Monday, August 8, 2022

क्या सचमुच कांग्रेस के पुनर्जीवन की शुरुआत हो गई है?

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उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी की दो रैलियों (वाराणसी और गोरखपुर में) की सफलता से इस राज्य में कांग्रेस की संभावनाओं को लेकर एक नई चर्चा शुरू हुई है। यह शायद मोदी-योगी राज से समाज के एक बड़े हिस्से में गहराई निराशा का ही नतीजा है कि इस चर्चा में बहुत से ऐसे लोग भी आशा की किरण देख रहे हैं, जिन्होंने अपने जीवन का लंबा वक्त कांग्रेस की आलोचना- और यहां तक यह बताने में गुजारा है कि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में कोई फर्क नहीं है।

कांग्रेस पार्टी के अंदर तो इससे एक उत्साह-सा पैदा हो गया है। कांग्रेस पार्टी से जुड़े लोग तो दावा करने लगे हैं कि आम तौर पर कांग्रेस- और खासकर प्रियंका गांधी के अभियानों में जो जन समर्थन दिख रहा है, वह अचानक नहीं है। बल्कि यह बीते दो वर्षों में जमीनी स्तर पर हुए काम और कार्यकर्ताओं के तैयार हुए ढांचे का परिणाम है। इसलिए कांग्रेस कार्यकर्ताओं/ नेताओं का दावा है कि ये समर्थन अगले विधानसभा चुनाव में वोटों में भी तब्दील होगा। और अगर यूपी में कांग्रेस उठती दिखी, तो उसके परिणामस्वरूप सारे देश में कांग्रेस के पुनर्जीवन की शुरुआत हो जाएगी।

ये अहम सवाल है कि क्या सचमुच इसकी संभावना है? इस बात में कोई शक नहीं है कि सत्ता के तमाम केंद्रों के साथ-साथ सामाजिक-राजनीतिक नैरेटिव पर आरएसएस-भाजपा का जैसा शिकंजा कस गया है, उससे वे सभी लोग बेचैन हैं, जिनके दिमाग में भारत की अलग तस्वीर रही है। ऐसे तमाम लोग, जो आधुनिक अर्थ में न्याय और समता के सिद्धांतों में यकीन करते हैं, वे इसके लिए व्यग्र हैं कि मौजूदा हाल से देश को किसी रूप में राहत मिले। बौद्धिक वर्ग में अब इस समझ ने भी धीरे-धीरे घर बना लिया है कि कांग्रेस को छोड़ कर कोई ऐसा विकल्प तैयार नहीं हो सकता, जो आरएसएस-भाजपा के वैचारिक वर्चस्व को चुनौती दे सके। उनके मुताबिक लेफ्ट फ्रंट के कमजोर होने और विमर्श को प्रभावित करने की उसकी क्षमता चूक जाने के बाद अब मोटे तौर पर कांग्रेस ही एक ऐसी ताकत बची है, जिससे फिलहाल ये भूमिका निभाने की उम्मीद की जा सकती है।

लेकिन क्या खुद कांग्रेस अपनी इस ऐतिहासिक भूमिका के लिए तैयार है? बल्कि यह भी पूछा जा सकता है कि क्या कांग्रेस को इस बात का भान है कि स्वतंत्र भारत में उसकी जो भूमिकाएं रही हैं, उससे तमाम सहमति या असहमति रखने वाले लोग अब उससे कैसी ऐतिहासिक भूमिका की अपेक्षा रख रहे हैं?

फिलहाल, यह कहा जा सकता है कि नेहरू-गांधी परिवार के दो उत्तराधिकारियों ने तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद आरएसएस-भाजपा राज का मुकाबला करने का जज्बा दिखाया है। उन्होंने इसमें मौजूद जोखिम को उठाया है। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में मृत-प्राय मानी जाने वाली कांग्रेस पार्टी एकबारगी से विपक्ष की प्रमुख आवाज बन कर उठ खड़ी हुई है। इसके पहले (सीपीएम को अगर छोड़ दें) राहुल गांधी काफी समय से एकमात्र ऐसी आवाज बने रहे हैं, जो रोजमर्रा के स्तर पर नरेंद्र मोदी सरकार की कमियों, उसकी मंशा, और उसके परिणामों को लेकर देश को आगाह करते हैं और साथ ही विरोध की भावना को स्वर देते हैं। आरएसएस की विचारधारा को बेनकाब करने और उससे असहमति जताने का कोई मौका भी वे नहीं छोड़ते। इस क्रम में देश में नागरिक अधिकारों के हनन और ज्यादती का लगातार विरोध भी उन्होंने किया है।

उधर उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ हुए आंदोलन के समय से लगातार सक्रियता दिखाई है। अत्याचार और दमन के हर स्थल पर पहुंचने की उनकी साहसी कोशिशों ने लोगों का ध्यान खींचा है। राहुल और प्रियंका गांधी की इन भूमिकाओं ने कांग्रेस के बहुत से कार्यकर्ताओं और इस पार्टी से सहानुभूति रखने वाले में न सिर्फ आस जगाई है, बल्कि उनमें से बहुतों को सक्रिय भी किया है। यह इसके बावजूद है कि पूरी कांग्रेस पार्टी अभी भी राजनीति की राजधानी-केंद्रित, सुविधाभोगी संस्कृति में फंसी हुई है।

ये अनुभव यह बताता है कि देश के एक बड़े जनमत को मुखर और साहसी विपक्ष का बेसब्री से इंतजार था। कहा जाता है कि संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका होती हैः सरकार की कमियों को बेनकाब करना (to expose), उसके ‘गलत कार्यों’ का विरोध करना (to oppose), और अगर संसदीय समीकरणों में संभव हो, तो सत्ता से उसे हटाने का प्रयास करना (if possible to depose). इस रूप में विपक्ष सत्ता पक्ष को जवाबदेह बनाए रखता है।

इनमें expose का संबंध वैचारिक या विचारधारात्मक स्तर पर तथ्य-पूर्ण और बेहतर विकल्प प्रस्तुत करने से है। विरोध करने (to oppose) के लिए जमीन पर उतरना पड़ता है। भारत की मौजूदा सियासी सूरत तीसरी संभावना (यानी वर्तमान सरकार को संसदीय समीकरणों में बदलाव के जरिए सत्ता से हटाना) फिलहाल मौजूद नहीं है।

अब अगर इन कसौटियों पर देखें, तो फिलहाल कांग्रेस ने विरोध करने (to oppose) और सीमित रूप में expose करने का मोर्चा संभाला हुआ है। सीमित रूप में इसलिए कि वह सरकार के निर्णयों और नीतियों में खामियों को तो सामने लाने की भूमिका निभा रही है, लेकिन बेहतर विकल्प पेश करने के मामले में वह न सिर्फ पिछड़ी हुई है, बल्कि नाकाम है। यह पार्टी की अपने वर्ग चरित्र के कारण उत्पन्न होने वाली अनिच्छा की वजह से है, या उसमें बौद्धिक प्रतिभा की कमी है, अथवा, उसमें अतीत और वर्तमान विश्व परिस्थितियों की समझ का अभाव है, इस बारे में कुछ निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। बहरहाल, यह तय है कि जब तक वह बेहतर विकल्प पेश करने का भरोसा नहीं बंधाती, पुनर्जीवन का उसका सपना पूरा नहीं होगा।

सफलता के लिहाज से चुनावी राजनीति हमेशा बाद में आती है। चुनावों में कामयाबी तब मिलती है, जब कोई दल या नेता जन मानस में अपनी जगह बना चुका होता है। जन मानस में जगह सिर्फ विरोध से नहीं बनती। इसके लिए लोगों की नव-आकांक्षाओं का प्रवक्ता बनना पड़ता है। उससे जो आशा पैदा होती है, वह किसी पार्टी या उसकी विचारधारा के लिए सकारात्मक वातावरण की बुनियाद होती है। आजाद भारत में जवाहर लाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी के दौर तक कांग्रेस का राजनीति में दबदबा रहा, तो इसकी वजह यह थी कि तत्कालीन नेता लोगों के दिल पर राज करते थे। ये हैसियत उन्होंने प्रगति और न्याय को अपना एजेंडा बना कर और उस एजेंडे के प्रति आम जन में भरोसा पैदा करके हासिल की थी।

आज कांग्रेस की असल मुसीबत यह है कि वह अपने समर्थकों के दिल पर भी राज करने में अक्षम है। यह गंभीर विचार-विमर्श का मुद्दा है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? ज्यादा पीछे ना जाएं, और सिर्फ इंदिरा गांधी के दौर पर नजर डालें, तो यह मालूम होगा कि तब कांग्रेस के पोस्टरों पर समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, और लोकतंत्र जैसे शब्द एक शृंखला के रूप में अनिवार्य रूप से लिखे होते थे। पार्टी का नारा था- कांग्रेस का हाथ, गरीबों के साथ। चूंकि कांग्रेस सरकारें अपनी तमाम कमियों के बावजूद इस दिशा में काम करती दिखती थीं, इसलिए लोगों में वह बेहतर दिनों की उम्मीद की प्रतीक बनी हुई थीं।

लेकिन उसके बाद बात किस दिशा में गई? गौर करें कि राजीव गांधी के disastrous कार्यकाल के बाद पार्टी ने खुलेआम अपना पुनर्आविष्कार शासन की स्वाभाविक पार्टी (party of governance) और आर्थिक सुधारों की पार्टी (party of reforms)के रूप में किया। 2004 के आम चुनाव से पहले उसने ‘कांग्रेस का हाथ, गरीबों के साथ’ वाले अपने नारे को बदल कर ‘कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ’ कर लिया। इस तरह पार्टी ने गरीबों के साथ होने का दिखावा भी छोड़ दिया। यह पार्टी में चूकी बौद्धिक प्रतिभा का ही संकेत था कि उसने नव-उदारवादी अर्थशास्त्रियों की इस राय को सहज स्वीकार कर लिया कि 1991 में शुरू हुए कथित आर्थिक सुधारों की वजह से देश में गरीबी तेजी से घट रही है। ऐसे में पूंजीपति, उच्च मध्यम वर्ग, और नई आकांक्षाओं के साथ उभर रहे निम्न मध्य वर्ग को समेटते हुए खुद को ऐसी पार्टी बना सकती है, जिसमें एक साथ सभी तबके यकीन कर सकें।

अपनी इसी समझ के आधार पर 2002-14 के अपने शासनकाल में पार्टी ने विकास का अधिकार आधारित मॉडल (rights based approach to development) अपनाया। उसका सार यह था कि सरकार अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका घटाते हुए नव-उदारवादी नीतियों को बढ़ावा देगी। इस ढांचे को ‘मानवीय चेहरा’ देने के लिए वह लोगों के कुछ अधिकारों को कानूनी रूप प्रदान करेगी। आरटीआई, मनरेगा, वनाधिकार कानून, अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का अधिकार, खाद्य सुरक्षा कानून आदि इसी सोच का परिणाम थे। लेकिन 2014 में यह साफ हुआ कि ये सोच लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने में नाकाम रही है। इस सोच के जरिए कांग्रेस लोगों के मन में वह स्थान बरकरार रखने में विफल रही, जो आजादी के बाद 40 साल तक उसकी ताकत रही थी। इसकी सीधी वजह यह है कि इस सोच का आम लोगों के हित से सीधा टकराव है। इसलिए जब इस सोच के बिंदु पर पार्टियों का अंतर खत्म हो गया, जो उन्होंने पहले जाति और फिर धार्मिक पहचान का आह्वान करने वाले दलों को अपनी पसंद बना लिया।

राहुल गांधी ने कई मौकों पर संकेत दिया है कि वे इस समस्या को समझते हैं। उन्होंने कहा है कि 1990 के दशक में जो विचार कारगर था, वह 2012 के बाद कारगर नहीं रह गया है। अगर इस परिघटना को इस रूप में भी मान लें- यानी यह कि ये विचार 1990 के दशक की परिस्थितियों में जरूरी हो गया था- तो यह सवाल मौजूद है कि इसकी जगह अब कौन-सा विचार कारगर होगा? इस प्रश्न पर कांग्रेस के पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। टुकड़ों-टुकड़ों में उसके नेता कुछ टिप्पणियां कर देते हैं। मसलन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रोम यात्रा के समय पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने एक ट्वीट में कहा कि भारत में जिस समय एयर इंडिया को बेचा गया है, उसी समय इटली में सार्वजनिक क्षेत्र की विमान सेवा शुरू की गई है। उन्होंने कहा- हम दुनिया से उलटी दिशा में जा रहे हैं।

अगर चिदंबरम ने ये टिप्पणी गंभीरता से और सोच-विचार के बाद की है, तो उसका यह अर्थ निकाला जाएगा कि कांग्रेस के एक हलके में यह समझा जाने लगा है कि नव-उदारवाद के दुष्परिणाम सामने आने के बाद ये नीतियां अब पूरी दुनिया भर में अलोकप्रिय हो गई हैं।

चूंकि कांग्रेस ने इन नीतियों को खुलेआम और तार्किक रूप से अस्वीकार नहीं किया है, इसलिए आम लोग आज भी उसे एक ऐसी पार्टी मानते हैं, जो भाजपा का विरोध विपक्ष का दायित्व निभाने भर के लिए करती है। इसीलिए चुनावों के समय जब वह लाखों लोगों को नौकरियां देने, कुछ जन समुदायों को नकद आर्थिक सहायता देने, कर्ज माफ करने, या प्राइवेट अस्पतालों में दस लाख रुपये तक का फ्री इलाज कराने के वादे करती है, तो लोग उस पर भरोसा नहीं करते। हाल के असम के विधान सभा चुनाव में इस बात के फिर प्रमाण देखने को मिले। बिहार में कांग्रेस के गठबंधन सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल के दस लाख नौकरियां देने के वादे के साथ भी ये बात जाहिर हुई थी। 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस की न्याय (न्यूनतम आय) योजना किस तरह लोगों को आकर्षित करने में विफल रही, यह जग-जाहिर है। अब प्रियंका गांधी यूपी में जो वादे कर रही हैं, उनका अलग असर होगा, यह मानने की कोई वजह नहीं है।

ये बातें तभी विश्वसनीय महसूस होंगी, अगर कांग्रेस उसके साथ आर्थिक नीति की ठोस योजना पेश करे और यह बताए कि जो वादे वो कर रही है, उसके लिए धन कहां से आएगा। इसके बिना उसके वादों को लोग चुनावी जुमलों के अलावा कुछ और नहीं मानेंगे। इसलिए कांग्रेस के सामने चुनौती अपनी विश्वसनीयता वापस प्राप्त करने की है। इसकी शुरुआत करने के लिए सबसे पहले जरूरी है कि वह खुद को ‘शासन की स्वाभाविक पार्टी’ और ‘आर्थिक सुधारों की पार्टी’ मानने की मानसिकता से बाहर निकले। वह अपने को एक ऐसे राजनीतिक दल के रूप में देखना शुरू करे, जो आम जन के हितों की प्रतिनिधि है। वह एक साथ सबके हितों की संरक्षक नहीं हो सकती।

आज भाजपा मोनोपॉली पूंजीवाद (यानी वर्तमान शासक वर्ग) के हितों में काम करते हुए खुद को ‘शासन की स्वाभाविक पार्टी’ बन चुकी है। ऐसे में कांग्रेस (या किसी दूसरे दल) के सामने एक ही भविष्य है कि वह मोनोपॉली पूंजीवाद के विरुद्ध आम जन के हितों की वकालत करने वाली पार्टी के रूप में अपना पुनर्आविष्कार करे। वह वादा करे कि सरकारी नीतियों के जरिए आम जन के जिस धन को पिछले 30 वर्षों में पूंजीपतियों को ट्रांसफर किया गया है, उसका वह वापस हस्तांतरण शुरू करेगी। इस दौर में बढ़ी आर्थिक गैर-बराबरी को खत्म करना उसका सर्व-प्रथम एजेंडा होगा।
नीतिगत रूप में इसे व्यक्त करने के लिए कांग्रेस को ये दो विचार फिर से अपनाने चाहिएः
● सरकार नियोजित अर्थव्यवस्था, और
● प्रगतिशील कर व्यवस्था

सरकार नियोजित अर्थव्यवस्था के तहत सार्वजनिक क्षेत्र को फिर से खड़ा करना होगा। जहां जरूरी हो, वहां राष्ट्रीयकरण की नीति अपनाने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए। अर्थव्यवस्था और आम जीवन के कुछ जरूरी क्षेत्र सिर्फ सार्वजनिक क्षेत्र में होने चाहिए। कुछ क्षेत्र ऐसे हो सकते हैं, जिनमें सार्वजनिक क्षेत्र और प्राइवेट सेक्टर में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हो।

आज की परिस्थितियों में हेल्थ केयर और शिक्षा ऐसे विषय हैं, जिन्हें नियोजित और क्रमिक रूप से सार्वजनिक क्षेत्र में लाने की जरूरत है। चिदंबरम ने जो कहा, वह बताता है कि कैसे नव-उदारवाद का गढ़ रहे देशों में भी इस दिशा में पहल शुरू हुई है। अमेरिका में राष्ट्रपति जो बाइडेन की इन्फ्रास्ट्रक्चर योजना और बिल्ड बैक बेटर योजना के पीछे मंशा और महत्त्वाकांक्षा सार्वजनिक क्षेत्र में फिर से जान फूंकने की ही है। लेकिन भारत में यह कहने की हिम्मत कांग्रेस सहित तमाम पार्टियों में नहीं दिखती।

सार्वजनिक क्षेत्र को दोबारा खड़ा करने की योजना के साथ ही संसाधन के प्रश्न उठेंगे। ऐसा अमेरिका में भी उठा है। तमाम गैर-समाजवादी व्यवस्थाओं में आज की परिस्थिति में धनी लोगों पर नए टैक्स लगाना और पुराने टैक्स बढ़ाना ही इसका एकमात्र उपाय है। भारत में अगर उत्तराधिकार कर (inheritance tax) और (wealth tax) की शुरुआत की जाए, इनकम टैक्स और कॉरपोरेट टैक्स की दरें बढ़ाई जाएं, और पूंजीगत लाभ पर अधिक कर लगाया जाए, तो आम जन के लिए कल्याणकारी कार्यों में निवेश के संसाधन आसानी से जुट सकते हैं।
बेशक यह बात कहने का मतलब पूंजीपति वर्ग, मध्य वर्ग और उनके स्वामित्व वाले मीडिया के निशाने पर आना होगा। लेकिन आज इन दोनों का कांग्रेस के प्रति जो रुख है, उसे देखते हुए कांग्रेस चाहे तो ये जोखिम उठा सकती है। ये तबके वैसे भी कांग्रेस को एक दुश्मन के रूप में देखते हैं। और यह भी सच है कि ऐसा जोखिम उठाने के अलावा कांग्रेस के पास अपने पुनरुद्धार का कोई रास्ता नहीं है।

अगर गौर करें, तो नियोजित अर्थव्यवस्था और प्रगतिशील टैक्स कांग्रेस की विरासत का हिस्सा मालूम पड़ेंगे। नेहरूवादी अर्थव्यवस्था के दो प्रमुख स्तंभ ये पहलू थे। पंडित नेहरू ने इस आर्थिक मॉडल के साथ जन मानस में धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की प्रतिनिधि शक्ति के रूप में कांग्रेस को स्थापित कर रखा था। जब तक यह मॉडल लोगों में बेहतर और अपेक्षाकृत सुरक्षित भविष्य का विश्वास पैदा करता था, तब तब धर्मनिरपेक्षता जैसे उसके उसूल भी लोगों को आकर्षक लगते रहे। दरअसल, कांग्रेस ने समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के अपने विचारों पर समझौता करना लगभग एक ही समय शुरू किया। उसके बाद कथित राष्ट्रीय विकास आम जन के हितों की कीमत पर होने लगा। तब से लोगों की नजर में ये ऐसे सभी उसूल निरर्थक हो गए।

कांग्रेस में अगर इस सच को समझने और स्वीकार करने का माद्दा हो, तो उसका पुनर्जीवन संभव है। सार्वजनिक जीवन में विपक्ष की राजनीति (oppositional politics)के स्थल को भरने की उसने शुरुआत की है। लेकिन इससे वह आधी दूरी ही तय कर सकेगी। इसकी अगली चुनौती लोगों की कल्पनाशीलता (public imagination) को आकर्षित करने की है। जाहिर है, ऐसा एक सकारात्मक एजेंडे के साथ ही किया जा सकता है। लेकिन इस बिंदु पर शुरुआत के अभी कोई संकेत नहीं हैं। जबकि सच यह है कि जब तक ऐसा नहीं होता, कांग्रेस के पुनर्जीवन या पुनरुद्धार की तमाम बातों का आधार बेहद कमजोर या भुरभुरा बना रहेगा।
(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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