Tuesday, August 9, 2022

आर्थिक तौर पर खस्ताहाल केंद्र सरकार अब टीएचडीसी भी बेचेगी

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टीएचडीसी के विनिवेश की मोदी सरकार की कोशिशों के खिलाफ 13 दिसंबर को तीन वामपंथी पार्टियों भाकपा, माकपा और भाकपा माले ने ऋषिकेश स्थित टीएचडीसी मुख्यालय पर धरना दिया। सपा और बसपा भी इस धरने में शरीक हुए। 

मोदी सरकार टीएचडीसी में केंद्र के 75 प्रतिशत शेयर एनटीपीसी को बेचने वाली है। देश भर में सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने का जो खेल केंद्र सरकार ने शुरू किया है, यह भी उसी का हिस्सा है। अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने खबर छापी है कि 100 रेलवे ट्रैक निजी हाथों में देने की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है।

टीएचडीसी का गठन टिहरी बांध के निर्माण के लिए हुआ था। वर्तमान में यह मुनाफे में चलने वाला सार्वजनिक उपक्रम है। इसे मिनी रत्न का दर्जा दिया जाता है। बीते दिनों विधानसभा सत्र में शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक ने कहा था कि टीएचडीसी को यदि बेचा जाना होता तो केंद्र सरकार, उत्तराखंड सरकार से जरूर पूछती। चूंकि उत्तराखंड सरकार से केंद्र ने इस बारे में कुछ नहीं पूछा है, इसलिए टीएचडीसी के बिकने की बात सही नहीं है।

मंत्री जी या तो सदन को गुमराह कर रहे थे या फिर वे स्वयं ही जानकारी के अभाव के शिकार हैं। टीएचडीसी एक सार्वजनिक उपक्रम है, जिसमें केंद्र की हिस्सेदारी 75 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश सरकार की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत है। उत्तराखंड सरकार का जब उसमें शेयर ही नहीं है तो उससे पूछना कैसा! 

जब उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड अलग हुआ तो परिसंपत्तियों के बंटवारे में जो छल हुआ, उसका जीता-जागता उदाहरण है टिहरी बांध और टीएचडीसी। बांध उत्तराखंड की जमीन पर है। डूबे उसके शहर और गांव। विस्थापित हुए यहां के लोग, पर टीएचडीसी में राज्य का हिस्सा नहीं है। टिहरी से बनने वाली बिजली में बहुत छोटा अंश उत्तराखंड को मिलता है।

उत्तराखंड के साथ हुए इस अन्याय के लिए भाजपा जिम्मेदार है, जिसकी तत्कालीन केंद्र और उत्तर प्रदेश की सरकार ने परिसंपत्तियों का ऐसा बंटवारा किया, जिसमें उत्तराखंड अपनी जमीन पर मौजूद संसाधनों से महरूम हो गया। कांग्रेस की भी आंशिक हिस्सेदारी ऐसा करने में है क्यूंकि उत्तर प्रदेश की विधानसभा और देश की संसद में उसने उत्तराखंड के साथ हो रही इस नाइंसाफी के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाई। 

टीएचडीसी को बचाने की लड़ाई को राज्य में मौजूद संसाधनों पर जनता के अधिकार की लड़ाई के रूप में भी देखा जाना चाहिए।

(इन्द्रेश मैखुरी उत्तराखंड के लोकप्रिय वामपंथी नेता हैं।)

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