Wednesday, December 7, 2022

मनरेगा में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ झारखंड में चलेगा मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान

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जब मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम पर बात होती है तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि मनरेगा की अवधारणा क्यों और कब तैयार की गई।

तो बता दें कि नरेगा यानी राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी योजना को 7 सितंबर 2005 को इस योजना को अधिनियमित किया गया और 2 अक्टूबर 2005 को पारित किया गया।

इस योजना की अवधारणा के तहत प्रत्येक वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के उन वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराने की गारंटी की गई जो प्रतिदिन सांविधिक न्यूनतम मजदूरी पर सार्वजनिक कार्य-सम्बंधित अकुशल मजदूरी करने के लिए तैयार रहेंगे।

31 दिसंबर 2009 को इस योजना के नाम में परिवर्तन करके इसे महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी योजना (मनरेगा) कर दिया गया। 

इस योजना को 2 फ़रवरी, 2006 को 200 जिलों में शुरू किया गया, जिसे 2007-2008 में अन्य 130 जिलों में विस्तारित किया गया और 1 अप्रैल 2008 तक भारत के सभी 593 जिलों में इसे लागू कर दिया गया। इसकी शुरुआत सबसे पहले आंध्र प्रदेश के बांदावाली जिले के अनंतपुर नामक गांव में हुई।

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बता दें कि केंद्र की कॉरपोरेट परस्त मोदी सरकार द्वारा पिछले कई वर्षों से मनरेगा मजदूरी दर में जिस तरह से छोटी सी बढ़ोत्तरी की गई है, वह इस बात का सबूत है कि मोदी सरकार मनरेगा को धीरे-धीरे ख़त्म करने की ओर बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ यह मनरेगा कानून भ्रष्टाचार का केंद्र बनता जा रहा है। जिससे मनरेगा की अवधारणा और प्रारदर्शिता समाप्त होने की कगार पर है।

कहने को तो मनरेगा साल में 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराती है, मगर इस योजना का जो दूसरा पक्ष है वह यह कि इसके 100 दिन के रोजगार की गारंटी में केवल एक परिवार शामिल होता है, एक व्यक्ति नहीं। चाहे उस परिवार में जितने भी वयस्क सदस्य हों, उन सबको मिलाकर 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराया जाता है। यानी अगर परिवार में चार वयस्क सदस्य हैं तो एक व्यक्ति को साल में 25 दिन का रोजगार उपलब्ध होता है।

अगर हम मनरेगा में व्याप्त भ्रष्टाचार की बात करें तो पिछले वर्ष झारखण्ड के 1118 पंचायतों में क्रियान्वित मनरेगा 29,059 योजनाओं के सोशल ऑडिट में जो हालात सामने आए हैं, वे मनरेगा में व्याप्त एक बड़े भ्रष्टाचार का खुलासा करते हैं।

ऑडिट योजनाओं में से 36 योजनायें JCB से कराये जाने के स्पष्ट प्रमाण मिले। कुल 1,59,608 मजदूरों के नाम से मस्टर रोल (हाजरी शीट) निकाले गए थे उसमें सिर्फ 40,629 वास्तविक मजदूर (25%) ही कार्यरत पाए गए। शेष सारे फर्जी नाम के मस्टर रोल थे।

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1787 मजदूर ऐसे मिले जिनका नाम मस्टर रोल में था ही नहीं।

85 योजनायें ऐसी मिलीं जिनमें कोई मस्टर रोल सृजित ही नहीं किया गया था, परन्तु काम शुरू कर दिया गया था।

376 मजदूर ऐसे मिले जिनका जॉब कार्ड बना ही नहीं था। पूर्व के वर्षों में भी सोशल ऑडिट के माध्यम से करीब 94 हजार विभिन्न तरह की शिकायतें दर्ज की जा चुकी हैं, जिसमें करीब 54 करोड़ राशि गबन की पुष्टि हो चुकी है। उन पर भी सरकारी अधिकारी कार्रवाई करने से कतरा रहे हैं। राज्य भर में शिकायत निवारण प्रक्रिया पूरी तरह फेल है।

नतीजतन मनरेगा से जुड़े मुद्दों को लेकर पिछले दिन झारखण्ड की राजधानी राँची में भाकपा (माले) के केन्द्रीय कार्यालय में वामपंथी दलों और जन संगठनों की बैठक संपन्न हुई l

जिसमें राज्य में मनरेगा की गंभीर स्थिति पर चिंता जाहिर की गई। बैठक में वक्ताओं ने कहा कि क़ानून होते हुए भी आज राज्य के 1.12 करोड़ मजदूरों की स्थिति बेहद ख़राब है। 69 लाख पंजीकृत परिवारों में से इस साल अभी तक मात्र 19% परिवारों अर्थात 14% मजदूरों को ही काम मिल सका है। सरकार की सामाजिक अंकेक्षण ईकाई द्वारा 2021-22 में किये गए मनरेगा योजनाओं के समवर्ती अंकेक्षण रिपोर्ट के अनुसार मस्टर रोलों में दर्ज मजदूरों में से सिर्फ 25% प्रतिशत मजदूर ही कार्यस्थल पर मिले थे।

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वक्ताओं ने कहा कि कोविड के प्रारंभिक चरण में करीब 15 लाख मजदूर अन्य राज्यों से वापस पहुंचे थे। राज्य में मनरेगा की अनेक कठिनाइयों की वजह से मजदूर आज वापस दूसरे राज्यों में मजबूरीवश पलायन को विवश हैं l वक्ताओं ने आगे कहा कि आज की तिथि में कोई भी वेंडर सामाग्री आपूर्ति नहीं करता है, बल्कि सिर्फ बिल व बाउचर सप्लाई करता है। इससे लाभुकों को कभी भी उनके द्वारा लगायी गयी सामग्री के बदले पैसे नहीं मिल पाते हैं। कहा गया कि सरकार अधिनियम के प्रावधान के बावजूद ग्राम सभा की ताकत को लगातार कमजोर कर रही है l ऑनलाइन हाजिरी के नाम पर योजनाओं में पारदर्शिता शब्द मात्र रह गयी है। एनएमएमएस प्रणाली के लागू होने से काम करने के बावजूद मजदूरों की हाजरी नहीं बन पा रही है, क्योंकि गांवों में न मेटों के पास स्मार्ट फ़ोन है, न नेटवर्क, न बिजली और न रिचार्ज। इस प्रणाली से मजदूर एकदम से थक जा रहे हैं। ऊपर से अकाल और भुखमरी ने मजदूरों की कमर ही तोड़ दी है।

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बैठक में मनरेगा मजदूरों के इन मुद्दों को राज्य व्यापी मुद्दा बनाने के लिए मनरेगा मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान चलाने पर आम सहमति बनी। जिसमें अन्य सहमना जनसंगठनों, ट्रेड यूनियनों तथा राजनीतिक वामदलों के साथ मिलकर साझा अभियान चलाया जाएगा। इसके लिए सरकार आपके द्वार हेतु चल रहे पंचायत शिविरों में मजदूरों से काम मंगवाने, बकाया मजदूरी का आवेदन करवाने एवं सामग्री मद में बकाये के भुगतान हेतु आवेदन कराने का अभियान चलाया जाएगा।

बैठक में कहा गया कि नवम्बर महीने के अंतिम सप्ताह में अभियान की समीक्षा हेतु राज्य स्तरीय बैठक की जाएगी। राज्य भर से एकत्रित मुद्दों को लेकर राज्यस्तरीय जनसुनवाई की जाएगी। विधान सभा के शीतकालीन सत्र में मनरेगा एक राजनीतिक मुद्दा बने इसके लिए सत्र के दौरान सभी मजदूर संगठनों, ट्रेड यूनियनों और राजनीतिक वामदलों की अगुवाई में धरना-प्रदर्शन किया जाएगा। फिर आगामी 2 फ़रवरी, 2023 को नरेगा दिवस के मौके पर व्यापक मजदूर महापंचायत का आयोजन किया जाएगा।

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बैठक में मुख्यरूप से झारखण्ड नरेगा वाच के राज्य संयोजक जेम्स हेरेंज, भाकपा (माले) के राज्य सचिव मनोज भक्त, साक्षरता आन्दोलन से जुड़े गिरिडीह के विश्वनाथ सिंह, इसी संगठन के असीम सरकार, सीपीआई (एम) के प्रकाश विप्लव, आदिवासी अधिकार मंच के प्रफुल लिंडा, खाद्य सुरक्षा जनअधिकार मंच के संदीप प्रधान, गीवीएस के रवि सिंह, झामस के देवकी नंदन बेदिया, सीपीआई के अजय सिंह, झारखण्ड किसान परिषद् के अम्बिका यादव, झारखण्ड नरेगा वाच के सिराज दत्ता, बबलू चौधरी, सच्चिदानंद पासवान, अर्पणा बाड़ा आदि उपस्थित थे।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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