Sunday, September 25, 2022

सुनीता खाखा मामला: झारखंड में सामने आया हैवानियत का सबसे क्रूर चेहरा

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रांची। झारखंड की राजधानी रांची से 160 किलोमीटर दूर आदिवासी बहुल गुमला जिले में पहाड़ों-जंगलों से घिरा परमवीर चक्र विजेता लांस नायक अल्बर्ट एक्का का गांव है जारी। बता दें कि साल 2010 में सरकार ने अल्बर्ट एक्का के पैतृक जारी गांव को ब्लॉक (प्रखंड) का दर्जा दिया और इसका नाम अल्बर्ट एक्का प्रखंड रखा गया है। यहां का पुलिस थाना भी इसी नाम से खोला गया है।

लांस नायक अल्बर्ट एक्का, भारत-पाकिस्तान युद्ध 3 दिसंबर, 1971 में वीरगति को प्राप्त हुए थे। तब वे महज 29 साल के थे। एकीकृत बिहार में मरणोपरांत परमवीर चक्र का सम्मान पाने वाले वे पहले वीर सपूत थे। उन्हें हासिल प्रशस्ति पत्र पर भारत-पाक युद्ध में उनकी वीरगाथा लिखी है। भारत सरकार ने साल 2000 में इस वीर सपूत की याद में एक डाक टिकट भी जारी किया था।

राजधानी रांची के बीचोंबीच अल्बर्ट एक्का की आदमकद प्रतिमा लगी है। यह जगह अल्बर्ट एक्का चौक के नाम से प्रसिद्ध है। परमवीर चक्र का सम्मान पाने वाले अल्बर्ट एक्का के इसी जारी प्रखंड के सीकरी आम्बा टोली गांव के एतवा खाखा और मघियो खाखा की बेटी हैं सुनीता खाखा, जो आज सुर्खियों में इसलिए है कि पिछले आठ साल से भाजपा नेत्री सीमा पात्रा की जुल्म की शिकार होकर आज विकलांग हो चुकी हैं और झारखंड ही नहीं पूरे देश के मानवीय संवेदनाशील लोग सीमा द्वारा की गई अमानवीय कृत्य को लेकर गुस्से में हैं।

कहना ना होगा कि क्षेत्र के आदिवासी इलाकों में कई परिवारों में लोग अपने बच्चों के नाम बड़े गर्व के साथ बिरसा मुंडा व अल्बर्ट एक्का रखते रहे हैं।

ऐसे में इस राज्य के लिए इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है कि जिस क्षेत्र के वीरगति को प्राप्त हुए परमवीर चक्र का सम्मान पाने वाले पहले वीर सपूत के इलाके में आज भी विकास की रोशनी इतनी मद्धिम है कि लोग रोजी-रोटी के लिए पलायन को मजबूर हैं और लड़कियां देश के अन्य शहरों घरेलू कामगार के तौर काम करने को मजबूर होकर प्रताड़ित हो रही है।

यहां की गरीबी और रोटी की परेशानी का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि सुनीता के परिजनों को यह भी पता नहीं है उनकी बेटी कहां है। सुनीता बचपन से ही अपने नाना-नानी के घर पर रहती थी। उसे कौन कब सीमा खाखा के यहां घरेलू कामगार के रूप में रखवाया घर वालों को नहीं पता।

सुनीता के घर पर उसकी मां मघियो खाखा, पिता एतवा खाखा, एक छोटा भाई और छोटी बहन रहती हैं। सुनीता की छोटी बहन घर में बीमार है। उन्हें सुनीता के साथ हुई हैवानियत की जानकारी नहीं है। सामाजिक कार्यकर्त्ता सरोज लकड़ा द्वारा एक सामाजिक संगठन के माध्यम से जब सुनीता से रिम्स में उसके पिता व चाचा से मिलवाया गया वे भौचक रह गए।

अदिवासी युवती सुनीता खाखा के साथ जो घटना हुई है, वह किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक ही नहीं, अमानवीयता की हदें पार कर गई है।

अब आते हैं सुनीता की कहानी पर ….

बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में महिला मोर्चा की सदस्य सीमा पात्रा ने घरेलू कामगार आदिवासी युवती सुनीता खाखा को पिछले आठ सालों से इतना टॉर्चर किया कि अच्छी भली सुनीता अब विकलांग नजर आती है, कुछ मीडियाकर्मी भी सुनीता को विकलांग बताने से गुरेज नहीं कर रहे हैं। सीमा पात्रा द्वारा सुनीता पर किये गये अमानवीय अत्याचार के खुलासे ने अंकिता और काजल के साथ हुई आपराधिक कृत्य को भी पीछे छोड़ दिया है।

वैसे तीनों मामलों के आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है बावजूद इसके लोगों का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा है। लोग तीनों मामले के आरोपी को फांसी की सजा की मांग कर रहे हैं। सुनीता खाखा मामले में भाजपा ने सीमा को पार्टी से निलंबित कर दिया है बावजूद इसके वह विरोधियों के टार्गेट में है। निलंबित होने से पहले राष्ट्रीय महिला परिषद की सदस्य के साथ-साथ ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ पहल की झारखंड प्रदेश की संयोजिका भी थी।

सीमा पात्रा को पुलिस ने 31 अगस्त को रांची कोर्ट में पेश किया। इसके बाद कोर्ट ने सीमा को 14 सितंबर तक के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के दौरान सीमा पर दि प्रिवेंशन ऑफ़ एट्रॉसिटीज एक्ट (अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989) के तहत केस दर्ज हुए हैं।

उन पर आईपीसी की धारा 323 (जानबूझ कर मारना), 325 (जानबूझ कर गंभीर चोट देना), 346 (ग़लत तरीक़े से बंधक बनाना), 374 (जबरन मज़दूरी कराना) लगाई गई है। सीमा पात्रा रिटायर्ड आईएएस अधिकारी महेश्वर पात्रा की पत्नी हैं। उनकी महत्वाकांक्षा इतनी प्रबल है कि वे 1998 के दौर में फ़िल्म अभिनेत्री बनना चाहती थी।  कभी उनको ”ड्रीम गर्ल ऑफ़ बिहार” भी कहा जाता था।

सूत्रों की मानें तो चारा घोटाले की सीबीआई जांच में यह बात भी सामने आई थी कि आरके राणा जो कि आरजेडी के नेता थे, वे सीमा पात्रा को मुंबई घुमाने ले गए थे। दावा किया गया कि उस पर लगभग 20 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। इन सब ख़बरों के बीच सीमा पात्रा अचानक गायब हो गई थीं। वे 1991 में चंद्रशेखर की पार्टी जनता दल की टिकट पर डाल्टेनगंज से लोकसभा का चुनाव भी लड़ी हैं। यह अलग बात है कि इस चुनाव में उनकी ज़मानत तक ज़ब्त हो गई थी।

सीमा पात्रा आरजेडी में रहीं और बाद में कांग्रेस में गईं। पांच साल पहले वह बीजेपी में आईं और यहां राष्ट्रीय कार्यकारिणी में महिला मोर्चा की सदस्य बनाई गईं।

पुलिस रिपोर्ट के अनुसार आदिवासी युवती सुनीता खाखा सीमा पात्रा की बेटी वत्सला के दिल्ली रहने के दौरान उनके यहां घरेलू कामगार के तौर पर काम करती थी। यहां भी उनके साथ ऐसा ही सलूक किया जाता था। करीब आठ साल पहले जब वत्सला को नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन के रामगढ़ स्थित केंद्र में काम के लिए आना पड़ा, तो वह सुनीता को अपनी मां सीमा के पास रख आई। यहीं शुरू हुआ सीमा पात्रा द्वारा सुनीता के साथ हैवानियत का नंगा नाच। उनके साथ क्रूरता का आलम यह था कि जब भी वे घर से बाहर निकलती थीं तो सुनीता के कमरे में ताला लगा कर जाती थीं। अगर वो दो दिन घर नहीं लौटती थीं तो सुनीता पूरे समय भूखे-प्यासे ही कमरे में बंद रहती थी।

जब सुनीता की हालत बहुत ही ख़राब होने लगी तो सीमा पात्रा ने उसे किसी आश्रम में छोड़ने की सोचने लगी। बताते चलें कि इन तमाम घटनाक्रम का गवाह था सीमा पात्रा का बेटा आयुष्मान पात्रा। पता नहीं इतनी संवेदनहीन मां के बेटे में मानवीय संवेदना कहां से थी। जबकि सीमा पात्रा के रिटायर्ड आईएएस अधिकारी महेश्वर पात्रा भी इन घटनाक्रम के मूकदर्शक बने हुए थे।

 आयुष्मान पात्रा ने अपने एक आदिवासी दोस्त विवेक आनंद बास्के को सुनीता के साथ हो रहे अमानवीय अत्याचार के बारे में बताया। विवेक इस वक़्त झारखंड सरकार में कार्मिक, प्रशासनिक सुधार और राजभाषा विभाग में सेक्शन ऑफिसर के पद पर कार्यरत हैं।

विवेक आनंद बास्के के अनुसार आयुष्मान पात्रा और वे साथ में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। कुछ दिन पहले उनका फ़ोन आया और उन्होंने कहा कि उनके घर में जो आदिवासी लड़की नौकरानी है, उसे बचा लो मेरी मां उसे मार देगी। आयुष्मान के फ़ोन के कुछ ही देर बाद सीमा पात्रा का भी फ़ोन आया, जिसमें उन्होंने बताया कि उनका बेटा मानसिक रोगी हो चुका है। घर में बहुत हिंसा करता है। उसे मेंटल हास्पिटल में एडमिट कराना होगा।

सीमा पात्रा के फोन के विवेक को लगा कि आयुष्मान में कोई गड़बड़ है, लिहाजा उसने आयुष्मान की बात पर यकीन नहीं किया और सीमा पात्रा के कहने पर आयुष्मान को रांची के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकेट्री (केंद्रीय मनचिकित्सा संस्थान) में एडमिट कराने ले गया।

एडमिट होने के दौरान ही आयुष्मान अपनी मां पर जोर से चिल्लाकर कहने लगा – आप कितनी निर्दयी हैं। आपने सुनीता को विकलांग बना दिया। वह जब चल नहीं पाती थी और कपड़े में ही पेशाब कर देती थी, तब आप उसके मुंह से उसे साफ़ करवाती थीं। इतना सुनते ही विवेक चौंके और उसके बाद उसने सीमा पात्रा के घर के अन्य कर्मचारियों से मामला क्या है इस बारे में जानकारी जुटाई, तो जानकारी सामने आई, वो दिल दहला देने वाली थी।

कई बार सुनीता खाखा को गर्म तवे से दागा गया। लोहे के रॉड से मारकर उसके दांत तोड़ दिए गए हैं। कई दिनों तक उसे एक कमरे में ही बंद करके रखा जाता था। इस दौरान वह कपड़े में ही मल-मूत्र त्याग कर देती थी, जिसे देखते ही सीमा पात्रा उस पर चिल्लाने लगती थीं और उसके मुंह से पेशाब साफ़ करवाती थीं। नौकरों ने बताया कि बीते तीन सालों से सुनीता ने सूरज की रोशनी नहीं देखी है।

विवेक ने इसकी सूचना तत्काल रांची के ज़िलाधिकारी राहुल सिंह को दी। उन्होंने तत्काल एसएसपी से बात कर एक टीम गठित की और 22 अगस्त को सुनीता को सीमा पात्रा के घर से रेसक्यू किया गया। इसके बाद उसे रिम्स में एडमिट कर दिया गया।

रिम्स के डॉ. शीतल मलुआ के अनुसार सुनीता की हालत स्थिर है। वह बहुत कमज़ोर है। फिलहाल उसे दवाई दी जा रही है, लेकिन पूरी तरह ठीक होने में समय लगेगा। उन्होंने बताया कि सालों की प्रताड़ना का सुनीता के दिमाग पर असर पड़ा है। इस असर को कम करने में समय लगेगा।

सुनीता खाखा के साथ हुई क्रूरता पर सामाजिक कार्यकर्त्ता भारत भूषण चौधरी कहते हैं कि सीमा पात्रा एक अत्यंत क्रूर, विकृत मानसिकता वाली और आपराधिक प्रवृत्ति की महिला है। लेकिन वह ऐसी अकेली इन्सान नहीं है। आज सत्ताधारी राजनीतिक दलों में ऐसी मानसिकता और व्यवहार वाले लोग ही शीर्ष पर हैं। जो जितना बड़ा अपराधी उसे उतनी बड़ी कुर्सी। बस आप कानूनी दांव पेंच से कोर्ट में अपराधी सिद्ध होने से बचे रहें।

गुजरात दंगों के अपराधी, सिख दंगों के अपराधी, लखीमपुर खीरी कांड करने वाले, व्यापम में पचास से अधिक लोगों की हत्या करवाने वाले, गाय के नाम पर हत्या करने-कराने वाले ही तो आज सत्ता पर काबिज हैं। पुलिस महकमा इतना कर्तव्य विमुख और स्वार्थी हो गया है कि गरीब लाचारों पर हो रहे अन्याय को चंद रुपयों या एक सिफारिश के सामने अनदेखा कर देता है। आज सीमा पात्रा जैसी दबंग व क्रूर अत्याचारियों के बीच करोड़ों सुनीता खाखा लाचार हैं।

वे आगे कहते हैं कि राजनीतिक पार्टी ऐसे अपराधियों को पार्टी से निलंबित कर पाक साफ नहीं हो जाएगी। हमें यह सवाल पूछना होगा कि तुम्हारे दल में हीं क्यों ऐसे अपराधी भरे पड़े हैं? सवाल यह भी उठता है कि एक IAS अधिकारी, जो देश की जनता की सेवा करने और उन्हें न्याय दिलाने के शीर्ष पदों पर रहता है, उसकी पत्नी ऐसे आपराधिक कृत्यों को बरसों तक कैसे करती रही? क्या नौकरशाही का चरित्र इतना संवेदनहीन हो गया है?

यहां हमें सीमा पात्रा के बेटे आयुष्मान पात्रा और उनके दोस्त विवेक बास्के की हिम्मत और मानवीय संवेदना की प्रशंसा करने से चूकना नहीं चाहिए। समाज में ऐसे लोग ही अंधेरी गुफा में टिमटिमाती रोशनी का काम मार रहे हैं। करोड़ों वंचित देशवासियों को ऐसे ही व्यक्तियों से आशा और प्रेरणा मिलती है। सामाजिक संवठनों को आयुष्मान और विवेक को सम्मानित करना चाहिए। इनके पहल को नजीर के तौर पर प्रसारित करना चहिये।

आदिवासी वीमेंस नेटवर्क एवं झारखण्ड घरेलू कामगार यूनियन की देवला हांसदा कहती हैं कि हम भाजपा नेत्री सीमा पात्रा द्वारा अपनी घरेलू कामगार, सुनीता की यातना और कैद द्वारा किए गए जघन्य कुकृत्य की कड़ी निंदा करते हैं। सुनीता गुमला की रहने वाली एक आदिवासी महिला है और 10 साल से परिवार के लिए काम कर रही थी और लगभग 8 साल से हिंसा झेल रही थी। उसे कई तरह की शारीरिक व मानसिक यातनाओं का सामना करना पड़ा। उसे गर्म तवे से दागा गया, लोहे की छड़ से पीटा गया, फर्श से पेशाब चटवाया और कई दिनों तक बिना भोजन और पानी के रखा गया। सुनीता को अब इलाज के लिए रिम्स रांची में भर्ती कराया गया है। यह विडंबना की बात ही है कि दोषी सीमा पात्रा ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ आंदोलन’ की पूर्व समन्वयक हैं और उन्होंने एक युवा आदिवासी लड़की के खिलाफ अकथनीय कुकृत्य को अंजाम दिया है। यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि सीमा पात्रा की बेटी, वत्सला पात्रा भी इन कुकृत्यों में समान रूप से भागीदार है।

यह घटना व्यथित करने वाली है और घरेलू कामगारों और उनके नियोक्ताओं की श्रेणीबद्ध प्रणालियों के भीतर हो रहे हिंसा को सामने लाती है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि घरेलू कामगार, विशेष रूप से महिलाएं ज्यादातर दलित, आदिवासी और पीवीजीटी समूहों से हैं। यह आदिवासी महिलाओं के अनगिनत मामलों को सामने लाता है, जो शहरी क्षेत्रों में घरेलू कामगार के रूप में कार्यरत हैं और उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है और उनके पास कोई अधिकार नहीं रहता। युवा आदिवासी महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा के अभाव, कम वेतन और बड़े पैमाने पर हिंसा के साथ अनौपचारिक कार्यक्षेत्रों की और धकेला जा रहा है।

इसका मूल कारण परिवारों की निम्न आर्थिक स्थिति और कम उम्र में स्कूल छूटने की ओर इशारा करता है। ऑर्गनाईज्ड वर्कर्स सोशल सिक्योरिटी एक्ट 2008 के माध्यम से घरेलू कामगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के कई प्रयास हुए हैं। हालांकि इसे लागू किया गया है। नेशनल प्लेटफार्म फॉर डोमेस्टिक वर्कर्स ने ‘डोमेस्टिक वर्कर्स रेगुलेशन फॉर वर्क एंड सोशल सिक्योरिटी बिल 2017’ का ड्राफ्ट तैयार किया है। हालांकि इसे कैबिनेट की मंजूरी नहीं मिली। एक बात यह भी है कि कानून बनाने वाले स्वयं दोषी बन जाते हैं जिसके चलते वे कानून पारित नहीं करते हैं।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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