Sunday, May 22, 2022

मोदी-शाह के राजनीतिक खेल में सोशल इंजीनियरिंग की सांप-सीढ़ी

Janchowkhttps://janchowk.com/
Janchowk Official Journalists in Delhi

ज़रूर पढ़े

(पिछले दिनों देश के अलग-अलग हिस्सों में आरक्षण की मांग को लेकर कई सामाजिक तबके सड़क पर उतरे थे। इनमें गुजरात में पाटीदार, महाराष्ट्र में मराठा, हरियाणा में जाट और आंध्रप्रदेश में कापू प्रमुख हैं। इस लेख में इन तबकों के आंदोलन और बीजेपी-एनडीए से उसके जुड़ाव का विश्लेषण किया गया है। इसको दो किस्तों में दिया जाएगा। पेश है उस कड़ी का पहला लेख-संपादक)

आज मोदी सरकार की अर्थव्यवस्था के मामले में असफलता और चीन, पाकिस्तान व अमेरिका के संग विदेश नीति के सवाल पर लगे धक्के मीडिया में चर्चा का विषय बने हुए हैं। पर एक प्रश्न है जिस पर अपेक्षाकृत ध्यानाकार्षण नहीं है-अर्थात सामाजिक पैमाने पर भाजपा-एनडीए को लगे तगड़े झटके। मसलन, कुछ प्रमुख सामाजिक समुदायों में, जो चुनावी दृष्टि से उनके प्रमुख आधार का निर्माण करते थे, क्षरण दिखाई पड़ रहा है। चलिये,हम अगस्त 2017 के महत्वपूर्ण घटनाक्रम पर नज़र डालें:

घटनाक्रम पर एक नजर

28 अगस्त 2017 को आन्ध्र प्रदेश में कापू नेता मुद्रागदा पद्मनाभम ने एनडीए के प्रमुख नेता चन्द्रबाबू नायडू को कापू जाति को ओबीसी श्रेणी में शामिल करने के लिए 6 दिसम्बर तक का अल्टीमेटम दे दिया और चेतावनी दी कि उसके बाद पुनः कापू आन्दोलन भड़केगा।

1 सितम्बर 2017 को पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय ने सिद्धान्ततः जाट आरक्षण को स्वीकृति दी, हालांकि राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग को आरक्षण का प्रतिशत तय करने हेतु मामला भेजकर उसे लम्बित कर दिया गया है। कोर्ट के फैसले के बाद 3 सितम्बर को जाट आरक्षण आन्दोलन के उत्साहित नेताओं ने खट्टर सरकार को इसे लागू करने के लिए 2 माह का समय दिया है, जिसके पश्चात संघर्ष पुनः तूल पकड़ सकता है।

9 अगस्त 2017 को, यानि 2018 की मराठा रैली की पहली वर्षगांठ पर फड़नवीस सरकार के विरुद्ध, ओबीसी आरक्षण की मांग को लेकर, लाखों लोग एकत्र हुए।

23 अगस्त 2017 को, पाटीदारों के नेता हार्दिक पटेल ने एक हाई प्रोफाइल साक्षात्कार में स्पष्ट किया कि उनका पाटीदार आन्दोलन चुनाव नहीं लड़ेगा, और प्ररोक्ष रूप से स्वीकार किया कि उनके मत को कांग्रेस समर्थन के रूप में भी देखा जा सकता है।

अलग-अलग से देखा जाए तो ये कुछ छिटके-बिखरे प्रसंग लग सकते हैं, जो तुरंत नज़र में नहीं आते, पर इन घटनाओं से स्पष्ट है कि भाजपा-एनडीए के पारम्परिक जातीय/सामाजिक आधार का कम-से-कम एक हिस्सा तो पार्टी के विरुद्ध बगावत कर रहा है, और यह कुछ महत्वपूर्ण राज्यों में चुनावी आधार के निर्णायक क्षरण को अन्जाम दे सकता है। हम इन मुद्दों का सिंहावलोकन करते हुए आम राजनीतिक निश्कर्ष की ओर बढ़ेंगे।

आंध्र प्रदेश में कापू आंदोलन

पिछले विधानसभा चुनाव में चनद्रबाबू नायडू ने कापू समुदाय से वायदा किया था कि यदि तेलगू देशम पार्टी को कापू समुदाय ने वोट दिया और वह जीती तो उनको ओबीसी सूची में शामिल कर लिया जाएगा। पर जब वे सत्ता में रहे उन्होंने कोई पहल नहीं की। इस विश्वासघात के विरुद्ध कापू लोगों ने भूतपूर्व कांग्रेस मंत्री मुद्रागदा पद्मनाभम के नेतृत्व में जन आन्दोलन शुरू किया। इससे परेशान होकर नायडू ने 15 अगस्त 2017 को एक गोलमोल किस्म का आश्वासन दिया कि जब मंजूनाथ समिति, जो कापू समुदाय को ओबीसी स्टेटस देने के मामले को देख रही है, अपनी रिपोर्ट पेश करेगी, उसे केंद्र को प्रेषित कर कापू समुदाय को पिछड़ी जाति की सूची में शामिल करने की पेशकश की जाएगी। इस बीच कापू समुदाय ने 6 दिसम्बर 2017 का अल्टीमेटम दे दिया है। कापू प्रधानतः एक कृषक जाति है और उसकी चार प्रमुख उपजातियां हैं बालिजा, कापू, ओन्टारी और तेलगा।

मीडिया परवेक्षकों का कहना है कि ये विभाजित आन्ध्र प्रदेश राज्य में जनसंख्या का 25 प्रतिशत हिस्सा हैं। यदि कानून-व्यवस्था की बात की जाए तो कापू समुदाय की हैसियत इतनी है कि वे आर्थिक रूप से सबसे अधिक विकसित पूर्वी और पश्चिमी गोदावरी जिलों को पूरी तरह ठप्प कर सकते हैं और चेन्नई-हावड़ा हाईवे के यातायात के साथ-साथ रेल रूट भी बाधित कर सकते हैं।

और तो और, राजनीतिक रूप से, नव-विभाजित आन्ध्र में, वे निर्णायक ध्रुवीकरण को अंजाम दे सकते हैं। कृष्णा घाटी के कृष्णा, गुन्टूर, तेनाली, प्रकासम, ओंग्ले और नेल्लोर में खम्मा जाति का बर्चस्व है और चन्द्रबाबू नायडू इसी जाति से आते हैं। गोदावरी घाटी के पूर्वी व पश्चिमी गोदावरी जिलों में मुख्य रूप से कापू जाति का बर्चस्व है और अन्य उत्तरी तटीय जिलों में वे भारी संख्या में मौजूद हैं। उत्तर बनाम दक्षिण और खम्मा बनाम अन्य जातियों का ध्रुवीकरण नायडू के लिए और एनडीए के लिए भी राजनीतिक रूप से काफी खतरनाक होगा।

हरियाणा में जाटों का संघर्ष

फरवरी 2016 में जाटों ने ओबीसी सूची में शामिल होने की मांग को लेकर व्यापक आन्दोलन छेड़ा था। इस दौर में संपूर्ण राज्य हिल गया था और हिंसा में 31 जानें गई थीं। भाजपा सरकार को दबना पड़ा और हरियाणा पिछड़ी जाति (सेवाओं और शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण ) कानून बनाना पड़ा, जिसमें ओबीसी सब कोटा में उनके लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था। परन्तु एक जनहित याचिका के माध्यम से यह कानून न्यायिक समीक्षा के लिए प्रस्तुत हुआ तो अब कोर्ट के हवाले हो गया।

1 सितम्बर 2017 को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने सिद्धान्ततः जाटों के लिए आरक्षण को स्वीकार कर लिया पर प्रतिशत के मामले को हरियाणा पिछड़ी जाति आयोग पर छोड़ दिया और राज्य सरकार से इसके संदर्भ में आंकड़े मांगे; इसके लिए 31 मार्च 2018 की अन्तिम तिथि होगी। परन्तु अखिल भारतीय जाट आरक्षण समिति के प्रमुख यशपाल मलिक ने 3 सितम्बर को जाट आरक्षण संबंधित समस्त न्यायिक प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए मात्र 2 महीने का समय दिया है। अगले ही दिन मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने बयान दिया कि सरकार किसी दबाव में न आकर आयोग के निर्णय के अनुसार काम करेगी।

हरियाणा में पहले से ही अनुसूचित जातियों के लिए 20 प्रतिशत आरक्षण है, पिछड़ी जाति की दो श्रेणियों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण है, और आर्थिक रूप से कमज़ोर तबकों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण है। अब नए कानून के तहत पिछड़ों की तीसरी श्रेणी-जाट, जाट सिख, त्यागी, बिश्नोई और रोड़-के लिए अतिरिक्त 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान होगा। उच्च न्यायालय का मामले को आयोग पर डाल देना और फिर सर्वोच्च न्यायालय में संभावित चुनौति-जहां आरक्षण की अधिकतम सीमा का मामला अभी भी तय नहीं है-यह सारा कुछ असली मुद्दे पर अनिश्चितता के साए को बनाए रखता है। हम याद करें कि यू पी ए सरकार ने 2014 में, लोक सभा चुनाव से पूर्व, केंद्रीय सूची में जाटों को ओ बी सी श्रेणी में शामिल किया था। पर उसे सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहकर अमान्य करार दिया था कि पुष्टि करने वाले आंकड़े नहीं थे। अब उच्च न्यायालय ठीक ऐसा ही कर रहा है।

उच्च न्यायालय ने दी हरी झंडी

पर, जाटों में गजब की बेचैनी है। बहुत से अध्ययन बताते हैं कि उनकी आर्थिक तरक्की के अनुरूप नहीं है उनका शिक्षा में विकास का स्तर। यद्यपि एक बड़ा हिस्सा मध्यम वर्ग के जीवन स्तर तक पहुंच गया है, सेवा क्षेत्र में लगा जाटों का शिक्षित मध्यम वर्गीय हिस्सा कम ही रोजगार-प्राप्त है। जबकि हरियाणा में 12.5 प्रतिशत अनुसूचित जाति के लोगों को सरकारी नौकरियां प्राप्त हैं, केवल 2.5 जाटों को सरकारी नौकरियों में पाया जाता है (एनसीएईआर मानव विकास सर्वे)। इसलिए उन्हें लगता है कि उनकी सामाजिक गति के लिए आरक्षण अनिवार्य जरूरत है। भाजपा ने जाट आरक्षण आन्दोलन में विरोधी गुटों के बीच दरार पैदा करने का प्रयास किया और हाल की एक मीटिंग में वे हाथा-पाई पर उतर आए। पर बहुसंख्यक समुदाय ने इसकी यह कहकर निंदा की है कि यह भाजपा का षड़यंत्र है और अपील की है कि आंदोलन को पुनर्जागृत किया जाए।

किसी जाट को मुख्यमंत्री न बनाना (खट्टर पंजाब के खत्री हैं) और वायदानुसार गन्ने व गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य को उपयुक्त स्तर तक न बढ़ाना तथा अखिल भारतीय स्तर पर लोन-माफी से मुकर जाना, इन सब बातों से जाटों के बीच खासा आक्रोश है। यदि जाटों की भावना निर्णयक रूप से भाजपा के खिलाफ हो गई, तो इसका चुनावी असर केवल हरियाणा में नहीं, बल्कि पश्चिम उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी होगा।

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

- Advertisement -

Latest News

फिलिस्तीन की शीरीन की हत्या निशाने पर निर्भीक पत्रकारिता

11 मई को फिलिस्तीन के जेनिन शहर में इजरायली फौजों द्वारा की जा रही जबरिया बेदखली को कवर कर...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This