Thursday, August 18, 2022

लखनऊ से सटे मामपुर गाँव के दलित टोले तक आज भी नहीं पहुँच रहा कई सरकारी योजनाओं का लाभ

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“उज्जवला का गैस चूल्हा, शौचालाय, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर, राशन, ई श्रम कार्ड आदि योजनाओं का लाभ समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े वर्ग को कितना मिल पा रहा है, इस सच्चाई से रू-  ब -रू होने आईये चलते हैं मामपुर गाँव के दलित टोले में…, “

लखनऊ से सटे इन्दौरबाग तहसील के अन्तर्गत आने वाले मामपुर गाँव के दलित टोले के निवासी रमेश, जो पेशे से राज मिस्त्री हैं, के घर की दहलीज पर जब जनचौक टीम पहुंची तो उनकी बेटी अंजली गोबर से आंगन को लीप रही थी। अंधकार को समेटे हुए छोटे छोटे दो कमरे और उन  कमरो के बाद आंगन, जहाँ 18 साल की अंजली अपने काम में व्यस्त थी। पापा अभी आते ही होंगे, तब तक आप बैठिये कहकर अपने छोटे भाई अंकुर को आंगन में कुर्सी लाने को कहती है, और पुनः अपने काम में लग जाती है। सोचा जब तक रमेश जी आते हैं तब तक अंजली से ही बात कर ली जाये । पढ़ती हो, पूछने पर थोड़ा सकुचाते हुए उसने कहा, “पढ़ती थी लेकिन अब पढ़ाई छोड़ दी…..” अच्छा कितना पढ़ी हो और क्यों पढ़ाई छोड़ दी, क्या आगे पढ़ने का मन है, मेरे तमाम सवालों का जवाब देते हुए उसने अपने पूरे हालात बयां किये। अंजली ने बताया “12वीं तक ही पढ़ाई की है, लेकिन आर्थिक तंगी के चलते पिछले साल पढ़ाई छोड़ दी।” माँ का देहांत तभी हो गया था जब वह मात्र 6 साल की थी और उसका भाई तीन साल का था, इसलिए कम उम्र में ही घर की सारी जिम्मेवारी उसके कंधों पर आ गई। वे कहती हैं “आगे पढ़ाई का मन तो होता है लेकिन फीस के लिए पैसा कहाँ से आएगा अभी छोटे भाई की भी पढ़ाई जारी है उसे भी तो आगे कुछ करवाना है फिर उसके लिए भी पैसा चाहिए।”

यहाँ तो अब हर दल कॉलेज जाने वाली छात्राओं को स्कूटी देने की बात कह रहा है, कॉलेज जाओगी तो स्कूटी मिलेगी, मेरी इस बात पर वह पूछती है “स्कूटी तो मिल जायेगी, लेकिन उसको चलाने के लिए इतने महंगे पेट्रोल का खर्चा हम जैसे गरीब लोग कहाँ से लाएंगे? फिर हर साल उसकी मेंटनेंस के खर्चे का भी बोझ कैसे उठाएंगे। यहाँ प्राइवेट कॉलेज तक की फीस भरने का पैसा नहीं तो स्कूटी मिल भी जाये तो क्या फायदा।”

गरीबों के लिए सरकार के द्वारा तमाम योजनाओं के पहल के दावों पर उसका कहना था, “कई कोशिशों के बाद आज तक शौचालय, उज्जवला गैस चूल्हा, प्रधानमंत्री आवास तक तो मिला नहीं बाकी योजनाओ का लाभ तो छोड़ ही दीजिए।” राशन महीने में दो बार जरूर समय से मिल जाता है।

मेरे यह कहने पर कि यह तो अच्छी बात है,  पर वह गुस्से वाले अंदाज़ में कहती है “एक व्यक्ति पर केवल पांच किलो मिलता है, उस पर भी किसी महीने कट कर चार ही मिलता है। आप ही बताईये एक मेहनत करने वाले व्यक्ति के लिए चार या पाँच किलो अनाज क्या काफी है?” अंजली ने बताया कि उनके दलित टोले में ऐसे बहुत से परिवार हैं जिनमें से किसी को शौचालय तो किसी को पक्का घर तो किसी को गैस चूल्हा तक नहीं मिल पाया है, और कुछ तो ऐसे हैं जो हर सुविधा से वंचित हैँ उनकी ही तरह । वह कहती है अभी मैं आपको सब से मिलवा दूँगी आप खुद सच्चाई जान लीजिए।

      अंजली से बात चल ही रही थी कि रमेश जी भी आ गए। मेरी बातचीत रमेश जी से शुरू हुई और उधर अंजली गाँव की महिलाओं को पंचायत भवन के प्रांगण में एकत्रित करने चली गई। रमेश जी राज मिस्त्री का काम करते हैं। तमाम योजनाओ का लाभ न मिल पाने का क्या कारण हैं, इसके जवाब में वे कहते हैं “योजनाओ का लाभ कहाँ से मिलेगा सब तो मिले हुए हैं प्रधान से लेकर सभासद, ऊपरी अधिकारी तक भ्रष्ट हैं। जो सरकारी योजनायें गरीबों के लिए फ्री हैं उसमें भी पहले घूस दो, तभी काम होगा। हम गरीब कहाँ से घूस दें।” उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री आवास योजना की लिस्ट में दो बार नाम आया लेकिन दोनों बार कट गया। क्यों कट गया कुछ नहीं पता  अब तीसरी बार नाम आया है। वे कहते हैं लिस्ट में नाम तो आ गया लेकिन जब तक कुछ मिल नहीं जाता तब तक संदेह ही बना हुआ है।

  उज्जवला के तहत गैस चूल्हा न मिलने का कारण वे बताते हैं “चूँकि यह योजना महिलाओं के लिए है, और उनकी पत्नी मर चुकी है इसलिए उन्हें इस योजना से वंचित बता दिया गया।” रमेश जी का कहना था, लेकिन बेटी तो बड़ी है उसके नाम से भी फॉर्म भरे दो साल हो गए, फिर भी कोई सुनवाई नहीं हो रही।  उन्होंने बताया “आज तक उन्हें शौचालय तक नहीं मिल पाया। गरीबों को मिलने वाली आर्थिक सहायता के तहत करोना की पहली लहर में ही बस एक बार उनके खाते में दो हजार आया था उसके बाद आज तक कभी आर्थिक सहायता नहीं मिल पाई, जबकि तब से लेकर आज तक रोजगार के जो हालात बिगड़े वे संभल नहीं पाये।” लेकिन सरकार ने तो श्रमिकों का पंजीकरण करके हर श्रमिक को रोजगार से जोड़ने की बात कही थी, इस सवाल के जवाब में रमेश जी कहते हैं “न पंजीकरण हुआ न सरकार की ओर से कोई रोजगार मिल पाया।”

  अब बारी थी टोले के अन्य लोगों से मिलने की। अंजलि ने बताया कि चूँकि घर के पुरुष मजदूरी के लिए निकले हैं, इसलिए महिलाओं को बुला लिया है। अंजली के साथ मैं महिलाओं से मिलने पहुँची। सबसे पहले मेरी मुलाकात मालती से हुई। मालती ने बताया कि उसे उज्जवल के तहत न तो गैस चूल्हा मिला है और न ही आज तक प्रधानमंत्री आवास मिला है। वे बेहद नाराजगी भरे स्वर में कहती हैं “अब कोई फॉर्म नहीं भरना, जब कुछ मिलना ही नहीं है तो दौड़ भाग करने से क्या फायदा?” मालती के पति की मृत्यु हो चुकी है। चार बेटियाँ और दो बेटे हैं। घर की माली हालात ठीक नहीं। मेहनत-मजदूरी करके जो थोड़ा बहुत घर पर आता है उसी से गुजारा चलता है। मालती के पास दो बीघा खेत है लेकिन सिरदर्द बन गए आवारा पशुओं के बारे में वह कहती है “हम गरीब लोग तो दोहरी मार झेल रहे हैं। न रोजगार का कोई ठिकाना है न खेती ही बच पा रही है, सब आवारा जानवर चर जाते हैं। आख़िर रात-रात भर जग कर कोई कब तक पहरेदारी करे।”

जब मालती यह सब बता रही थी तो चिंता की लकीरें उनके चेहरे पर साफ झलक रही थी। वे हाथ जोड़कर कहती हैं, “अब तो कोई ऐसी सरकार चाहिए जो हमारी खेती बचा सके।” मालती की बगल में बैठी सावित्री ने तो पहले बात करने से साफ इंकार कर दिया। मेरे कुछ पूछने से पहले ही कहती हैं, हमसे न पूछो हमें सब मिल गया। पक्का घर भी शौचालय भी गैस चूल्हा भी, और भी बहुत कुछ। दरअसल सावित्री का यह गुस्सा हमसे नहीं इस भ्रष्ट सिस्टम से था, उन झूठे प्रचारों से था जहाँ सब कुछ अच्छा और बस अच्छा होने का दावा किया जा रहा है।

  गाँव के पंचायत भवन के प्रांगण में एकत्रित सुशीला, फूलमति, कलावती, दामिनी, शांति आदि महिलाओं ने बताया कि फॉर्म भरने से लेकर अधिकारियों के पास भागदौड़ करने के बावजूद उनके दलित टोले के अधिकांश परिवार अधिकांश सरकारी योजनाओं से वंचित हैं। किसी को यदि पक्का घर मिला है तो शौचालय और गैस चूल्हा नहीं मिला, तो किसी को कुछ भी नहीं मिला। गरीब तबके के लिए बनने वाले ई श्रम कार्ड भी  बहुत से लोगों का नहीं बन पाया है।

राशन के सवाल पर  सभी का यही कहना था कि एक आदमी पर पाँच किलो राशन मिलता है, जिससे  किसी भी हाल में पूर्ति नहीं होती। इसलिए हर महीने बाजार से अलग से राशन  खरीदना ही पड़ जाता है। इनमें से कुछ लोग ऐसे थे जिनके पास गुजर बसर के लिए थोड़ी-बहुत खेती है, लेकिन आवारा जानवरों के कारण खेती में भी ज्यादा कुछ बच नहीं पा रहा। शांति कहती है इन आवारा जानवरों ने हमें बर्बाद कर दिया है, रात में ही नहीं दिन में भी रखवाली करनी पड़ती है। वे कहती हैं खेत के इर्द-गिर्द तार-बाड़ के बावजूद जानवर  खेत में घुस जाते हैं।

मामपुर गाँव के इस दलित टोले की पीड़ा यह बताने के लिए काफी है कि सरकारी प्रचार और सड़कों के किनारे लगे सरकार के बड़े-बड़े लोक लुभावन होर्डिंग चाहे कुछ भी कहें, लेकिन इन होर्डिंग्स के पीछे का एक भयवाह सच कुछ और भी है जिसे बेहद चालाकी से छुपाया जा रहा है । सरकारी योजनाओं का लाभ गरीब तबके तक जितना पहुँचना चाहिए, वह नहीं पहुँच पा रहा। वहीं सरकार और गरीब जनता के बीच सेतु का काम करने वाली मशीनरी है, वह भी इन योजनाओं का लाभ ईमानदारी से जरूरतमंद तक पहुंचाने में असफल साबित हो रही हैं। चुनाव में वोट हासिल करने के लिए प्रदेश सरकार ने अपनी लागू योजनाओ की लंबी-चौड़ी सूची अवश्य बना रखी है, लेकिन जिन लोगों तक उन योजनाओं का लाभ पहुंचना चाहिए, उन तक यह पहुँच भी पा रहा है या नहीं, इसकी जवाबदेही भी तो सरकार की ही बनती है। इतना तो तय है कि भले ही इन लुभावने विज्ञापनों से मध्य-वर्ग को लगता हो कि समाज के सबसे निचले हिस्से को कम से कम बुनियादी जरूरतों के लिए सरकार की ओर से मदद मिल रही है, और लाभार्थियों के तौर पर उनके मन में सरकार के प्रति अवश्य ही विश्वास जमा हुआ है, लेकिन हकीकत कुछ दूसरी ही कहानी बयां कर रही है।

(लखनऊ से स्वतंत्र पत्रकार सरोजिनी बिष्ट की रिपोर्ट।)

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