उच्चतम न्यायालय से यह भी अनुरोध किया था कि  जब तक सरकार इस मामले की जांच नहीं कर लेती तब तक देशद्रोह का मामला नहीं उठाया जाए।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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