Saturday, August 13, 2022

कृषि कानून वापसी में छुपी है लोकतंत्र पर नये हमले की आशंका!

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किसान, मजदूर, छात्र, नौजवान और फासीवाद के खिलाफ संघर्षरत प्यारे देशवासियों। आज प्रधानमंत्री मोदी ने तीन कृषि कानूनों की वापसी का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि इस महीने के अंत में संसद के सत्र के दौरान वह इन कानूनों को वापस लेने के लिए नया बिल ले आएंगे। और ये कानून निरस्त हो जाएंगे। इसके साथ ही उन्होंने कुछ और बातें कहीं। उनका कहना था कि बहुत सारे किसान संगठनों ने इस कानून के सकारात्मक पक्षों को स्वीकार किया था और कहा था कि यह कानून किसानों के हित में है।

खुद कृषि मंत्री तोमर भी यही बात दोहरा रहे हैं। यह बात कहने के बाद मोदी जी ने कहा कि कुछ किसान हमारी बात समझ नहीं पाए। हमारी तपस्या का उनके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। हम उन्हें इस कानून की सकारात्मकता और किसानों के हित में यह कानून कितना जरूरी था इसको समझाने में नाकामयाब रहे। इसलिए मैं माफी मांगते हुए इन तीनों कानूनों को वापस लेने की घोषणा करता हूं। साथ ही उन्होंने किसानों से अपील की कि वह अपने घर वापस चले जाएं।

अब सवाल यह उठता है कि मोदी जी राष्ट्रहित में तपस्या कर रहे हैं। इस तपस्या को भारत के मेहनतकश जिसमें किसान, मजदूर, व्यापारी, कर्मचारी, छात्र, नौजवान हैं। वे अपनी अज्ञानता के कारण नहीं समझ पा रहे हैं। ये अज्ञानी लोग निर्मल आत्मा से की गई प्रधानमंत्री की तपस्या को सकारात्मक ढंग से ग्रहण नहीं कर पा रहे हैं। दोषी 100 करोड़ से ज्यादा भारतीय नागरिक ही हैं जो निजी स्वार्थों के वशीभूत महान मोदी की तपस्या का महत्व नहीं समझ पाते। इसका उन्हें शायद अफसोस है। इसलिए भारी मन से उन्होंने 3 कानूनों की वापसी की घोषणा की है।

उनकी तपस्वी आत्मा और उनके निर्मल निश्चल स्वभाव से भारत के करोड़ों नागरिक, अल्पसंख्यक, बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक, छात्र, नौजवान, अभी तक लाभ उठा चुके हैं। मूर्ख किसान इस तपस्या से पैदा हुए अमृत का रसास्वादन करने से वंचित रह गए। यही शायद मोदी जी की सबसे बड़ी चिंता है। हम जानते हैं कि संतों के उनके इस जन्म में उनकी तपस्या और साधना का महत्व मृत्युलोक के प्राणी समझ नहीं पाते हैं। और महान संतों को उनके जीवनकाल में शायद वह सम्मान और लाभ नहीं मिल पाता जिसके वे वास्तविक हकदार होते हैं।

लेकिन मुझे उम्मीद है कि मोदीजी जिस राष्ट्रवादी हिंदुत्व विचारधारा की साधना और विचार चिंतन प्रक्रिया के वशीभूत होकर तपस्या के मार्ग पर आगे बढ़े हैं। उसको समझने वाले क्या सही अर्थों में उनकी तपस्या और साधना के लक्ष्य को नहीं समझ पा रहे रहे हैं। उनकी ऋषि-मुनियों वाली वेशभूषा संतों की तरह से प्रवचन वाली शुद्ध वाणी और राष्ट्र हित को अपने जीवन की चिंता का मूल मंत्र मानने वाले महान मोदी जी किस धारा, किस राजनीतिक और आध्यात्मिक दिशा के प्रतिनिधि हैं। इसे जरूर समझने की जरूरत है।

गुजरात नरसंहार और लालची पूंजीपतियों की ताकत पर प्रधानमंत्री का पद प्राप्त करना, नोटबंदी और उसके बाद क्रूर लॉक डाउन, बौद्धिकों की हत्या, जेल, फर्जी मुकदमों में फंसाया जाना, बेगुनाह सैकड़ों छात्रों-नौजवानों को जेलों में सड़ा देना और मौत की दिशा में ठेल देना उनकी शुध्द मन से की गई तपस्या का ही तो सुफल है। महामारी के दौर में तीन कृषि कानून तथा मजदूरों के लिए चार श्रम कोड लागू करने जैसे महान कार्य तपस्या से निकले अमृत ही तो हैं। मूर्ख मजदूर-किसान इसे क्या समझेंगे। इसलिए आज भारी मन से महान ऋषि मोदी जी को तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की उद्घोषणा करनी पड़ी।

यहीं यह सवाल है कि क्या हम इसे विजय समझें। निश्चय ही साढ़े छह सौ से ज्यादा किसानों की कुर्बानी और एक साल तक प्राकृतिक आपदा महामारी का संकट सरकारों का षड्यंत्र, तिकड़म पुलिस का दमन बैरिकेडिंग वाटर कैनन और लाठीचार्ज, कील कांटा झेलते हुए जो किसान सीमा और पूरे देश में कानूनों के खिलाफ सत्याग्रही के रूप में अडिग रहे वह क्या इसे अपनी संपूर्ण विजय समझें। मुझे लगता है यहां थोड़ा ठहर कर सोचना होगा। फासीवाद की कार्यशैली के बारे में अभी तक दुनिया में जितने अध्ययन-चिंतन हुए हैं उस परिप्रेक्ष्य में मोदी की इस घोषणा को समझने की जरूरत है। वह किसानों के आंदोलन के संकट में फंसे होने के कारण थोड़ा सा सांस लेने की जगह तलाश रहे हैं कि किसान वापस जाएं और उन्हें लोकतंत्र पर हमला करने का नया अवसर मिले।

इस संदर्भ में हमें अजीत डोभाल और विपिन रावत के हाल के संत वचनों को जरूर ध्यान में रखना चाहिए। इसलिए आज विजय का उत्सव मनाते हुए भी मैं संपूर्ण किसान आंदोलनकारियों, मजदूर, छात्र संगठनों और सर्वोपरि नागरिक समाज के लोगों से अपील करना चाहूंगा कि मोदी सरकार के एक कदम पीछे हटने की इस पूरी कार्रवाई को दो कदम आगे बढ़कर लोकतंत्र और भारत की स्वायत्तता, सार्वभौमिकता और आत्मनिर्भरता, संविधान के खिलाफ होने वाले किसी बड़े आक्रमण और षड्यंत्र के रूप में ही देखने की कोशिश करें।

अभी से हमले का प्रतिवाद करने की तैयारी में जुट जाएं। नहीं तो विजय उल्लास के गफलत के बीच में भयानक अंधकार दमन और भारत की दुर्दशा की नई स्क्रिप्ट लिखी जा सकती है। इसलिए सभी मित्रों से गुजारिश है किसानों की शहादत को प्रणाम करते उनकी दृढ़ता संघर्ष सहनशीलता त्याग बलिदान और अहिंसा पर डटे रहने की महान संकल्पना को बार-बार सलाम करते हुए भविष्य में होने वाले फासीवादी हमले के प्रति सचेत रहें। इस पर पैनी निगाह रखें। अपनी तैयारी जारी रखें और बड़ी जन गोलबंदी की तरफ बढ़ने के लिए कदम उठाएं। 3 कानूनों की वापसी की घोषणा के बीच आज यही अर्थ निकाला जा सकता है और निकाला जाना चाहिए।

(जयप्रकाश नारायण यूपी सीपीआई (एमएल) के वरिष्ठ नेता हैं।)

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