Tuesday, November 29, 2022

हेट स्पीच देने वाले व्यक्ति के धर्म, जाति को देखे बिना कार्रवाई करें: सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच पर नियंत्रण के लिए दायर याचिका पर कहा कि हेट स्पीच देने वाले व्यक्ति के धर्म, जाति को देखे बिना कार्रवाई करें। जस्टिस केएम जोसेफ और हृषिकेश रॉय की पीठ ने कहा कि जब तक विभिन्न धार्मिक समुदाय सद्भावना के साथ नहीं रहेंगे तब तक बंधुत्व नहीं हो सकता। जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस हृषिकेश रॉय की पीठ ने दिल्ली, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के एनसीटी की सरकारों को निर्देश दिया कि वे अपने अधिकार क्षेत्र में हुए हेट स्पीच क्राइम्स पर की गई कार्रवाई के बारे में अदालत के समक्ष रिपोर्ट दाखिल करें।

पीठ ने निर्देश दिया कि इन सरकारों को किसी भी शिकायत की प्रतीक्षा किए बिना हेट स्पीच क्राइम्स के खिलाफ स्वत: कार्रवाई करनी चाहिए। मामले मे स्वत: संज्ञान लेकर अपराधियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्यवाही की जानी चाहिए। स्पीकर के धर्म की परवाह किए बिना कार्रवाई की जानी चाहिए। पीठ ने चेतावनी दी कि निर्देशों के अनुसार कार्रवाई करने में किसी भी तरह की हिचकिचाहट को अदालत की अवमानना माना जाएगा। पीठ भारत में मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने और आतंकित करने के बढ़ते खतरे को रोकने के लिए तत्काल हस्तक्षेप की मांग वाली एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

पीठ ने दिल्ली, यूपी और उत्तराखंड सरकार को निर्देश दिया है कि ऐसे बयानों पर पुलिस खुद संज्ञान लेते हुए मुकदमा दर्ज करे।इसके लिए किसी की तरफ से शिकायत दाखिल होने का इंतज़ार न किया जाए।कार्रवाई करने में कोताही को सुप्रीम कोर्ट की अवमानना माना जाएगा।

याचिकाकर्ता शाहीन अब्दुल्ला का कहना था कि मुसलमानों के खिलाफ लगातार हिंसक बयान दिए जा रहे हैं, इससे डर का माहौल है। लेकिन पीठ ने कहा कि नफरत भरे बयान मुसलमानों की तरफ से भी दिए जा रहे हैं. सभी मामलों में निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए।

याचिकाकर्ता के लिए पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने पीठ के सामने बीजेपी नेताओं के बयानों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि सांसद प्रवेश वर्मा ने मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार की बात कही. उसी कार्यक्रम में एक और नेता ने गला काटने जैसी बात कही।लगातार ऐसे कार्यक्रम हो रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने धर्म संसद मामले में जो आदेश दिए थे, उनका कोई असर नहीं हो रहा है।कपिल सिब्बल ने बताया कि बार-बार शिकायत करने के बावजूद भड़काऊ भाषणों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।

प्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को याद दिलाया कि जब तक विभिन्न धर्मों/जातियों के सदस्य सौहार्दपूर्ण ढंग से सह-अस्तित्व में नहीं आते, तब तक बंधुत्व नहीं हो सकता। पीठ ने इस पर प्रकाश डालते हुए कहा, “भारत का संविधान एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में भारत की परिकल्पना करता है और व्यक्ति की गरिमा और देश की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करने वाली बिरादरी प्रस्तावना में निहित मार्गदर्शक सिद्धांतों में से एक है। बंधुत्व तब तक नहीं हो सकता जब तक कि विभिन्न धर्मों के समुदाय के सदस्य या जातियां सद्भाव में रहने में सक्षम हैं।”

जस्टिस जोसफ ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि यह 21वीं सदी है। हम धर्म के नाम पर कहां आ पहुंचे हैं? हमें एक धर्मनिरपेक्ष और सहिष्णु समाज होना चाहिए। लेकिन आज घृणा का माहौल है। सामाजिक तानाबाना बिखरा जा रहा है। हमने ईश्वर को कितना छोटा कर दिया है। उसके नाम पर विवाद हो रहे हैं।इस पर सिब्बल ने कहा कि लोगों ने ऐसे भाषणों पर कई बार शिकायत की है. लेकिन प्रशासन निष्क्रिय बना रहता है।

पीठ के दूसरे सदस्य जस्टिस ऋषिकेश रॉय ने कहा कि क्या ऐसे भाषण सिर्फ एक तरफ से ही दिए जा रहे हैं? क्या मुस्लिम नेता नफरती बयान नहीं दे रहे? आपने याचिका में सिर्फ एकतरफा बात क्यों कही है? इस पर सिब्बल ने कहा कि जो भी नफरत फैलाए, उस पर कार्यवाही होनी चाहिए।

इसके बाद जजों ने करीब 25 मिनट का ब्रेक लिया। अंत में जस्टिस जोसफ ने फैसला लिखवाते हुए कहा कि वैमनस्य फैलाने के खिलाफ 153ए, 295ए , 505 जैसी कई धाराएं हैं,लेकिन अगर पुलिस उनका उपयोग न करे तो नफरत फैलाने वालों पर कभी लगाम नहीं लगाई जा सकती। याचिका में दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की घटनाओं का हवाला दिया गया है। हम इन राज्यों को निर्देश दे रहे हैं कि वह ऐसे मामलों में तुरंत केस दर्ज कर उचित कानूनी कार्रवाई करें. इसके लिए किसी शिकायत का इंतज़ार न करें।

पीठ ने साफ किया कि भविष्य में अगर पुलिस कानूनी कार्यवाही करने में चूकती है, तो इसे सुप्रीम कोर्ट की अवमानना माना जाएगा।सुप्रीम कोर्ट ने तीनों राज्यों से यह भी कहा है कि पिछले कुछ समय में अपने यहां दिए गए सभी नफरत भरे बयानों को लेकर की गई कार्यवाही का ब्यौरा भी कोर्ट में जमा करवाएं।

पीठ ने दिल्ली, यूपी और उत्तराखंड पुलिस को नोटिस जारी करते हुए पूछा कि हेट स्पीच में शामिल लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई। जिम्मेदार ऐसे बयान देने वालों पर फौरन सख्त कार्रवाई करें, नहीं तो अवमानना के लिए तैयार रहें। पीठ  ने अपने आदेश में कहा कि कोर्ट की जिम्मेदारी है कि वह इस तरह के मामलो में हस्तक्षेप करे।

शाहीन अब्दुल्ला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। उन्होंने कोर्ट से मांग की है कि वह देशभर में हुई हेट स्पीच की घटनाओं की निष्पक्ष, विश्वसनीय और स्वतंत्र जांच के लिए केंद्र सरकार को निर्देशित करें। भारत में मुस्लिमों को डराने-धमकाने के चलन को तुरंत रोका जाए।

पीठ ने हेट स्पीच से भरे टॉक शो और रिपोर्ट टेलीकास्ट करने पर टीवी चैनलों को जमकर फटकार लगाई है। हेट स्पीच से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए पीठ  ने महीने भर पहले हुई सुनवाई में कहा कि यह एंकर की जिम्मेदारी है कि वह किसी को नफरत भरी भाषा बोलने से रोके। पीठ  ने पूछा कि इस मामले में सरकार मूकदर्शक क्यों बनी हुई है, क्या यह एक मामूली मुद्दा है?

पीठ ने आदेश में कहा कि भारत का संविधान भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र और बिरादरी के रूप में देखता है। व्यक्ति की गरिमा और देश की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करना प्रस्तावना में निहित मार्गदर्शक सिद्धांत हैं। बंधुत्व तब तक नहीं हो सकता जब तक कि विभिन्न धर्मों के समुदाय के सदस्य या जातियां सद्भाव में रहने में सक्षम नहीं हैं। इस चिंता को ध्यान में रखते हुए पीठ ने आदेश में कहा कि हमें लगता है कि अदालत पर मौलिक अधिकारों की रक्षा करने और संवैधानिक मूल्यों, विशेष रूप से कानून के शासन और राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक चरित्र की रक्षा और संरक्षण करने का कर्तव्य है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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