Thursday, October 6, 2022

केंद्र को झटका! सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 पर संविधान पीठ गठित कर सरकार को भेजा नोटिस

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नई दिल्ली/इलाहाबाद। केंद्र सरकार को उच्चतम न्यायालय में उस वक्त ज़ोर का झटका लगा जब  अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल और सॉलिसिटर जनरल के अदालत में मौजूद होने के कारण केंद्र को जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को हटाने के खिलाफ दायर याचिकाओं पर नोटिस जारी करने के विरोध को न मानते हुए चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस एसए नजीर की पीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करके एक सप्ताह में विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। उच्चतम न्यायालय ने  कहा है कि पांच जजों की संवैधानिक पीठ अक्तूबर के पहले हफ्ते में अनुच्छेद 370 के हटाए जाने से जुड़ी सभी याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। उच्चतम न्यायालय ने केंद्र की उस दलील को मानने से इनकार कर दिया है जिसमें वार्ताकार के नियुक्त करने की मांग की गई थी। न्यायालय  ने कहा कि वह अनुच्छेद 370 हटाए जाने की संवैधानिक वैधता की समीक्षा करेगा। उन्होंने केंद्र की  इस दलील को खारिज कर दिया कि केंद्र सरकार को नोटिस भेजने से सीमा पार ग़लत संदेश जाएगा।

अटॉर्नी जनरल ने कहा कि इस अदालत द्वारा कही हर बात को संयुक्त राष्ट्र के समक्ष पेश किया जाता है। दोनों पक्ष के वकीलों के वाद-विवाद में उलझने पर पीठ ने कहा कि हमें पता है कि क्या करना है, हमने आदेश पारित कर दिया है और हम इसे बदलने नहीं वाले।

पीठ केंद्र की उस दलील से सहमत नहीं दिखी कि अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल और सॉलिसिटर जनरल के अदालत में मौजूद होने के कारण नोटिस जारी करने की जरूरत नहीं है। पीठ ने नोटिस को लेकर सीमा पार प्रतिक्रिया होने की दलील को ठुकराते हुए कहा कि हम इस मामले को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेजते हैं। अटॉर्नी जनरल ने कहा कि इस अदालत द्वारा कही हर बात को संयुक्त राष्ट्र के समक्ष पेश किया जाता है। दोनों पक्ष के वकीलों के वाद-विवाद में उलझने पर पीठ ने कहा कि हमें पता है कि क्या करना है, हमने आदेश पारित कर दिया है और हम इसे बदलने नहीं वाले। जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 में फेरबदल के ख़िलाफ़ दायर की गई कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने यह फ़ैसला दिया है।

पीठ इस मुद्दे से संबंधित 14 याचिकाओं पर विचार कर रही थी। याचिकाओं में अनुच्छेद 370 और जम्मू और कश्मीर के विभाजन को चुनौती, अनुच्छेद 370 के तहत जारी किए गए राष्ट्रपति आदेश, जिसके तहत जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति को छीन लिया गया है और जम्मू-कश्मीर (द्विभाजन) अधिनियम 2019, जिसके अंतर्गत राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया है, को चुनौती दी  गईं हैं।

जिन याचिकाओं पर सुनवाई हुई उनमें  नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं, मोहम्मद अकबर लोन और हसनैन मसूदी (जो जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश हैं) की याचिका,पूर्व आईएएस अधिकारी और जम्मू-कश्मीर के राजनेता शाह फैसल और एक्टिविस्ट शहला राशिद की याचिका, 5 अगस्त को जारी राष्ट्रपति आदेश को चुनौती देने वाली कश्मीरी वकील शाकिर शबीर की याचिका, वकील एमएल शर्मा की याचिका  शामिल है।

इसके अलावा कानून स्नातक मोहम्मद अलीम की याचिका में राज्य में सूचना पर प्रतिबंध के आदेश को चुनौती दी गई है और अनंतनाग जिले में अपने माता-पिता के बारे में जानकारी प्राप्त करने की मांग की गई है। कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन की याचिका में क्षेत्र में मीडिया पर लगे प्रतिबंधों को चुनौती दी गई है। कश्मीर में राजनीतिक नेताओं को हिरासत में रखने के खिलाफ कार्यकर्ता तहसीन पूनावाला की याचिका है ।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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