Saturday, October 8, 2022

सर्विलांस स्टेट की ओर बढ़ाया सरकार ने एक और नया कदम

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आपको याद होगा कि अभी कुछ दिन पहले केन्द्रीय सड़क, भूतल परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने संसद में कहा था कि आने वाले एक साल के अंदर भारत को टोल और नाकाओं से मुक्त कर दिया जाएगा। यानी देश एक साल में टोल नाकों पर लगने वाली लाइनों से मुक्त हो जाएगा। उन्होंने पूरी योजना के बारे में बताया था कि इस दौरान फास्ट टैग (FASTag) को पूरी तरह से लागू कर दिया जाएगा। प्रत्येक गाड़ी में जीपीएस सिस्टम अनिवार्य कर दिया गया है। जीपीएस पर रिकॉर्ड होगा कि आपने हाइवे पर कहां से एंट्री ली और कहां निकले। उसी हिसाब से आपके बैंक अकाउंट से पैसा कट जाएगा। उन्होंने कहा था कि टोल के लिए जीपीएस प्रणाली पर काम जारी है और सरकार इसे अंतिम रूप देने जा रही है।

अब सरकार ने हाईवे से भी एक कदम आगे बढ़कर सुरक्षा और सतर्कता के बहाने आम नागरिकों की गांवों, कस्बों, छोटे-छोटे शहरों तथा अन्य सभी जगहों पर वाहनों को चलाने सम्बंधी गतिविधियों पर नज़र रखने की दिशा में एक नया कदम उठाया है। जिसकी शुरुआत उत्तराखंड से होने जा रही है और मज़े की बात यह है कि इस पर आने वाला करीब 8 से 12 हज़ार रुपए का खर्चा भी वाहन स्वामियों की जेब से वसूला जाएगा। यह सब वैकल्पिक नहीं बल्कि अनिवार्य होगा।

उत्तराखंड सरकार ने एक शासनादेश जारी कर प्रदेश में 20 अप्रैल के बाद दोपहिया और तिपहिया वाहनों को छोड़कर अन्य सभी गाड़ियों में ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) लगाना अनिवार्य कर दिया है। जिसकी शुरुआत पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर नैनीताल जिले से हो रही है। इसके लिए बाकायदा आरटीओ को निर्देश जारी कर दिये गये हैं।

इस आदेश के अनुसार अब लोगों को अपने पुराने फोर ह्वीलर में भी जीपीएस लगवाना होगा। यह जीपीएस टैक्सी, निजी कार, जीप, बस, ट्रक व अन्य सभी सवारी वाहनों, माल वाहकों तथा हर तरह के नए व पुराने वाहनों पर लगाना अनिवार्य कर दिया गया है। जीपीएस केवल शासन की तरफ से अधिकृत 15 कंपनियां ही लगा सकेंगी। नैनीताल के हल्द्वानी स्थित आरटीओ के अनुसार इसमें 8 से 12 हजार रुपए का खर्चा आएगा।

अब तक राज्य में 15 हजार वाहनों में जीपीएस लगाया जा चुका है और आगे करीब सवा लाख वाहन इसके दायरे में आएंगे। 

चूंकि यह योजना अभी पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू की गई है लेकिन जल्द ही देशभर में इसे लागू किया जाएगा जिसकी घोषणा पिछले दिनों सरकार की तरफ से केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने संसद में की थी।

ऊपर बताया जा चुका है कि सरकार सभी पुराने वाहनों में भी जीपीएस सिस्टम टेक्नोलॉजी लगाने के लिए तेजी से काम कर रही है और पुराने वाहनों में भी जीपीएस लगवाना अनिवार्य कर दिया जाएगा। जबकि नए वाहनों में पहले से ही यह सिस्टम लगा हुआ आ रहा है क्योंकि सभी वाहन निर्माता कंपनियों को 1 जनवरी, 2019 के बाद बनने वाले वाहनों में जीपीएस लगाना अनिवार्य किया जा चुका है।

जीपीएस लगने पर मुख्यालय के कंट्रोल रूम से वाहनों की निगरानी होगी। इसके अलावा आरटीओ दफ्तरों में भी मिनी कंट्रोल रूम तैयार होंगे।

यह डिवाइस लगाने के बाद इसका सिम नंबर और वाहन का चेसिस नंबर परिवहन विभाग के वाहन पोर्टल और वीएलटी पोर्टल पर दर्ज कराया जाएगा। यह पूरा डाटा स्टेट डाटा सेंटर के सर्वर में सुरक्षित होगा और परिवहन आयुक्त मुख्यालय के जरिए वाहनों पर पल-पल नजर रखी जा सकेगी। उप-परिवहन आयुक्त एस. के. सिंह के अनुसार यह डिवाइस हर दो-दो मिनट में डाटा सेंटर को मैसेज भेजती रहती है।

यानी आप अपने गांव, कस्बे या शहर में वाहन से बाजार, सभा-सम्मेलन, शादी-बारात, मित्रों के घर-दफ्तर, फैक्ट्री, थाना-कचहरी या फिर किसी भी जगह जायें तो सरकार की नजर आपकी प्रत्येक मूवमेंट पर हर दो-दो मिनट के अंतराल पर लगी रहेगी।

यहां सोचने वाली बात है कि क्या सरकार की इस कार्रवाई से देश के नागरिकों को संविधान प्रदत्त निजता के अधिकार का हनन नहीं किया जा रहा है? जबकि केंद्र सरकार की तमाम समाज कल्याण योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए आधार नंबर को अनिवार्य करने सम्बंधी केंद्र सरकार के कदम को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने 15 फरवरी, 2019 को दिये अपने ऐतिहासिक फैसले में भी एकमत से कहा है कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का स्वाभाविक अंग है और नागरिकों का मौलिक अधिकार है परंतु सरकार इस नये नियम के तहत जनता की गतिविधियों को उसकी सुरक्षा के बहाने रिकॉर्ड पर दर्ज कर सर्विलांस स्टेट बन जाने से बस एक दो साल की ही दूरी पर है।

(श्याम सिंह रावत वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल नैनीताल में रहते हैं।)

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